रविकांत साहू की रिपोर्ट
सिमडेगा: गांव कितना भी दूर क्यों न हो, हर बच्चे तक पौष्टिक और ताजा भोजन पहुंचाने की दिशा में सिमडेगा जिला प्रशासन लगातार प्रयास कर रहा है. झारखंड सरकार की जन-केंद्रित विकास नीति के तहत जिले के चयनित सक्षम आंगनबाड़ी केंद्रों में पोषण वाटिकाओं का निर्माण और विकास किया जा रहा है. इन छोटी-छोटी हरी वाटिकाओं के जरिये आंगनबाड़ी केंद्रों को पोषण और स्वस्थ बचपन के नये केंद्र के रूप में विकसित किया जा रहा है.
बच्चों के भोजन में शामिल हो रही ताजी हरी सब्जियां
समाज कल्याण विभाग की इस पहल का मुख्य उद्देश्य आंगनबाड़ी केंद्रों में बच्चों को उपलब्ध कराये जाने वाले गर्म-पके भोजन में स्थानीय स्तर पर उगायी गयी ताजी हरी सब्जियों और साग को शामिल करना है. इससे बच्चों को मिलने वाला भोजन अधिक पौष्टिक और विटामिन व खनिजों से भरपूर बनाया जा रहा है.
‘Farm-to-Fork’ की अवधारणा को मिल रहा बढ़ावा
पोषण वाटिकाओं के जरिये ‘Farm-to-Fork’ की अवधारणा को धरातल पर उतारा जा रहा है. वाटिका में उगायी गयी सब्जियों को जरूरत के अनुसार तोड़कर स्वच्छता के साथ तैयार किया जाता है. इसके बाद इन्हें बच्चों के गर्म-पके भोजन में शामिल किया जाता है. इस तरह बीज से लेकर बच्चों की थाली तक की यात्रा स्थानीय स्तर पर ही पूरी हो रही है.
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पोषण वाटिकाओं की नियमित निगरानी
इस पहल को सफल बनाने के लिए जिला प्रशासन की ओर से नियमित निगरानी, मार्गदर्शन और सहयोग दिया जा रहा है. बीज उपलब्ध कराने से लेकर तकनीकी सहयोग, अनुश्रवण और आंगनबाड़ी सेविकाओं को प्रोत्साहित करने तक आवश्यक सहयोग सुनिश्चित किया जा रहा है. इसका उद्देश्य यह है कि पोषण वाटिकाएं केवल बनकर न रह जाएं, बल्कि लगातार विकसित होती रहें और बच्चों के पोषण में योगदान देती रहें.
बच्चों में बढ़ रही सक्रियता और ऊर्जा
ताजी हरी सब्जियों के उपयोग से बच्चों के भोजन की पौष्टिकता बढ़ रही है. इसके सकारात्मक परिणाम भी देखने को मिल रहे हैं. बच्चों में सक्रियता और ऊर्जा बढ़ने के साथ माताएं भी इस बदलाव को महसूस कर रही हैं. कुपोषण के खिलाफ चल रहे प्रयासों में पोषण वाटिकाएं महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं.
स्वस्थ बचपन और बेहतर भविष्य की बन रही नींव
सिमडेगा की ये हरी-भरी पोषण वाटिकाएं महज सब्जियां उगाने की जगह नहीं हैं, बल्कि स्वस्थ बचपन और बेहतर भविष्य की नींव बन रही हैं. यह पहल बताती है कि सरकारी संकल्प, प्रशासनिक प्रतिबद्धता और सामुदायिक सहभागिता मिलकर जमीन के एक छोटे से हिस्से को भी बच्चों के बेहतर पोषण और उज्ज्वल भविष्य का आधार बना सकती है.
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