संतों का सुझाव : हिंदू नववर्ष को राष्ट्रीय अवकाश घोषित करें मोदी

भारत में संपूर्ण जीवन को वेदों से नियंत्रित किया गया है. अनादिकाल से ही परंपरा है कि सनातन धर्मावलंबी (हिंदू) चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से ही नववर्ष का शुभारंभ मानते हैं. लेकिन अंग्रेजों के आने के पश्चात हमारे देश में एक जनवरी को नयी पीढ़ियों ने नववर्ष मनाना शुरू कर दिया. वे इस नये वर्ष को […]

भारत में संपूर्ण जीवन को वेदों से नियंत्रित किया गया है. अनादिकाल से ही परंपरा है कि सनातन धर्मावलंबी (हिंदू) चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से ही नववर्ष का शुभारंभ मानते हैं. लेकिन अंग्रेजों के आने के पश्चात हमारे देश में एक जनवरी को नयी पीढ़ियों ने नववर्ष मनाना शुरू कर दिया. वे इस नये वर्ष को मनायें, कोई बात नहीं है. लेकिन जिस तरह से इसे मनाया जा रहा है, वह तरीका ठीक नहीं है, भारतीय संस्कृति के अनुकूल नहीं.

नयी पीढ़ी नववर्ष को मनाने के लिए ‘खाओ-पीओ और मौज करो‘ का सिद्धांत अपनाती दिख रही है. यह दृष्टि ठीक नहीं है. मैं लोगों का आह्वान करता हूं कि वे राष्ट्र और राष्ट्रीयता के नाम पर केवल एक स्वर में ही बोलें. मैं तो मोदी सरकार से आग्रह करता हूं कि वह हिंदू नववर्ष के अवसर परचैत्र शुक्ल प्रतिपदा को राष्ट्रीय अवकाश घोषित करे.
निर्वाण पीठाधीश्वर आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी विशोकानंद
चैत्र शुक्ल प्रतिपदा है भारतीय नववर्ष का शुभारंभ
सृष्टि का प्रादुर्भाव चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को ही हुआ है. हिंदू शास्त्रों के अनुसार, इसी दिन से नये साल का प्रारंभ माना जाता है. यहीं से काल गणना भी की जाती है. इस अनादिकालीन परंपरा को छोड़ कर कुछ लोग पाश्चात्यकालीन परंपरा के हिसाब से इसे मना रहे हैं. आजादी के बाद से देश में इसका धूम ज्यादा दिख रहा है.
यह हमारी संस्कृति से न केवल मेल नहीं खाता, बल्कि यह हमारी जीवन-पद्धति व सभ्यता-संस्कृति के लिए अपमानजनक लगता है. बिना समझ-बूझ के जिस फूहड़पन के साथ हू-हा, अनाप-शनाप करते हुए पागलपन से नववर्ष मनाया जा रहा है, उसे देख कर तरस ही आती है. केंद्र सरकार को मेरा सुझाव है कि वह हिंदू नववर्ष के अवसर पर राष्ट्रीय अवकाश की घोषणा करे. इससे सरकार व समाज, दोनों को लाभ होगा. जनता प्रसन्न होगी.
सिंहस्थ पीठाधीश्वर स्वामी क्षमाराम
सबमें हो सद्विचार, सद्भाव व राष्ट्रप्रेम का संचार
उत्सव मनाना हमारी भारतीय संस्कृति की परंपरा है. पाश्चात्य संस्कृति से जुड़े नववर्ष को मनाने में कुछ गलत भी नहीं है. पर, इसे अपनी संस्कृति के अनुरूप ही मनाना चाहिए. इस दिन यह आकलन करना चाहिए कि बीते हुए वर्ष में हमने क्या-क्या अच्छा किया और नये वर्ष में उससे अच्छा क्या कुछ कर सकते हैं. होना तो यह चाहिए कि हम नये वर्ष का स्वागत पूजा-पाठ, हवन, भजन-कीर्तन आदि के बीच प्रभु का स्मरण करते हुए करें.
धार्मिक और सामाजिक कार्यों को नववर्ष पर प्रोत्साहित करना चाहिए. प्रभु चरण में मेरी प्रार्थना है कि सबके मन में सद्विचार, सद्भाव व राष्ट्रप्रेम की भावना भरें. भारत सरकार से निवेदन है कि वह चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को राष्ट्रीय अवकाश की घोषणा करे, ताकि भारतीय अपनी आध्यात्मिक व सांस्कृतिक चेतना को जागृत कर सकें.
स्वामी गिरीशानंद सरस्वती
हम सन् 2020 में प्रवेश कर चुके हैं. वैसे हमारे सनातन धर्म के अनुसार काल भगवान का ही स्वरूप है तथा वह अविनाशी हैं, जिसका कोई आदि नहीं, जिसका कोई अंत नहीं है.
जो आदि, मध्य और अंत से रहित है. ऐसे काल स्वरूप भगवान में, वैसे दार्शनिक दृष्टि से देखा जाये, तो क्या नया साल और क्या साल का अंत. सभी धर्म के लोग, कभी-कभी एक ही धर्म में भी अलग-अलग प्रांतों के लोग अपने नये वर्ष का शुभारंभ अलग-अलग तिथियों में मानते हैं.
हमारे यहां आषाढ़ द्वितीया, शुक्ल द्वितीया से नये साल का आरं‍भ माना जाता है. हम सनातन धर्मावलंबी चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को नये वर्ष का आरंभ मानते हैं और इसाई लोग एक जनवरी से नया वर्ष मनाते हैं. वास्तव में ये नये वर्ष की जो बात है, कुछ नया करने, कुछ नया सोचने की.
पुराने से कुछ सीख कर फिर कुछ नया निर्णय करने का अवसर हमको प्रदान करता है. मैं प्रभात खबर के सभी पाठकों को नये वर्ष की शुभकामनाएं प्रदान करता हूं और हम नये बने, इसका यह अवसर है. कुछ ऐसा नया, कुछ ऐसा परिवर्तन, जो हमारा भी कल्याण भी करे और हमारे आसपास वालों का भला करे, हमारे जीवन में आये. आप सभी को बहुत-बहुत शुभकामनाएं.
भाई श्री रमेश भाई ओझा

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