डोवर लेन म्यूजिक कॉन्फ्रेंस में झूमे श्रोता

यह प्रस्तुति रामपुर-सहसवान घराने की उस जीवंत परंपरा की सशक्त पुनर्पुष्टि थी, जो समय के साथ और अधिक परिपक्व होती चली आयी है.

उस्ताद गुलाम अब्बास खान व गुलाम हैदर खान की शानदार प्रस्तुति

कोलकाता. शास्त्रीय संगीत की पीढ़ियों को एक सूत्र में पिरोती एक अविस्मरणीय संध्या में उस्ताद ग़ुलाम अब्बास ख़ान और उनके पुत्र ग़ुलाम हैदर ख़ान ने डोवर लेन म्यूज़िक कॉन्फ़्रेंस के मंच पर अपनी प्रस्तुति से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया. यह प्रस्तुति रामपुर-सहसवान घराने की उस जीवंत परंपरा की सशक्त पुनर्पुष्टि थी, जो समय के साथ और अधिक परिपक्व होती चली आयी है. हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के सबसे प्रतिष्ठित मंचों में गिना जाने वाला डोवर लेन म्यूज़िक कॉन्फ़्रेंस वर्ष 1952 में कोलकाता के डोवर लेन क्षेत्र में संगीत प्रेमियों की एक छोटी-सी पहल के रूप में आरंभ हुआ था. जनवरी माह में आयोजित होने वाला यह कार्यक्रम चार-रात्रि का एक महान संगीत तीर्थ बन चुका है, जहां देश-विदेश से कलाकार और रसिक एकत्र होते हैं. राग, समय, सिद्धांत पर आधारित इसकी रात्रि-भर चलने वाली प्रस्तुतियां-संध्या, मध्यरात्रि और प्रभात रागों तक-इस महोत्सव की विशिष्ट पहचान बन चुकी हैं.

हिंदुस्तानी संगीत की प्राचीन और सम्मानित परंपराओं में से एक रामपुर-सहसवान घराने से संबंध रखने वाले उस्ताद ग़ुलाम अब्बास ख़ान इस शैली की समृद्ध गायकी के प्रमुख प्रतिनिधि हैं. उन्नीसवीं शताब्दी में उस्ताद इनायत हुसैन ख़ान से प्रारंभ हुई इस परंपरा की जड़ें उत्तर प्रदेश के रामपुर और सहसवान नगरों में हैं। यह घराना अपने सुदृढ़ स्वर-उत्पादन, जटिल तानों और लयात्मक सूक्ष्मता के लिए जाना जाता है, जिसमें ग्वालियर शैली का प्रभाव और ख़याल की गहन साधना स्पष्ट रूप से परिलक्षित होती है. उस्ताद ग़ुलाम अब्बास ख़ान, अपने पिता स्वर्गीय उस्ताद ग़ुलाम सादिक़ ख़ान, जो पद्मश्री सम्मानित और घराने के प्रमुख गायक थे, के शिष्य रहे हैं तथा वे उस्ताद मुश्ताक़ हुसैन ख़ान के पौत्र हैं, जिन्हें हिंदुस्तानी गायन में पद्म भूषण से सम्मानित होने का गौरव प्राप्त हुआ. दशकों की रियाजत से निखरी उनकी गायकी में शास्त्रीय अनुशासन और भावनात्मक गहरायी का अद्भुत संतुलन दिखाई देता है. ख़याल के अतिरिक्त ग़ज़ल, ठुमरी, दादरा, भजन और सूफ़ी रचनाओं में भी उनका समान अधिकार है. डोवर लेन में उनकी प्रस्तुति तकनीकी दक्षता और आत्मिक संवेदना का सजीव उदाहरण बनी.

अपने पिता के साथ मंच साझा करते हुए ग़ुलाम हैदर ख़ान (आदिल अब्बास ख़ान) रामपुर-सहसवान परंपरा की अगली कड़ी के रूप में उभरते हुए कलाकार हैं. बाल्यावस्था से ही पिता और पूर्वजों के मार्गदर्शन में प्रशिक्षित हैदर ख़ान की गायकी में राग की शुद्धता, भाव की गरिमा और एक युवा कलाकार की नयी दृष्टि का सुंदर समन्वय दिखाई देता है. ख़याल, तराना, ठुमरी और सूफ़ी रचनाओं में उनका आत्मविश्वासपूर्ण प्रस्तुतीकरण उनकी बढ़ती हुई कलात्मक पहचान का संकेत देता है. अपने 74वें संस्करण (22–25 जनवरी) में आयोजित डोवर लेन म्यूज़िक कॉन्फ़्रेंस पूर्वी भारत का ही नहीं, बल्कि संपूर्ण देश का एक प्रमुख हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत महोत्सव है.

डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

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By GANESH MAHTO

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