सरायकेला. जमशेदपुर से करीब 35 किलोमीटर दूर टाटा-रांची राजमार्ग पर स्थित ईचागढ़ के चौका मोड़ से लगभग 15 किलोमीटर की दूरी पर लेपाटांड मार्ग पर स्थित है प्रसिद्ध चतुर्मुखा शिव मंदिर. एक छोटे से मंदिर में स्थापित यह चतुर्मुखा शिवलिंग क्षेत्र के लोगों के लिए अटूट आस्था का मुख्य केंद्र है. आसपास के गांवों के अलावा दूर-दराज से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु भगवान शिव के दर्शन और जलाभिषेक के लिए यहां आते हैं, विशेषकर सावन के महीने में यहां भक्तों का तांता लगा ही रहता है.
देश के गिने-चुने स्वरूपों में एक, इतिहास अब भी रहस्य के गर्भ में
स्थानीय लोगों के अनुसार, ईचागढ़ का यह चतुर्मुखा शिवलिंग देश के गिने-चुने विशेष शिवलिंगों में शुमार है. जिस प्रकार महाराष्ट्र के नासिक में गोदावरी नदी के तट पर चतुर्मुखी शिवलिंग है, ठीक उसी तरह यहां भी शिवलिंग के चारों दिशाओं में चार मुख बने हुए हैं. चारों तरफ से देखने पर इसका स्वरूप एक जैसा दिखता है. हालांकि, अपनी अनूठी बनावट और दिव्यता के बावजूद इसका वास्तविक इतिहास आज भी रहस्य के गर्भ में है. शिवलिंग की स्थापना कब और किस काल में हुई, इसका कोई पुख्ता ऐतिहासिक प्रमाण नहीं मिलता है. बुजुर्गों और स्थानीय लोगों का मानना है कि संभवतः ईचागढ़ रियासत के राजा विक्रमादित्य के शासनकाल में इस मंदिर का निर्माण कराया गया था.
पर्यटन के रूप में विकसित करने की मांग
वर्तमान समय में यह ऐतिहासिक स्थल ग्रामीणों के आपसी सहयोग के बल पर संचालित हो रहा है. धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व को देखते हुए स्थानीय लोगों और श्रद्धालुओं ने सरकार व प्रशासन से इस मंदिर क्षेत्र को एक आधुनिक धार्मिक पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने की मांग की है. लोगों का मानना है कि यदि इस ऐतिहासिक धरोहर का समुचित विकास किया जाए, तो यह झारखंड के पर्यटन मानचित्र पर एक महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में उभर सकता है.
