होली के लिए हर्बल गुलाल बना रहीं सरायकेला-खरसावां की महिलाएं, सज गए बाजार

Saraikela Herbal Gulal: झारखंड के सरायकेला-खरसावां की महिलाएं होली के लिए पलाश, हल्दी, चुकंदर और अन्य प्राकृतिक सामग्री से हर्बल गुलाल बना रही हैं. जेएसएलपीएस के सहयोग से पलाश ब्रांड के तहत इसकी बिक्री हो रही है. यह रंग त्वचा और पर्यावरण के लिए सुरक्षित विकल्प है. इससे जुड़ी पूरी खबर नीचे पढ़ें.

सरायकेला से शचिंद्र कुमार दाश की रिपोर्ट

Saraikela Herbal Gulal: सरायकेला-खरसावां जिले के लोगों में होली का खूमार छाने लगा है. रंग-गुलाल के बाजार सजने लगे हैं. बाजार में इस बार सबसे खास है पलाश के फूल समेत विभिन्न पत्तों से तैयार हर्बल गुलाल. बाजार में हर्बल गुलाल की काफी मांग है. इसको लेकर खरसावां के आमदा में महिलायें हर्बल गुलाल बनाने में जुटी हैं. महिलाओं ने खुद पर्यावरण अनुकूल हर्बल गुलाल तैयार कर रही है. वे फूल तोड़ने से लेकर गुलाल बनाने और पैकेजिंग करने तक का काम कर रही हैं. महिलाएं ही इसकी और मार्केटिंग भी कर रहीं हैं. जेएसएलपीएस ने पलाश ब्रांड के तहत हर्बल गुलाल की बिक्री के लिए इन महिलाओं को प्लेटफॉर्म दिया है.

पालक, हल्दी, चुकंदर और गेंदा फूल से तैयार हो रहा गुलाल

झारखंड में पलाश के फूलों के साथ ही पालक, गेंदा, सिंद्धार फूल, हल्दी और चुकंदर से भी गुलाल बनाया जा रहा है. हरे रंग का गुलाल पालक से तो गुलाबी रंग का चुकंदर (बीट) से तैयार किया जा रहा है. वहीं पीले रंग के लिए हल्दी तो नीले रंग के लिए सिंद्धार फूल और पत्तियों का उपयोग किया जाता है. इसमें किसी केमिकल का उपयोग नहीं किया जाता. यह पूरी तरह से त्वचा के लिए सुरक्षित है. हर्बल गुलाल त्वचा के लिए सुरक्षित और पर्यावरण के अनुकूल होता है. आंखों और बालों के लिए भी सुरक्षित होता है. इसलिए लोग इसकी तरफ आकर्षित हो रहे हैं. इसी का नतीजा है कि हर्बल गुलाल की मांग साल-दर-साल तेजी से बढ़ती जा रही है.

हर्बल गुलाल है सुरक्षित विकल्प

बाजार में उपलब्ध अधिकांश अबीर, गुलाल और रंगों में खतरनाक केमिकल मिलाए जाते हैं, जो त्वचा में जलन, एलर्जी, आंखों में समस्या और अन्य स्वास्थ्य जोखिम पैदा करते हैं. इनके पर्यावरण पर भी बुरा असर पड़ता है. लोचनपुर की महिलाएं इन हानिकारक रंगों के विकल्प के रूप में हर्बल गुलाल बना कर स्वास्थ्य सुरक्षा, पर्यावरण संरक्षण और आत्मनिर्भरता का संदेश दे रही हैं.

ऐसे बनता है हर्बल गुलाल

पलाश के फूल को पेड़ से तोड़ने के बाद दो-तीन दिन तक सुखाया जाता है. फिर फूल के काले हिस्से को अलग कर दिया जाता है. फूल के पूरी तरह से सूख जाने के बाद इसे मिक्सी में पीसा जाता है. इसके बाद इसे छानकर अलग करते हैं, ताकि गुठली जैसा कुछ रह न जाए. फिर एक बड़े बर्तन में अरारोट पाउडर में पीसे हुए फूल को मिलाया जाता है. सुगंध के लिए इसमें गुलाब जल या एसेंशियल ऑयल मिलाया जाता है. पूरी तरह सूखने के बाद छलनी से छाना जाता है, ताकि महीन और मुलायम गुलाल तैयार हो. फिर पैकेजिंग कर बाजार में पहुंचता है.

इसे भी पढ़ें: धनबाद को हेमंत सोरेन सरकार की सौगात, 12 एकड़ जमीन पर बनेगा अंतरराज्यीय बस टर्मिनल

महिलाओं की सशक्तता की अनोखी मिसाल

यह प्रयास न केवल गांव में महिलाओं की एकजुटता और सशक्तिकरण को दर्शाता है, बल्कि स्वास्थ्य सुरक्षा, पर्यावरण संरक्षण और महिला आत्मनिर्भरता का सुंदर संगम भी प्रस्तुत करता है. खरसावां के आमदा की ये महिलाएं होली के रंगों को न सिर्फ उत्सव का हिस्सा बना रही हैं, बल्कि एक बेहतर और सुरक्षित भविष्य की नींव भी रख रही हैं.

इसे भी पढ़ें: होली पर रांची से चलेंगी 10 जोड़ी स्पेशल ट्रेन, देखें गाड़ियों का टाइम-टेबल

प्रभात खबर डिजिटल प्रीमियम स्टोरी

लेखक के बारे में

By KumarVishwat Sen

कुमार विश्वत सेन प्रभात खबर डिजिटल में डेप्यूटी चीफ कंटेंट राइटर हैं. इनके पास हिंदी पत्रकारिता का 25 साल से अधिक का अनुभव है. इन्होंने 21वीं सदी की शुरुआत से ही हिंदी पत्रकारिता में कदम रखा. दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदी पत्रकारिता का कोर्स करने के बाद दिल्ली के दैनिक हिंदुस्तान से रिपोर्टिंग की शुरुआत की. इसके बाद वे दिल्ली में लगातार 12 सालों तक रिपोर्टिंग की. इस दौरान उन्होंने दिल्ली से प्रकाशित दैनिक हिंदुस्तान दैनिक जागरण, देशबंधु जैसे प्रतिष्ठित अखबारों के साथ कई साप्ताहिक अखबारों के लिए भी रिपोर्टिंग की. 2013 में वे प्रभात खबर आए. तब से वे प्रिंट मीडिया के साथ फिलहाल पिछले 10 सालों से प्रभात खबर डिजिटल में अपनी सेवाएं दे रहे हैं. इन्होंने अपने करियर के शुरुआती दिनों में ही राजस्थान में होने वाली हिंदी पत्रकारिता के 300 साल के इतिहास पर एक पुस्तक 'नित नए आयाम की खोज: राजस्थानी पत्रकारिता' की रचना की. इनकी कई कहानियां देश के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं.

संबंधित खबरें >

यह भी पढ़ें >