दुष्कर्म रोकने के लिए अपने आप में बदलाव जरूरी

दुष्कर्म के कारण और रोकथाम पर प्रभात खबर कार्यालय में आयोजित परिचर्चा में वक्ताओं ने नैतिकता पर दिया जोर कोलकाता : हैदराबाद में वेटनरी डॉक्टर के साथ सामूहिक दुष्कर्म कांड ने समूचे देश को झकझोर दिया है. एक बार फिर से दुष्कर्म के कारणों और उसे रोकने के उपायों पर चर्चा शुरू हो गयी है. […]

दुष्कर्म के कारण और रोकथाम पर प्रभात खबर कार्यालय में आयोजित परिचर्चा में वक्ताओं ने नैतिकता पर दिया जोर

कोलकाता : हैदराबाद में वेटनरी डॉक्टर के साथ सामूहिक दुष्कर्म कांड ने समूचे देश को झकझोर दिया है. एक बार फिर से दुष्कर्म के कारणों और उसे रोकने के उपायों पर चर्चा शुरू हो गयी है. प्रभात खबर कार्यालय में इस विषय पर आयोजित परिचर्चा में विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े वक्ताओं ने दुष्कर्म के कारणों और इसके रोकथाम पर चर्चा की. कमोबेश सभी वक्ताओं का मानना था कि नैतिकता की शिक्षा बेहद जरूरी है. जरूरी नहीं कि यह शिक्षा केवल स्कूलों में ही दी जाये. कई वक्ताओं ने दुष्कर्म के पीछे अन्य कारण भी बताये.
डॉ राकेश यादव (शिक्षक) : भारत में आदिकाल से देवी पूजा की जाती रही है, लेकिन नैतिकता के पतन के साथ हालात बदल गये हैं. अंग्रेजी शिक्षा व्यवस्था को अपना कर और पारंपरिक भारतीय शिक्षा पद्धति को भुला कर इंसान रोबोट बनते जा रहा है. फिल्मों में भी नारी की भूमिका महज शो पीस रह गयी है. इन सबने मानसिकता को प्रभावित किया है. आज की जरूरत बच्चों को ‘गुड टच-बैड टच’ के संबंध में सिखाने की है. स्कूल में यौन शिक्षा भी होनी चाहिए. लड़कियों को आत्मरक्षा के गुर भी सिखाया जाना चाहिए.
शारद चौधरी (शिक्षिका) : प्राय: देखा जाता है कि लड़कियां रोजमर्रा के जीवन में आपबीती घटनाओं को सार्वजनिक नहीं करतीं. घर में अभिभावकों को भी बेटियों की सुरक्षा की चिंता सताती रहती है. दुष्कर्म जैसी घटनाओं के रोकथाम के लिए अभिभावकों को अपने बच्चों को शुरू से ही शिक्षित करना चाहिए. अपने लड़कों की लाइफस्टाइल को लेकर भी उन्हें उतना ही सजग होना चाहिए. समाज में लड़कों को यौन शिक्षा नहीं दी जाती. यह भी जरूरी है.
रेवा टिबड़ेवाल (वेब पोर्टल एडिटर): यह बेहद जरूरी है कि कुछ गलत होने पर लड़कियां उसके संबंध में आवाज उठायें. जिस ट्रॉमा से वह गुजर रही हैं, उसके संबंध में वह अभिभावकों से बात करें. खामोश रहने से अपने जीवन पर इसका काफी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है. केवल लड़कों को शिक्षित करने से ही मामले का हल नहीं निकल सकता. समाधान कई मोर्चों पर होना चाहिए.
आशा पांडेय (वेब पोर्टल एडिटर): यह देखा जाता है कि दो पुरुषों की लड़ाई में गाली-गलौज घरों की महिलाओं को लेकर ही दी जाती है. रोकथाम वहां से शुरू होनी चाहिए. यदि आप किसी को गाली देते देखते हैं तो आप जरूर उसे रोकें. जरूरी नहीं कि आप उनसे परिचित ही हों. महिलाओं को नीचा दिखाने की शुरुआत गालियों से ही होती है. इसके अलावा शहरीकरण ने लोगों की मानसिकता को भी बदल दिया है. महिलाओं को बराबरी का दर्जा मिलना चाहिए, हालांकि एक दिन में यह चमत्कार नहीं हो सकता.
सुनील सोनकर (सामाजिक कार्यकर्ता): दुष्कर्मी किस समाज से आते हैं, उन्हें भी चिह्नित किया जाना चाहिए. प्राय: देखा जाता है कि प्रशासन सजा दिलाने के मोर्चे पर कमजोर पड़ जाता है. पीड़ितों का एफआइआर लेने में टालमटोल करता है. कानून को और कठोर बनाया जाना चाहिए.
संदीप सिंह (अधिवक्ता): लोगों ने अपनी संस्कृति और दर्शन को भुला दिया है. लोग शिक्षित तो हुए हैं, लेकिन विद्या का स्तर गिरा है. चरित्र निर्माण सर्वाधिक जरूरी है. स्कूलों में और घरों में नैतिक शिक्षा दी जानी चाहिए. घरों के बच्चों पर ध्यान देना चाहिए. उसके सवालों, उसकी जिज्ञासा से मुंह नहीं मोड़ना चाहिए. पारंपरिक भारतीय पद्धति की जड़ों के टूटने की वजह से नैतिकता का पतन हुआ है. यूरोपीय सोच भारत में नहीं चल सकती.
मोहम्मद फाहिद (अधिवक्ता): पाश्चात्य संस्कृति की बजाय भारतीय संस्कृति को आगे लाना जरूरी है. विदेशों की बेतहाशा नकल ने हमें इस हाल में पहुंचाया है. हालात को संभालने के लिए शिक्षा व्यवस्था में नैतिक मूल्यों के समावेश के साथ-साथ कानून को भी सख्ती से लागू करने की जरूरत है.
विकास बंसल अग्रवाल (अधिवक्ता): दुष्कर्म केवल लड़कियों के साथ सीमित नहीं है. भारत पुरुष प्रधान समाज है. महिलाओं को दबाने के लिए दुष्कर्म की घटनाओं को कुछ लोग अंजाम देते हैं. दुष्कर्मी केवल शरीर के साथ दुष्कर्म नहीं करता, बल्कि भावनात्मक तौर पर पीड़िता को तोड़ देता है.
दुष्कर्म की घटनाएं हर जीव-जंतु में होती है, लेकिन सजा देना सर्वाधिक जरूरी है. केवल शिक्षा से हालात नहीं सुधरेेंगे. प्राकृतिक न्याय की पद्धति से हट जाने की वजह से हालात यहां तक पहुंचे हैं. कानून को और कठोर बनाना जरूरी है. लोगों के मन में डर बैठाना जरूरी है. आम नागरिक कानून तो नहीं बना सकता, लेकिन इसके लिए सरकार पर दबाव जरूर डाल सकता है.
पारस यादव (अधिवक्ता): नैतिक शिक्षा के अभाव में सोच हिंसक होती जा रही है. दोषी को सजा देना जरूरी है. इसके लिए कानून का सख्त होना आवश्यक है. कानून को सही तरीके से लागू करना जरूरी है. मीडिया के लिए भी जरूरी है कि वह पीड़िता के साथ हुई घटना के अलावा जब दोषी को सजा मिलती है, तो उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित करे.
आनंद सिंह (काॅर्पोरेट जगत से जुड़े): नैतिक शिक्षा का पतन आखिर क्यों हो रहा है. संयुक्त परिवार खत्म होते जा रहे हैं. दादा-दादियों की भूमिका समाप्त हो गयी है. लोगों में स्वार्थ घर करता जा रहा है. लोग विलासी हो रहे हैं और उनकी जीवनशैली में बदलाव हो रहा है. इस दिशा में ध्यान देना जरूरी है.
पार्थ प्रतीम राय (कलाकार): संस्कृति का आदान-प्रदान लोगों में कम होता जा रहा है. यह देखा जाता है कि अधिकतर अपराधी निम्न वर्ग से आते हैं. इन अपराधियों के मन में यह भावना बसी रहती है कि उच्च वर्ग के लोग उनके दुश्मन हैं. रोकथाम के लिए बदलाव कई स्तर पर होने चाहिए.
माहेश्वर सिंह (कार्पोरेट जगत से जुड़े): प्राय: यह देखा गया है कि दुष्कर्म के साथ शराब प्रमुखता के साथ जुड़ी होती है. दुष्कर्म रोकने के लिए शराबबंदी एक महत्वपूर्ण कदम हो सकता है. घरों में भी बेटियों के साथ-साथ बेटों पर भी मां-बाप को कड़ाई करनी चाहिए. अनुशासन की शिक्षा घर से ही मिलनी चाहिए. इसके अलावा तामसी भोजन के प्रभाव के संबंध में सोचने का वक्त आ गया है.
ऋतु मिश्रा (इंटीरियर डिजाइनर): जरूरत खुद में झांकने की है. पारंपरिक रीति-रिवाजों में प्राय: छेड़छाड़ देखा जाता है. दुष्कर्म को रोकना है तो रोकथाम वहां से शुरू की जानी चाहिए. छेड़खानी को बढ़ावा घर में भी नहीं देना चाहिए. दुष्कर्मी किसी समुदाय विशेष से नहीं आता. कुंठित व्यक्ति ही दुष्कर्म करते हैं. रोकथाम की दिशा में जागरूकता बड़ा कदम है. यह जागरूकता समाज से पहले खुद में और अपने घरों में फैलानी चाहिए. दुष्कर्म पर रोकथाम तभी कारगर होगा, जब महिलाओं और पुरुषों की बराबरी सच्चे मन से हो.

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