17 Great Freedom Fighters of Bengal: भारत की आजादी की लड़ाई में बंगाल का योगदान अद्वितीय और अद्भुत था. फिर वह सोच-विचार का मामला हो, क्रांति का या संस्कृति का. आज भी बंगाल के महान नेताओं और प्रतीकों को लेकर जो चर्चाएं और बहसें होती हैं, वे दिखाती हैं कि राष्ट्र के इतिहास में अपनी खास पहचान और यादों को बनाये रखने की राजनीति कितनी अहम है.
राष्ट्रवाद की सोच और क्रांति का केंद्र था बंगाल
स्वतंत्रता आंदोलन के समय बंगाल भारतीय राष्ट्रवाद की सोच और क्रांति का मुख्य केंद्र था. इसने जन आंदोलनों, क्रांतिकारी विचारों और सशस्त्र संघर्ष को आगे बढ़ाया. कवि गुरु रवींद्रनाथ टैगोर, नेताजी सुभाष चंद्र बोस और बंकिम चंद्र चटर्जी जैसे महान व्यक्तित्वों ने इस आंदोलन की सांस्कृतिक और वैचारिक नींव रखी.
प्रसिद्धि की लालच के बिना लड़ी आजादी की लड़ाई
भारत के स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास वीरता, बलिदान और दृढ़ संकल्प की कहानियों से भरा पड़ा है. कुछ नाम इतिहास के पन्नों में चमकते हैं, तो आजादी के कुछ नायकों का संघर्ष बहुत महान था, लेकिन उनके बारे में बहुत कम लोगों को पता है. आईए, पश्चिम बंगाल के ऐसे ही 17 गुमनाम स्वतंत्रता सेनानियों के बारे में जानते हैं, जिन्होंने प्रसिद्धि की लालच के बगैर भारत के स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी.
बंगाल के गुमनाम/कम प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी
- मातंगिनी हाजरा (गांधी बूढ़ी) : ‘गांधी बूढ़ी’ के नाम से मशहूर मातंगिनी हाजरा पूर्व मेदिनीपुर जिले की रहने वाली थीं. 73 वर्ष की आयु में भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान तिरंगा थामे हुए ब्रिटिश हुकूमत की गोलियों का सामना करते हुए देश की बलिदेवी पर शहीद हो गयीं.
- विनय, बादल और दिनेश : ये तीनों युवा स्वतंत्रता सेनानी कोलकाता के राइटर्स बिल्डिंग पर जेल महानिरीक्षक सिम्पसन की हत्या के लिए किये गये अपने साहसिक हमले के लिए जाने जाते हैं. उनका बलिदान इतिहास में अंकित है.
- कल्पना दत्त : चटगांव शस्त्रागार पर हमले की प्रमुख क्रांतिकारी नायिका ने भारत छोड़ो आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभायी थी. मास्टर दा के नाम से मशहूर सूर्य सेन के समूह से जुड़ीं कल्पना को अंग्रेजों ने गिरफ्तार कर आजीवन कारावास की सजा दी. हालांकि, वह कभी अपने उद्देश्य से अडिग नहीं हुईं.
- सूर्य सेन : ‘मास्टरदा’ के नाम से मशहूर सूर्य सेन एक बड़े क्रांतिकारी नेता थे. उन्होंने वर्ष 1930 के चटगांव विद्रोह का नेतृत्व किया था. अंग्रेजों के खिलाफ उन्होंने एक बड़े विद्रोह को प्रेरित करने के लिए चटगांव शस्त्रागार पर सशस्त्र हमला किया था.
- शांति घोष और सुनीति चौधरी : नारीवादी और महिला अधिकारों की हिमायती शांति घोष और सुनीति चौधरी जब स्कूल में पढ़तीं थीं, तभी ब्रिटिश जिलाधिकारी स्टीवर्ट की गोली मारकर हत्या कर दी थी. उस वक्त दोनों की उम्र 14-15 वर्ष रही होगी. राष्ट्रवाद के प्रति जागरूकता फैलाने में इन दोनों बेटियों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभायी थी. असहयोग आंदोलन में भी उन्होंने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया था.
- संतोष मित्रा : महात्मा गांधी के समर्पित अनुयायी संतोष मित्रा एक वकील थे. उन्होंने सविनय अवज्ञा आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभायी थी. उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम के समर्थन में विरोध प्रदर्शनों और रैलियों के आयोजन में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी थी.
- उज्ज्वला मजूमदार : बंगाल की एक निडर क्रांतिकारी महिला थीं. उन्होंने जुझारू तरीके से गुप्त क्रांतिकारी गतिविधियों में भाग लिया.
- कमला दासगुप्ता : क्रांतिकारी पार्टी ‘जुगांतर’ की सदस्य थीं. इन्होंने स्वतंत्रता सेनानियों को हथियार उपलब्ध करवाये. साथ ही जंग-ए-आजादी के दीवानों को पुलिस से छिपने में भी मदद की.
- सुहासिनी गांगुली : सूर्य सेन उर्फ मास्टर दा और अन्य क्रांतिकारियों को सुरक्षित जगह उपलब्ध करवाने और उनकी गुप्त योजनाओं को सफल बनाने के लिए साज-ओ-सामान की आपूर्ति करने वाली प्रमुख महिला कार्यकर्ता थीं.
- अनंतहारी मित्र : ब्रिटिश दमन के खिलाफ आवाज उठाने वाले और जेल में ऐतिहासिक संघर्ष करने वाले प्रमुख क्रांतिकारी थे.
- दिनेश चंद्र मजूमदार : राइटर्स बिल्डिंग पर हमले और ब्रिटिश अधिकारियों के खिलाफ की गयी साहसिक कार्रवाइयों के लिए इन्हें कम उम्र में ही फांसी दे दी गयी थी.
- बीना दास : ब्रिटिश शासन का विरोध करने के लिए बीना दास ने कलकत्ता विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में दीक्षा लेते समय ब्रिटिश गवर्नर पर गोली चला दी थी. अंग्रेजी शासन के खिलाफ सशस्त्र गतिविधियों में भाग लेने वाली शुरुआती महिलाओं में थीं. राजनीतिक कैदियों के साथ होने वाले अमानवीय व्यवहार के विरोध में बीना दास ने वर्ष 1932 में बंगाल के गवर्नर स्टेनली जैक्सन की हत्या की कोशिश की थी.
- सतीश चंद्र सामंता : ‘मास्टर दा’ के नाम से मशहूर सतीश चंद्र सामंता वर्ष 1930 के चटगांव विद्रोह के एक नेता थे. उन्होंने आंदोलन के लिए हथियार जुटाने के उद्देश्य से चटगांव शस्त्रागार पर एक छापे में युवा क्रांतिकारियों के एक समूह का नेतृत्व किया था.
- प्रीतिलता वद्देदार : महज 21 साल की उम्र में इस बहादुर बंगाली क्रांतिकारी ने स्वतंत्रता आंदोलन में अदम्य साहस का परिचय दिया था. ‘मास्टर दा’ के नाम से मशहूर सूर्य सेन के चटगांव शस्त्रागार आंदोलन से जुड़ीं. ब्रिटिश विरोधी यूरोपियन क्लब पर हुए हमले का प्रीतिलता वद्देदार ने नेतृत्व किया. जब अंग्रेजों की पुलिस ने उन्हें पकड़ लिया, तो प्रीतिलता ने जहर खाकर जान दे दी. उनके इस बलिदान ने महिलाओं को स्वतंत्रता आंदोलन में कूदने के लिए प्रेरित किया.
(नोट : विनय-बादल और दिनेश के अलावा शांति घोष और सुनीति चौधरी के बारे में एक साथ जानकारी दी गयी है, इसलिए इस लिस्ट में स्वतंत्रता की संख्या 14 दिख रही है, लेकिन हमने कुल 17 स्वतंत्रता सेनानियों के बारे में यहां जानकारी दी है.)
