कोलकाता : विधानसभा में गुरुवार को पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी, लोकसभा के पूर्व अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी व विधानसभा में पूर्व विपक्ष के नेता पंकज बनर्जी के शोक प्रस्ताव पर राजनीति हावी रही.
शहरी विकास व दमकल मामलों के मंत्री फिरहाद हकीम ने भाजपा द्वारा पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी व माकपा द्वारा पूर्व लोकसभा अध्यक्ष श्री चटर्जी के आदर्शों के पालन पर सवाल उठाया. श्री हकीम ने कहा कि वाजपेयी जी सभी को साथ लेकर राजनीति करते थे.
स्वर्ण चतुर्भुज का निर्माण कर दूरदर्शिता का परिचय दिया था, लेकिन वाजपेयी के आदर्श की बात कहनेवाली भाजपा उनकी अस्थि कलश को लेकर पूरे देश में यात्रा करती है, लेकिन सभी पार्टियों व समाज के सभी वर्ग के लोगों को एक साथ लेकर चलने के उनके सिद्धांत का अनुकरण नहीं करती है. यदि मैं मुस्लिम धर्म का पालन करता हूं, तो मोहम्मद साहब की वाणी हमारे लिए अनुकरणीय है.
ऐसा नहीं होना चाहिए कि बोले कुछ और, करें कुछ और. उसी तरह से पूर्व लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी ने धर्मनिरपेक्षता की मिसाल पेश की थी. विधायिका और न्यायालय के मामले में विधायिका के पक्ष में राय दी थी, लेकिन उन्हें ही पार्टी से निलंबित कर दिया गया. माकपा के उनके प्रति व्यवहार से केवल वे नहीं, बल्कि उनके परिवार वाले भी दुखी और व्यथित हैं.
शोक प्रस्ताव में इन बातों को उठा कर राजनीति करने के आरोप पर श्री हकीम ने कहा कि उनके हृदय में नेताओं के प्रति आपार श्रद्धा है, लेकिन इसके साथ ही इन नेताओं के प्रति इनकी पार्टियों ने जो व्यवहार किया. उसकी पीड़ा है और उन्होंने अपनी पीड़ा ही व्यक्त की है.
दूसरी ओर, माकपा विधायक दल के नेता सुजन चक्रवर्ती ने कहा कि पूर्व लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी ने वोट के बदले नोट के मामले में 12 दिनों का समय लेकर 11 सांसदों के खिलाफ कार्रवाई की थी.
लेकिन नारदा मामले में ऐसा कुछ नहीं हुआ. श्री चक्रवर्ती ने दिवंगत वाजपेयी के संबंध में कहा कि राजनीति में मत और आदर्श अलग-अलग होते हैं, लेकिन वह स्टेट्समैन थे. गुजरात दंगे के समय उन्होंने राजधर्म पालन की बात कही थी. विधानसभा के पूर्व विपक्ष के नेता पंकज बनर्जी राजनीति से अलग हो गये थे, लेकिन अाम लोगों के साथ उनका संपर्क सदा ही बना रहा.
भाजपा के विधायक दिलीप घोष ने कहा कि पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी न केवल अपने पार्टी के नेताओं को मदद की थी, लेकिन दूसरे पार्टी के नेताओं को भी अभिभावक का प्यार दिया था, जब भी वह अकेले होते हैं, तो अटल जी की कविता पढ़ते हैं. बंगाल की राजनीति में अटल जैसे नेता का अभाव दिखता है.
