Biswanath Pariyal Joins BJP| अविनाश यादव, दुर्गापुर : पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 से पहले शनिवार को दुर्गापुर में एक बड़ा राजनीतिक फेरबदल हुआ. तृणमूल कांग्रेस के कद्दावर और हेवीवेट नेता विश्वनाथ परियाल ने टीएमसी को अलविदा कहते हुए भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का दामन थाम लिया.
केंद्रीय गृह राज्यमंत्री सुकांत मजूमदार ने उन्हें पार्टी का झंडा थमाकर बीजेपी में शामिल कराया. इस मौके पर पूर्व सांसद एसएस अहलूवालिया और दुर्गापुर पश्चिम से बीजेपी उम्मीदवार लखन घोरुई भी मौजूद थे. विश्वनाथ परियाल का बीजेपी में जाना औद्योगिक क्षेत्र में तृणमूल के लिए एक बड़ी क्षति माना जा रहा है.
साइडलाइन किये जाने से थे नाराज, अभिमान ने छुड़ाया साथ
विश्वनाथ परियाल की नाराजगी काफी समय से चर्चा का विषय बनी हुई थी. पिछले कुछ समय से तृणमूल कांग्रेस के बड़े कार्यक्रमों में उन्हें जगह नहीं मिल रही थी. विधानसभा चुनाव की घोषणा के बाद भी पार्टी सुप्रीमो ममता बनर्जी द्वारा तवज्जो न दिये जाने से वे खुद को अपमानित महसूस कर रहे थे. 2021 के चुनाव में हार के बाद उन्हें तृणमूल ट्रेड यूनियन के जिलाध्यक्ष पद से हटा दिया गया था. तभी से वे पार्टी में खुद को साइडलाइन महसूस कर रहे थे.
बंगाल की खबरें पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें
सियासी सफर : सीपीएम के गढ़ में अकेले लड़ने वाला योद्धा
विश्वनाथ परियाल का राजनीतिक इतिहास काफी प्रभावशाली रहा है.
- अकेला विरोधी : सीपीएम के शासन काल के दौरान दुर्गापुर नगर निगम में वे तृणमूल कांग्रेस के एकमात्र कद्दावर विरोधी दल के नेता थे.
- 2016 का खेला : वर्ष 2016 में टिकट न मिलने पर उन्होंने कांग्रेस का दामन थामा और दुर्गापुर पश्चिम सीट से टीएमसी के अपूर्व मुखर्जी को भारी अंतर से हराकर अपनी लोकप्रियता साबित की थी.
- वापसी और फिर हार : बाद में वे फिर तृणमूल में लौटे, लेकिन 2021 के चुनाव में वे बीजेपी के लखन घोरुई से हार गये. इसी हार के बाद पार्टी के भीतर उनका रसूख कम होने लगा था.
इसे भी पढ़ें : कुल्टी की सड़कों पर उतरे ‘महागुरु’, अजय पोद्दार के लिए किया रोड शो, SIR पर चुनाव आयोग का किया बचाव
Biswanath Pariyal Joins BJP: औद्योगिक बेल्ट पर पड़ेगा असर
विश्वनाथ परियाल की पकड़ दुर्गापुर के श्रमिक संगठनों और आम जनता के बीच काफी मजबूत मानी जाती है. उनके बीजेपी में शामिल होने से दुर्गापुर पश्चिम और आसपास की सीटों पर चुनावी समीकरण बदल सकते हैं. अब देखना यह है कि विश्वनाथ परियाल का यह ‘अभिमान’ तृणमूल को चुनाव में कितना भारी पड़ता है.
