परहित ही परम धर्म : राजन जी (फोटो पेज पांच पर)
कोलकाता. जटायु जी से प्रभु श्री राम ने कहा-तात, जिसके मन में परहित बसता है, उसके लिए संसार में कुछ भी दुर्लभ नहीं होता. परहित का अर्थ अपने रिश्तेदार का हित नहीं अपितु उसका हित होता है जिससे हमारा कोई संबंध न हो. ना हम उसे जानते हैं और ना वह हमे जानता है. जब […]
कोलकाता. जटायु जी से प्रभु श्री राम ने कहा-तात, जिसके मन में परहित बसता है, उसके लिए संसार में कुछ भी दुर्लभ नहीं होता. परहित का अर्थ अपने रिश्तेदार का हित नहीं अपितु उसका हित होता है जिससे हमारा कोई संबंध न हो. ना हम उसे जानते हैं और ना वह हमे जानता है. जब ऐसे व्यक्ति का हम हित करते हैं तो वह परहित कहलाता है. मानस मंथन समिति द्वारा श्याम गार्डेन में नौ दिवसीय राम कथा के आठवें दिन मुख्य यजमान सपत्नीक रवि राय (गुड्डू राय) और भक्तों को संबोधित करते हुए उक्त बातें राजन जी महाराज ने कहीं. उन्होंने राम कथा को आगे बढ़ाते हुए कहा कि मनुष्य का शरीर मिलने के बाद भी जो भगवान का भक्त नहीं हो पाया उससे बड़ा कोई अभागा नहीं है. सबरी मां के प्रसंग में नवधा भक्ति की व्याख्या करते हुए पूज्यश्री महाराज ने कहा कि नवधा भक्ति के पीछे ना पड़े अपितु पहली भक्ति अर्थात संत की संगत करें. यदि जीवन में पहली भक्ति सध गयी तो पीछे की सारी भक्ति अपने आप ही सध जायेगी. राम कथा में आगे बढ़ते हुए राजन जी महाराज कहते हैं कि पंपा सरोवर के तट पर नारद जी से प्रभु श्रीराम कहते हैं कि संसार को वह मनुष्य जो संसार की सारी आशाओं का त्याग कर केवल मेरे भरोसे रहता है. उस जीव की मैं उसी प्रकार रक्षा करता रहता हूं जिस प्रकार मां अपने बच्चे की रक्षा करती है, लेकिन जिनको भगवान का प्रेम पाना है उन्हें मन से बालक बनना पड़ेगा. कार्यक्रम में रत्नाकर पांडे, दीपक राय, उमेश राय, सिया राम दास इत्यादि मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित थे.
