ढाई सौ वर्षों से जीवंत है हरिभंजा की रथ यात्रा, पुरी की झलक देखने आते हैं श्रद्धालु

Haribhanja Jagannath Rath Yatra: सरायकेला-खरसावां के हरिभंजा गांव में 250 वर्षों से भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा पुरी की परंपरा के अनुरूप आयोजित होती है. छेरा पहंरा, संकीर्तन, कलिंग शैली का मंदिर और नया रथ इस ऐतिहासिक आयोजन को विशेष आकर्षण प्रदान करते हैं.

सरायकेला से शचींद्र कुमार दाश की रिपोर्ट

Haribhanja Jagannath Rath Yatra: जिले के हरिभंजा गांव में निकलने वाली भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि लगभग ढाई सौ वर्षों से चली आ रही समृद्ध सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत का प्रतीक है. हर वर्ष इस ऐतिहासिक रथ यात्रा में हजारों श्रद्धालु शामिल होते हैं. इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां रथ यात्रा की लगभग सभी प्रमुख परंपराएं पुरी श्रीजगन्नाथ धाम की तर्ज पर निभाई जाती हैं. यही वजह है कि यह आयोजन झारखंड ही नहीं, बल्कि पड़ोसी ओडिशा के श्रद्धालुओं के लिए भी विशेष आकर्षण का केंद्र बना हुआ है.

18वीं शताब्दी में हुई थी परंपरा की शुरुआत

हरिभंजा की रथ यात्रा का इतिहास 18वीं शताब्दी से जुड़ा हुआ है. स्थानीय मान्यताओं के अनुसार सिंहदेव वंश के जमींदारों ने गांव में भगवान जगन्नाथ मंदिर की स्थापना कर नियमित पूजा-अर्चना की शुरुआत की थी. तभी से यहां भगवान जगन्नाथ, उनके बड़े भाई बलभद्र, देवी सुभद्रा और सुदर्शन की विधिवत पूजा होती आ रही है. वर्षभर विभिन्न धार्मिक अनुष्ठान आयोजित किए जाते हैं, लेकिन वार्षिक रथ यात्रा का विशेष महत्व है. यह आयोजन आज भी पारंपरिक रीति-रिवाजों और प्राचीन धार्मिक मान्यताओं के अनुसार संपन्न कराया जाता है.

छेरा पहंरा की परंपरा के बाद निकलता है रथ

रथ यात्रा शुरू होने से पहले यहां भी पुरी की तरह छेरा पहंरा की परंपरा निभाई जाती है. गांव के जमींदार विद्या विनोद सिंहदेव चंदन और पवित्र जल का छिड़काव कर स्वर्ण झाड़ू से मार्ग की प्रतीकात्मक सफाई करते हैं. इसे सेवा और समर्पण का प्रतीक माना जाता है. इसके बाद भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा की प्रतिमाओं को पहंडी परंपरा के अनुसार झुलाते हुए मंदिर से रथ तक लाया जाता है. इस दौरान भगवान जगन्नाथ और बलभद्र को विशेष रूप से तैयार चांदी के मुकुट पहनाए जाते हैं. रथ पर विराजमान कराने के बाद इन मुकुटों को प्रसाद स्वरूप श्रद्धालुओं में वितरित किया जाता है, जिसे लोग श्रद्धा के साथ ग्रहण करते हैं.

संकीर्तन और घंटवाल दल बनता है विशेष आकर्षण

हरिभंजा की रथ यात्रा का सबसे मनमोहक दृश्य रथ के आगे-आगे चलने वाला लगभग 50 सदस्यीय संकीर्तन एवं घंटवाल दल होता है. ओडिशा से आने वाले कलाकार पारंपरिक वाद्ययंत्रों के साथ भजन-कीर्तन प्रस्तुत करते हैं, जिससे पूरा वातावरण भक्तिमय हो उठता है. श्रद्धालु भी हरिनाम संकीर्तन करते हुए रथ के साथ चलते हैं. धार्मिक उत्साह, पारंपरिक संगीत और सामूहिक भक्ति का यह संगम रथ यात्रा को एक अनूठी पहचान देता है.

कलिंग शैली का मंदिर श्रद्धालुओं को करता है आकर्षित

हरिभंजा का नव-निर्मित जगन्नाथ मंदिर भी श्रद्धालुओं के आकर्षण का प्रमुख केंद्र है. वर्ष 2015 में ओडिशा के कुशल शिल्पकारों ने इस मंदिर का पुनर्निर्माण कलिंग वास्तुकला शैली में किया था. मंदिर की बाहरी दीवारों पर भगवान विष्णु के दशावतार की आकर्षक प्रतिमाएं उकेरी गई हैं. वहीं मंदिर के भीतर जय-विजय, दशदिगपाल सहित अनेक सुंदर मूर्तियां स्थापित हैं. मुख्य द्वार पर निर्मित कोणार्क के सूर्य चक्र की प्रतिकृति श्रद्धालुओं का विशेष ध्यान आकर्षित करती है. इसी कारण वर्षभर यहां दर्शनार्थियों का आना-जाना लगा रहता है.

नए रथ पर सवार होकर मौसीबाड़ी जाएंगे प्रभु

हरिभंजा में इस वर्ष भी प्रभु जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा नए रथ पर सवार होकर गुंडिचा मंदिर, जिसे स्थानीय लोग मौसीबाड़ी भी कहते हैं, के लिए प्रस्थान करेंगे. पिछले वर्ष लाखों रुपये की लागत से इस नए रथ का निर्माण कराया गया था. ओडिशा के कारीगरों ने इसे पारंपरिक शैली में तैयार किया है. छह पहियों वाले इस भव्य रथ पर आकर्षक कलाकृतियां उकेरी गई हैं, जो इसकी सुंदरता को और बढ़ाती हैं. रथ यात्रा को लेकर गांव में तैयारियां अंतिम चरण में हैं. मंदिर परिसर से लेकर रथ मार्ग तक साफ-सफाई, सजावट और अन्य व्यवस्थाएं पूरी की जा रही हैं.

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आस्था और सांस्कृतिक विरासत का अनूठा संगम

हरिभंजा की रथ यात्रा केवल धार्मिक आयोजन भर नहीं है, बल्कि यह क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान और सामाजिक एकता का भी प्रतीक है. पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही यह परंपरा आज भी उसी श्रद्धा और उत्साह के साथ निभाई जा रही है, जिससे इसकी ऐतिहासिक गरिमा बनी हुई है. धार्मिक मान्यताओं, प्राचीन परंपराओं, कलिंग शैली की वास्तुकला, भक्ति संगीत और जनसहभागिता का अद्भुत संगम हरिभंजा की रथ यात्रा को झारखंड की प्रमुख धार्मिक एवं सांस्कृतिक विरासतों में विशेष स्थान दिलाता है. हर वर्ष यहां उमड़ने वाली श्रद्धा यह बताती है कि कुछ परंपराएं समय के साथ पुरानी नहीं होतीं, बल्कि हर पीढ़ी उन्हें नया जीवन देती रहती है.

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Author: Sachindra Das

Published by: Kumarvishwat Sen

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