रांची: झारखंड के गांवों, साप्ताहिक हाटों और मेलों में कभी-कभार दिखाई देने वाली मुर्गा लड़ाई को लेकर एक सवाल हमेशा दिलचस्प रहा है- आखिर इसकी शुरुआत झारखंड में कब और कहां हुई थी? इसका जवाब इतिहास के उपलब्ध दस्तावेजों में साफ तौर पर नहीं मिलता. किसी प्रमाणित रिकॉर्ड में यह दर्ज नहीं है कि झारखंड के किस गांव या इलाके में पहली बार दो मुर्गों को लड़ाया गया था. हालांकि, इतना जरूर सामने आता है कि यह परंपरा आदिवासी समाज में कई पीढ़ियों से चली आ रही है और लंबे समय तक ग्रामीण मनोरंजन का हिस्सा रही है.
इतिहास में पहला मैदान आज भी रहस्य
झारखंड में मुर्गा लड़ाई की शुरुआत को लेकर कोई निश्चित वर्ष, स्थान या व्यक्ति का नाम इतिहास में दर्ज नहीं है. उपलब्ध स्थानीय रिपोर्टों में भी कहा गया है कि इसके आरंभ की प्रमाणिक जानकारी इतिहास के पन्नों में नहीं मिलती. इसके बावजूद लोहरदगा, गुमला, सिमडेगा, पूर्वी सिंहभूम और पश्चिमी सिंहभूम समेत कई इलाकों में मुर्गा लड़ाई लंबे समय से स्थानीय मेलों और बाजारों से जुड़ी रही है.
यही वजह है कि इसके इतिहास को समझने के लिए लिखित दस्तावेजों के साथ-साथ मौखिक परंपरा और मानवशास्त्रीय अध्ययनों का सहारा लेना पड़ता है.
19वीं सदी में भारत के ग्रामीण इलाकों में मिलते हैं प्रमाण
मुर्गा लड़ाई सिर्फ झारखंड तक सीमित परंपरा नहीं रही है. 2018 में प्रकाशित मानवशास्त्रीय अध्ययन Historic Cockfight among the Santals: An Anthropological View में शोधकर्ता ने लिखा है कि भारत के ग्रामीण इलाकों, खासकर आदिवासी समुदायों में, 19वीं सदी में मुर्गा लड़ाई स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगी थी. अध्ययन में इसके ग्रामीण बंगाल में गहरे सामाजिक आधार का भी उल्लेख है.
इससे यह संकेत जरूर मिलता है कि झारखंड के पड़ोसी और ऐतिहासिक रूप से जुड़े क्षेत्रों में भी यह परंपरा पुरानी रही होगी. लेकिन इसे सीधे झारखंड में मुर्गा लड़ाई की शुरुआत का प्रमाण मानना उचित नहीं होगा.
संताल समाज में मुर्गा लड़ाई का सामाजिक पहलू
मुर्गा लड़ाई को लेकर किए गए मानवशास्त्रीय अध्ययन में संताल समाज में इसके सामाजिक महत्व का भी उल्लेख मिलता है. पश्चिम बंगाल के पश्चिम मेदिनीपुर जिले के एक संताल गांव में किए गए अध्ययन के अनुसार मुर्गा लड़ाई केवल दो पक्षियों के बीच मुकाबला नहीं थी, बल्कि इसमें भाग लेने वालों और दर्शकों की सामाजिक स्थिति और प्रतिष्ठा का पहलू भी जुड़ा हुआ था. मुकाबले के लिए अलग मैदान तैयार किया जाता था और मुर्गों का वजन तथा आकार देखकर मुकाबला कराया जाता था.
यह अध्ययन झारखंड में इसकी शुरुआत की तारीख नहीं बताता, लेकिन यह जरूर दिखाता है कि पूर्वी भारत के आदिवासी समाज में मुर्गा लड़ाई का सामाजिक इतिहास काफी गहरा है.
झारखंड में कैसे बनी ग्रामीण मनोरंजन की परंपरा?
झारखंड के कई इलाकों में मुर्गा लड़ाई का आयोजन हाट, बाजार और मेलों के आसपास होता रहा है. पहले इसे मुख्य रूप से मनोरंजन से जोड़कर देखा जाता था. स्थानीय जानकारों के अनुसार लोग अपने पसंदीदा मुर्गों को मुकाबले के लिए तैयार करते थे और उन्हें विशेष खान-पान दिया जाता था. कई इलाकों में इसके लिए अलग से मुर्गा बाजार भी लगाए जाते रहे हैं.
मुर्गों को मुकाबले के लिए तैयार करने की अपनी स्थानीय परंपराएं भी रही हैं. पुराने विवरणों में प्रशिक्षित मुर्गों और मुकाबले के दौरान इस्तेमाल होने वाले धारदार उपकरण का उल्लेख मिलता है. यही पहलू इस परंपरा को मनोरंजन से आगे बढ़ाकर एक जोखिम भरे खेल में बदल देता था.
पहले मनोरंजन, बाद में जुड़ता गया सट्टा
स्थानीय रिपोर्टों में यह भी सामने आया है कि समय के साथ मुर्गा लड़ाई के आसपास जुआ और सट्टेबाजी का चलन बढ़ा. इससे इसके मूल सांस्कृतिक स्वरूप को लेकर भी सवाल उठे. कुछ स्थानीय जानकारों ने चिंता जताई कि जिस परंपरा को कभी ग्रामीण मनोरंजन और सामाजिक मेल-जोल से जोड़कर देखा जाता था, वह धीरे-धीरे पैसे के दांव और शराबखोरी से जुड़ने लगी.
यानी मुर्गा लड़ाई की कहानी केवल एक खेल की कहानी नहीं है. इसके साथ यह भी सवाल जुड़ा है कि समय के साथ किसी लोक परंपरा का स्वरूप कैसे बदलता है.
क्या इसे झारखंड की आदिवासी संस्कृति का हिस्सा कहना सही है?
कई इलाकों में मुर्गा लड़ाई को आदिवासी समाज की परंपरा से जोड़ा जाता है और स्थानीय रिपोर्टों में भी इसे लोहरदगा, गुमला, सिमडेगा तथा सिंहभूम क्षेत्र के आदिवासी जीवन से संबंधित बताया गया है.
हालांकि, यहां सावधानी जरूरी है. उपलब्ध शोध यह साबित नहीं करता कि मुर्गा लड़ाई सिर्फ आदिवासी समाज ने शुरू की थी या इसकी शुरुआत झारखंड के किसी एक आदिवासी समुदाय से हुई थी. मानवशास्त्रीय शोध इसके व्यापक ग्रामीण और सामाजिक संदर्भ की ओर संकेत करता है.
तो आखिर मुर्गा लड़ाई झारखंड में कब आई?
इसका सबसे ईमानदार जवाब यही है- ठीक-ठीक पता नहीं. इतिहास में झारखंड के पहले मुर्गा लड़ाई मैदान का कोई प्रमाणित रिकॉर्ड नहीं मिलता. लेकिन 19वीं सदी तक भारत के ग्रामीण और आदिवासी इलाकों में इस खेल की मौजूदगी के प्रमाण मिलते हैं. झारखंड के विभिन्न इलाकों में यह परंपरा कई पीढ़ियों तक मौखिक और स्थानीय सामाजिक परंपराओं के जरिए चलती रही.
इसलिए यह कहना ज्यादा सही होगा कि झारखंड में मुर्गा लड़ाई की जड़ें पुरानी ग्रामीण-आदिवासी संस्कृति में हैं, लेकिन इसका पहला मैदान और शुरुआत का साल आज भी इतिहास के लिए एक अनसुलझा सवाल है.
परंपरा से विवाद तक का सफर
आज मुर्गा लड़ाई को केवल सांस्कृतिक परंपरा के नजरिये से देखना भी पूरी तस्वीर नहीं होगी. इसके साथ पशु कल्याण, हिंसा, जुआ और सार्वजनिक आयोजन से जुड़े कानूनी सवाल भी जुड़े हैं. मानवशास्त्रीय अध्ययन में भी इसे कई जगहों पर प्रतिबंधित/अवैध गतिविधि के बावजूद जारी रहने वाली प्रथा के रूप में दर्ज किया गया है.
यानी झारखंड की मुर्गा लड़ाई की कहानी में एक तरफ पीढ़ियों से चली आ रही ग्रामीण परंपरा है, तो दूसरी तरफ बदलते समय के साथ जुड़े कानून, पशु कल्याण और सट्टेबाजी के सवाल भी हैं.
सबसे बड़ा सवाल फिर भी वही है- झारखंड में पहली बार मुर्गा लड़ाई का मैदान आखिर कहां सजा था? इतिहास इस सवाल पर आज भी खामोश है.
