कोलकाता.
भारत में संपत्ति हस्तांतरण के नियम इस बात पर निर्भर करते हैं कि संपत्ति स्व-अर्जित है या पैतृक. एक पिता अपने जीवनकाल में अपनी स्व-अर्जित संपत्ति को किसी एक बेटे को उपहार में दे सकता है. चूंकि यह संपत्ति उसकी अपनी कमाई से खरीदी गयी होती है, इसलिए उस पर उसका पूर्ण अधिकार होता है. वह स्वेच्छा से एक पंजीकृत गिफ्ट डीड के माध्यम से इसे एक बेटे को हस्तांतरित कर सकता है, भले ही इससे अन्य उत्तराधिकारी वंचित रह जायें. एक बार पंजीकृत होने के बाद, यह हस्तांतरण अंतिम होता है और इसे वापस नहीं लिया जा सकता. इस संबंध में कलकत्ता हाइकोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता देवब्रत उपाध्याय ने प्रभात खबर के पाठकों द्वारा ऑनलाइन पूछे गये सवालों के जवाब में बताया कि इसके विपरीत, पैतृक संपत्ति के मामले में नियम काफी सख्त हैं. हिंदू कानून के तहत, पिता पैतृक संपत्ति को केवल एक बेटे को उपहार में नहीं दे सकता, क्योंकि इसमें जन्म से ही सभी बेटों और बेटियों का समान अधिकार होता है.सर्वोच्च न्यायालय ने केसी लक्ष्मण बनाम केसी चंद्रप्पा गौड़ा (2022) मामले में स्पष्ट किया है कि कोई भी पिता ””प्रेम और स्नेह”” के आधार पर पैतृक संपत्ति किसी एक बेटे को नहीं दे सकता. ऐसा उपहार केवल ””धार्मिक उद्देश्यों”” के लिए ही मान्य हो सकता है. यदि पिता अन्य हिस्सेदारों की सहमति के बिना ऐसी संपत्ति किसी एक बेटे को देता है, तो यह कानूनन अमान्य है और अन्य वारिस इसे अदालत में चुनौती देकर विभाजन की मांग कर सकते हैं. वसीयत के जरिये स्व-अर्जित संपत्ति का बंटवारा मृत्यु के बाद प्रभावी होता है, जबकि गिफ्ट डीड तत्काल लागू होती है. पश्चिम बंगाल में स्टाम्प शुल्क और विशिष्ट कानूनी प्रक्रियाओं के लिए स्थानीय वकील से सलाह लेना उचित होगा.
