सबई घास की ताजमहल ने दिल्ली में जीता लोगों का दिल

सबई घास से बने ताजमहल की कलाकृति को सभी ने सराहा था चाईबासा : झारखंड के पश्चिम सिंहभूम व ओड़िशा के मयूरभंज जिले में हर वर्ष घरेलू स्तर पर सबई घास का करीब 20,000 टन उत्पादन होता है, इससे 300 करोड़ रुपये का कारोबार किया जाता है. इसका बाजार जिला, राज्य व राष्ट्रीय स्तर पर […]

सबई घास से बने ताजमहल की कलाकृति को सभी ने सराहा था

चाईबासा : झारखंड के पश्चिम सिंहभूम व ओड़िशा के मयूरभंज जिले में हर वर्ष घरेलू स्तर पर सबई घास का करीब 20,000 टन उत्पादन होता है, इससे 300 करोड़ रुपये का कारोबार किया जाता है. इसका बाजार जिला, राज्य व राष्ट्रीय स्तर पर है. पर्यावरण अनुकूल होने के नाते इसने पूरे देश में अपना स्थान बनाया है. सबई घास से पहले सिर्फ रस्सी बनती थी, लेकिन बाद में इससे कलात्मक वस्तुएं बनाकर पहचान दिलाने की पहल की. झींकपानी स्थित दोकट्टा गांव के 59 वर्षीय सुकरा मुंडा ने 15 साल पहले सबई घास से ताजमहल की अनुकृति बनायी.
इसे खूब प्रशंसा मिली.
जिला प्रशासन ने सुकरा को सरकारी खर्च पर दिल्ली के प्रगति मैदान में प्रदर्शनी के लिए भेजा. वहां विदेश भ्रमण की आस दिखाकर उसे ताजमहल बेचने नहीं दिया गया. उसके बाद कोई पहल नहीं हुई. प्रशासन व एनजीओ के बीच बलि का बकरा न बन जाये. इस डर के कारण सुकरा ने हुनर को छिपा लिया.
पश्चिम सिंहभूम का हुनर झारखंड को दे सकता है एक नयी पहचान
सरकारों ने घोषणाएं की, लेकिन धरातल पर नहीं उतरी
तत्कालीन बिहार सरकार टोंटो को कुटीर उद्योग का हब बनना चाहती थी
केंद्र सरकार ने इसे वैकल्पिक रोज़गार के साधन के रूप में देखा था
झारखंड के प्रथम मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी ने टोंटो को टोरंटो बनाने की बात कही थी
पूर्व मुख्यमंत्री मधुकोड़ा इसे टोक्यो की तरह जगमग करना चाहते थे
पूर्व सीएम अर्जुन मुंडा ने टोंटो घाटी की सुंदरता देख यहां फिल्म सिटी विकसित करने की बात कही थी
गांव की महिलाओं को प्रशासन से मिला था प्रशिक्षण
सुकरा ने अपने आंगन में उपजने वाले सबई घास से ग्रामीणों की तकदीर सवांरने का सपना देखा था. वर्ष 2003 में इन्हें जिला प्रशासन की ओर से प्रशिक्षण दिया गया. दोनों प्रखंडों की 100 से अधिक महिलाओं को प्रशिक्षण मिला. ग्रामीणों की बनाई कलाकृतियों को सरकार ने राष्ट्रीय स्तर पर प्रदर्शन के लिए दिल्ली भेजी. इसे लोगों ने सराहा. तत्कालीन केंद्रीय मंत्री कड़िया मुंडा ने सिंहभूम के कलाकारों को विदेश भेजने की बात कही थी.
…तो सबई घास से संवर सकता है क्षेत्र
जिला मुख्यालय से सटे झींकपानी और टोंटो प्रखंड में सबई घास उगता है. टोंटो घाटी में स्थानीय ग्रामीण मेहनत से पहाड़ पर सबई घास उगाते हैं. इन किसानों के लिये यह घास उनके जीविकोपार्जन का प्रमुख साधन है. सबई घास का एक मुट्ठा 10 रुपये में बिकता है. इससे सालाना 50,000 रुपये की कमाई होती है. सरकार सबई घास से बनी कलाकृतियों को बढ़ावा दे तो क्षेत्र का भविष्य संवर सकता है.
सरकार ध्यान दे तो टोंटो का सबई घास से हमारा जीवन संवर जायेगा. टोंटो की घाटी में बहुत घास होता है. इससे मचिया, खटिया, गत्ते का निर्माण होता है. आशा है सरकार हमारे लिये कुछ करेगी.
– सुकरा मुंडा, सबई घास से कलाकृति बनाने वाले
इस उद्योग ने यहां की महिलाओं को आर्थिक स्वतंत्रता दी थी. इससे पहले हम एक दिन में 30 रुपये कमाने के लिये संघर्ष करते थे. सबई घास के शिल्प के जरिये एक कलाकृति पर 200-300 रुपये की कमाई हो रही थी.
– शुक्रमणी मुंडा, सबई घास की कलाकृति बनाने वाली
सबई घास शिल्प का डिमांड नहीं है. इसके अन्य उपयोगिता के लिये इसकी अच्छी मांग है. इसके कारण हम पहाड़ों पर इसकी खेती करते हैं.
– विक्रम लागुरी, सबई घास का किसान
कुटीर उद्योग को बढ़ावा देने के लिये पश्चिम सिंहभूम जिला प्रयासरत है. सबई घास के उत्पादन व इससे बनने वाली कलाकृति को प्रोत्साहित किया जायेगा.
– अरवा राज कमल, उपायुक्त पश्चिम सिंहभूम

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