कोलकाता : कलकत्ता हाई कोर्ट ने नई राज्य सरकार द्वारा ओबीसी आरक्षण संबंधी जारी अधिसूचना पर रोक नहीं लगाई. हालांकि, उच्च न्यायालय ने कहा कि राज्य में ओबीसी आरक्षण का भविष्य क्या होगा, यह स्पष्ट नहीं है. इस मामले की सुनवाई बुधवार को न्यायमूर्ति तापोब्रता चक्रवर्ती और न्यायमूर्ति राजशेखर मंथर की खंडपीठ ने की. नई सरकार सत्ता में आई और उसने 74 समुदायों को छोड़कर एक नई ओबीसी सूची प्रकाशित की. इस सूची को चुनौती देते हुए उच्च न्यायालय में एक मामला दायर किया गया है.
आयोग से राय नहीं लेने का आरोप
आरोप है कि सर्वेक्षण किए बिना ही यह सूची तैयार की गई थी. आयोग की राय नहीं ली गई थी. परिणामस्वरूप, यह स्पष्ट नहीं है कि किस आधार पर यह सूची तैयार की गई या रद्द की गई. 18 मई को एक अधिसूचना जारी कर ओबीसी आरक्षण से 74 समुदायों को बाहर करने की घोषणा की गई थी. इस अधिसूचना को चुनौती देते हुए उच्च न्यायालय में यह जनहित याचिका दायर की गई थी.
ममता ने सात से 17 प्रतिशत किया था आरक्षण
तृणमूल सरकार के शासनकाल में ओबीसी आरक्षण 7 प्रतिशत से बढ़ाकर 17 प्रतिशत कर दिया गया था. इस संबंध में कलकत्ता हाई कोर्ट से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक मुकदमे दायर किए गए थे. कलकत्ता हाई कोर्ट ने 2010 के बाद जारी किए गए सभी ओबीसी प्रमाणपत्रों को रद्द करने का आदेश दिया था. उस समय भाजपा ने आरोप लगाया था कि तृणमूल सरकार ने वोट बैंक की राजनीति के लिए ओबीसी सूची का विस्तार किया है। बाद में, उच्च न्यायालय के फैसले को चुनौती देते हुए सर्वोच्च न्यायालय में एक मुकदमा दायर किया गया.
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भाजपा ने वापस लिया मुकदमा
भाजपा सरकार ने हाल ही में वह मुकदमा वापस ले लिया है. परिणाम स्वरूप, ओबीसी आरक्षण के संबंध में उच्च न्यायालय द्वारा दिया गया फैसला अभी भी लागू है. इस बीच, ओबीसी आरक्षण को 17 प्रतिशत से घटाकर 7 प्रतिशत कर दिया गया है. ममता बनर्जी के कार्यकाल की ओबीसी आरक्षण नीति को समाप्त कर दिया गया है. वर्तमान में, 66 जनजातियां इस आरक्षण के अंतर्गत आती हैं.
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