सरायकेला-खरसावां से हिमांशु गोप की रिपोर्ट
Chhau Dance Program Saraikela, सरायकेला : सरायकेला-खरसावां जिला अंतर्गत चांडिल प्रखंड क्षेत्र का खुंटी गांव में पारंपरिक छऊ नृत्य का आयोजन किया गया. ढोल, धमसा, नगाड़े और शहनाई की पारंपरिक गूंज के बीच आयोजित इस भव्य सांस्कृतिक कार्यक्रम में झारखंड और पड़ोसी राज्य पश्चिम बंगाल के नामचीन छऊ कलाकारों ने शिरकत की. कलाकारों ने अपनी अद्भुत कला और हैरतअंगेज प्रदर्शन से वहां मौजूद हजारों दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया और पूरी रात लोग अपनी लोक संस्कृति के इस महाकुंभ में झूमते नजर आए.
दिग्गज उस्तादों ने संभाला मंच
सांस्कृतिक कार्यक्रम में दर्शकों का उत्साह बढ़ाने के लिए पश्चिम बंगाल के प्रख्यात छौ नृत्य उस्ताद सतन महतो एवं हेमचंद्र महतो विशेष रूप से पहुंचे थे. उनके साथ ही चौका बानसा के सुप्रसिद्ध कलाकार बागान सिंह मुंडा ने भी अपनी पूरी टोली के साथ मंच संभाला. रंग-बिरंगी पारंपरिक वेशभूषा और बेहद आकर्षक व बड़े-बड़े मुखौटों (Masks) से सजे इन कलाकारों ने मानभूम छऊ शैली में रामायण और महाभारत की पौराणिक और वीर रस से भरी विभिन्न कथाओं का जीवंत मंचन किया. इसके अलावा, कलाकारों ने केवल धार्मिक ही नहीं, बल्कि आधुनिक सामाजिक सरोकारों, कुरीतियों और ग्रामीण जीवन की रोजमर्रा की दिनचर्या को भी अपने सधे हुए नृत्य के माध्यम से प्रस्तुत कर दर्शकों को गहरे चिंतन पर मजबूर कर दिया.
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रोमांचक करतब देख थमी दर्शकों की सांसें
छौ कलाकारों के हवा में लहराते रोमांचक करतबों, भावपूर्ण अभिनय और संगीत की तीव्र लय पर की गई सधी हुई प्रस्तुतियों ने दर्शकों को पूरी तरह बांधे रखा. इस भव्य आयोजन का आनंद लेने के लिए न सिर्फ खुंटी गांव के लोग, बल्कि कुरली, मुसरीबेड़ा, चौका, घाटदुलमी, तुलग्राम, रुगड़ी, चावलीबासा समेत आस-पास के एक दर्जन से अधिक गांवों से हजारों की संख्या में महिला, पुरुष और बच्चे पहुंचे थे. भारी भीड़ के कारण पूरा मेला जैसा नजारा बन गया था. कार्यक्रम में शामिल ग्रामीणों ने गर्व से कहा कि छऊ नृत्य झारखंड की आत्मा और हमारी सांस्कृतिक पहचान है. आज के आधुनिक और डिजिटल युग में ऐसे ग्रामीण आयोजन नई पीढ़ी को अपनी जड़ों, लोक परंपराओं और समृद्ध सांस्कृतिक विरासत से जोड़ने का एक बेहद महत्वपूर्ण और सराहनीय माध्यम हैं. वहीं, सफल आयोजन से गदगद आयोजकों ने स्थानीय जनता का आभार जताया और संकल्प लिया कि वे भविष्य में भी अपनी इस लोक कला और संस्कृति के संरक्षण व संवर्धन के लिए ऐसे बड़े कार्यक्रम लगातार आयोजित करते रहेंगे.
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