धर्म-परंपरा. बीमार प्रभु जगन्नाथ का देशी नुस्खों से हो रहा उपचार, आज अर्पित होगी दशमूल औषधि

स्नान पूर्णिमा के बाद बीमार प्रभु जगन्नाथ का खरसावां में जड़ी-बूटियों से उपचार हो रहा है। आज उन्हें विशेष दशमूल औषधि अर्पित की जाएगी।

खरसावां. स्नान पूर्णिमा पर 108 कलशों के पवित्र जल से महास्नान के बाद अस्वस्थ हुए प्रभु जगन्नाथ, बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा का इन दिनों मंदिर के अणवसर गृह में गुप्त सेवा के बीच उपचार हो रहा है. खरसावां की प्राचीन परंपरा के अनुसार अणवसर दशमी पर भगवान को जंगल की दस दुर्लभ जड़ी-बूटियों से तैयार दशमूल औषधि अर्पित की जाएगी. मान्यता है कि इस औषधि के सेवन के बाद प्रभु के स्वास्थ्य में सुधार होने लगता है. पूरी तरह स्वस्थ होने के बाद 14 जुलाई को नेत्र उत्सव पर भगवान नवयौवन स्वरूप में भक्तों को दर्शन देंगे, जबकि 16 जुलाई को भव्य रथयात्रा में रथ पर सवार होकर गुंडिचा मंदिर के लिए प्रस्थान करेंगे. अणवसर काल में नहीं होता है भगवान जगन्नाथ के दर्शन अणवसर काल के दौरान भगवान सार्वजनिक दर्शन नहीं देते. इस अवधि में सेवायत विशेष धार्मिक परंपराओं के अनुसार प्रभु की गुप्त सेवा करते है. साथ ही जड़ी-बुटी से उपचार किया जाता है. इस दौरान सिर्फ फल-मूल का भी भोग अर्पित की जाती है. इस अनूठी परंपरा को हर साल स्नान पूर्णिमा से लेकर नेत्र उत्सव तक निभाया जाता है. दशकों से पीढ़ी दर पीढ़ी दवा तैयार कर रहा राजवैद्य परिवार भगवान जगन्नाथ के लिए तैयार होने वाली दशमूल औषधि खरसावां के कुम्हारसाही स्थित दाश परिवार द्वारा पीढ़ी-दर-पीढ़ी तैयार की जा रही है. लगभग 200 वर्षों से अधिक समय से राजवैद्य परिवार इस सेवा से जुड़ा हुआ है. पहले दाशरथी दाश, गोकुल चंद्र दाश, उमाशंकर दाश और सत्य किंकर दाश यह दायित्व निभाते थे. वर्तमान में निरंजन दाश ''पिंकू'' परंपरा का निर्वहन कर रहे हैं. उन्होंने बताया कि औषधि तैयार करने के लिए कई दिनों तक जंगलों में जाकर दुर्लभ जड़ी-बूटियों का संग्रह करना पड़ता है. दस जड़ी-बूटियों से तैयार होती है औषधि दशमूल औषधि में कृष्ण परणी, शाल परणी, अगिबथु, फणफणा, पाटेली, गोखरा, बेल, गम्हारी, लबिंग कोली और अंकरांती जैसी औषधीय वनस्पतियों का निर्धारित अनुपात में उपयोग किया जाता है. आयुर्वेद में इन जड़ी-बूटियों का विशेष महत्व बताया गया है. मान्यता है कि इनसे तैयार दवा रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने, शरीर के तापमान को संतुलित रखने और बुखार जैसी समस्याओं से राहत देने में सहायक होता है. कृष्ण परणी सबसे दुर्लभ जड़ी-बूटी दशमूल औषधि का सबसे महत्वपूर्ण घटक कृष्ण परणी माना जाता है, जो जंगलों में अत्यंत दुर्लभ है. कई बार लंबे समय तक खोजबीन के बाद भी यह पौधा नहीं मिल पाता और सूखी जड़ी-बूटी से काम चलाना पड़ता है. निरंजन दाश ने बताया कि इस वर्ष ताजा कृष्ण परणी उपलब्ध हो गई है, जिसे औषधि में शामिल कर परंपरा के अनुसार भगवान को अर्पित किया जाएगा. धार्मिक आस्था और आयुर्वेदिक परंपरा का यह अनूठा संगम आज भी खरसावां की सांस्कृतिक पहचान को जीवंत बनाए हुए है.


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Author: Sachindra das

Published by: Janardan Pandey

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