पेड़ों की कटाई से खत्म हो रहा सारंडा जंगल

चाईबासा : कभी चाईबासा वन क्षेत्र की अलग पहचान थी. देश-विदेश के लोगों की जुबान पर सारंडा जंगल का नाम होता था. बड़े-बड़े वृक्षों से आच्छादित जंगल में विभिन्न जंगली जानवरों का डेरा था. लेकिन इस पर कारोबारियों की ऐसी बुरी नजर पड़ी कि देखते ही देखते यह समाप्ति के कगार पर पहुंच चुका है. […]

चाईबासा : कभी चाईबासा वन क्षेत्र की अलग पहचान थी. देश-विदेश के लोगों की जुबान पर सारंडा जंगल का नाम होता था. बड़े-बड़े वृक्षों से आच्छादित जंगल में विभिन्न जंगली जानवरों का डेरा था. लेकिन इस पर कारोबारियों की ऐसी बुरी नजर पड़ी कि देखते ही देखते यह समाप्ति के कगार पर पहुंच चुका है. हालांकि जिले में कार्यरत वन विभाग इस बार वन क्षेत्र में पुन: वृक्ष लगाने की कवायद में जुटा है, लेकिन देखरेख के अभाव में लाख कोशिश के बावजूद वनों को हुई नुकसान की भरपाई नहीं हो पा रही है.

यह तभी संभव होगा, जब जगह-जगह हरे-भरे वृक्ष लगे हों. पर ये वृक्ष लगानेवाला कोई तो होना चाहिए. पूर्वजों ने जो पेड़ तैयार किये थे, हमने उन्हें भी काट डाला. शहर से सटे एनएच 31 पर दोनों ओर घने और छायादार वृक्ष लगे थे. शहरीकरण की हवा में ये सारे पेड़ काट दिये गये. पांच जून को हर वर्ष सरकार विश्व पर्यावरण दिवस मनाती है, जिसके लिए कई कार्यक्रम भी आयोजित किये जाते हैं, लेकिन उनमें पर्यावरण संरक्षण के सिर्फ दावे किये जाते हैं, धरातल पर बहुत कुछ नहीं किया जाता. हालांकि अनेक सामाजिक संगठन व संस्थाएं पर्यावरण संरक्षण के लिए प्रयासरत हैं, लेकिन सरकारी प्रोत्साहन की कमी से उनके प्रयास भी लड़खड़ाने लगे हैं.

पर्यावरण के प्रति तंत्र बेगानापन
प्रशासन अथवा किसी स्वयंसेवी संस्थान ने इसके लिए अबतक कोई कार्यशाला आयोजित करने में विशेष रुचि नहीं दिखायी है. विभाग से जुड़े एक अधिकारी ने बताया कि रूटीन कार्यों से ही फुरसत नहीं है तो इस तरह के अभियान के लिए समय कहां से निकालें.
धुआं उगलते वाहन खतरा
सड़क पर धुआं उगलते वाहन भी पर्यावरण के लिए कम घातक नहीं हैं. बावजूद इस पर रोक लगाना तो दूर, यहां इसकी जांच तक नहीं हो रही है कि कौन वाहन पर्यावरण की दृष्टि से अधिक घातक है और कौन नहीं. इसके अलावा हर साल बढ़ते ईंट भट्टों का धुआं भी प्रदूषण का बड़ा कारण बन रहे हैं.
…सरकारी योजनाएं भी नाकाफी
पौधारोपण के नाम पर जिले में विभिन्न योजनाएं चल रही हैं. वन विभाग इसके तहत जिले में बीते साल में एक लाख पेड़ लगाने का दावा कर रहा है. इस योजना के तहत कोई भी किसान अपनी निजी जमीन पर वन विभाग से पौधे लेकर लगा सकता है. पौधे को तीन साल तक सुरक्षित रखने पर किसान को प्रोत्साहन राशि भी दी जाती है. इसके अलावा सरकार ने मनरेगा योजना से भी वृक्ष लगाने का फैसला किया है, लेकिन जागरुकता या जनप्रतिनिधियों की उपेक्षा के कारण इस महत्वाकांक्षी योजना को गति नहीं मिल पा रही है. परिणाम है कि दिन ब दिन वृक्षों की संख्या घटती जा रही है.

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