पूजा में उजड़ जाते हैं लाखों के रैन बसेरे, फुटपाथ पर रहनेवालों में नहीं रहता है दुर्गापूजा का आनंद

कोलकाता : राज्य की दुर्गापूजा न केवल देश में बल्कि पूरे विश्व में लोकप्रिय है. लाखों लोग पूजा के समय राजधानी कोलकाता में आते हैं, यहां के पंडालों, मूर्तियों, थीम व लाइटिंग को देखने के लिए. इस वक्त भी समूचा महानगर पूजा के रंग में डूबा हुआ है, लेकिन फुटपाथ पर रहनेवाले, पूजा के इस […]

कोलकाता : राज्य की दुर्गापूजा न केवल देश में बल्कि पूरे विश्व में लोकप्रिय है. लाखों लोग पूजा के समय राजधानी कोलकाता में आते हैं, यहां के पंडालों, मूर्तियों, थीम व लाइटिंग को देखने के लिए. इस वक्त भी समूचा महानगर पूजा के रंग में डूबा हुआ है, लेकिन फुटपाथ पर रहनेवाले, पूजा के इस चकाचौंध से कोसों दूर हैं.
या यूं कहें कि पूजा इनके लिए खुशी नहीं बल्कि दुख लेकर आता है. अपने रैन बसेरे से उजड़ने का दुख क्योंकि पूजा के दौरान दर्शनार्थियों के लिए फुटपाथ को खाली करा दिया जाता. गरीबी के मार झेल रहे इन फुटपाथवासियों को बेरहमी से खदेड़ दिया जाता है.
तकरीबन एक लाख लोग रहते हैं फुटपाथ पर
कोलकाता नगर निगम के एक अधिकारी तथा मेडिकल बैंक के सचिव डी आशीष के अनुसार महानगर में करीब एक लाख लोग फुटपाथ पर रहते हैं. सबसे अधिक फुटपाथवासी उत्तर कोलकाता में रहते हैं. इनमें गरियाहाट, टालीगंज, पार्क स्ट्रीट, धर्मतल्ला, सियालदह और श्यामबाजार प्रमुख हैं. पूजा के दौरान कोलकाता पुलिस और विभिन्न पूजा कमेटियां फुटपाथ को खाली करवा देती हैं. ताकि मंडप में देवी दर्शन के लिए पहुंचनेवाले लोगों को पैदल चलने में कोई परेशानी ना हो.
प्रशासन या पूजा कमेटी करे व्यवस्था
डी आशीष का कहना है कि यह सही है कि पूजा के दौरान बहुत अधिक भीड़ उमड़ती है. इसी को ध्यान में रखते हुए फुटपाथ को खाली करवा दिया जाता है. पर बरसों से फुटपाथ ही जिनकी जिंदगीं हैं उन्हें उत्सव के माहौल में उजाड़ देना भला कहां की नैतिकता है? हर साल पूजा में करोड़ों रुपये खर्च होते हैं, कितना अच्छा होता कि पूजा के दौरान कमेटियों की ओर से फुटपाथ पर रहनेवालों के लिए कहीं कैंप लगा दिया जाता.
अगर पूजा के दौरान इनके रहने के लिए प्रशासन या विभिन्न पूजा कमेटियों की ओर से यह व्यवस्था की जाये तो बेहतर होगा, क्योंकि राज्य सरकार व निगम के पास नाइट शेल्टर या होम का टोटा है. उत्सव पर सबका अधिकार है. उत्सव के माहौल में फुटपाथ पर रह रहे लोगों को इधर-उधर खदेड़ने से फुटपाथी बच्चों के खोने का भय रहता है.
पेट ही सबसे बड़ी पूजा है
पूजा के रौनक से गुलजार महानगर में जब हमने फुटपाथ पर रहनेवाले ऐसे ही कुछ बच्चों से बात की कि वे इस त्योहार को किस नजर से देखते हैं. पार्क स्ट्रीट में गुब्बार बेचनेवाले 16 वर्षीय जुनैद ने बताया कि सर, हमारे लिए पूजा कोई उत्सव नहीं है बल्कि कमाई का जरिया है.
इस दौरान मैं अपने दो भाइयों के साथ पूजा मंडपों के बाहर बैलून बेचता हूं.
मेरे अब्बू की मौत हो गयी है. हमें ईद का भी ऐसे ही इंतजार होता है. कुछ पैसे मिल जाते हैं. भरपेट खाना नसीब हो जाता है. कुछ ऐसा ही कहना है सात साल कि रधिया, छोटू और जीवन का. सर, जिस दिन हमें पेट भर खाना मिलता है वह दिन ही हमारे लिए उत्सव का होता है, नहीं तो तीसों दिन ही उपवास और रोजा है.

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