Supreme Court Decision: झारखंड की राजधानी रांची के सुखदेवनगर थाना क्षेत्र के मधुकम स्थित शिव-दुर्गा मंदिर रोड में आदिवासी जमीन पर 50-60 वर्षों से रह रहे गैर-आदिवासी परिवारों के 12 मकान तोड़े जाने के मामले में जमीन मालिक महादेव उरांव को सुप्रीम कोर्ट से भी करारा झटका लगा है. सर्वोच्च अदालत ने मामले में दायर स्पेशल लीव पीटिशन (एसएलपी) को खारिज कर दिया. सुनवाई के दौरान अदालत ने जमीन की बिक्री और बाद में उसे खाली कराने के लिए न्यायालय का दरवाजा खटखटाने पर कड़ी नाराजगी जतायी. अदालत की सख्त टिप्पणी के बाद याचिकाकर्ता की ओर से एसएलपी वापस लेने का आग्रह किया गया, जिसे कोर्ट ने स्वीकार करते हुए याचिका खारिज कर दी.
जमीन बेचने के बाद बेदखली की मांग पर कोर्ट नाराज
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान यह सवाल प्रमुखता से उठा कि संबंधित लोगों से जमीन के बदले बड़ी रकम ली गयी और बाद में उन्हीं लोगों को जमीन से हटाने के लिए न्यायिक प्रक्रिया का सहारा लिया गया. अदालत ने इस पूरे घटनाक्रम को गंभीरता से लेते हुए टिप्पणी की कि मामला जालसाजी की श्रेणी में आ सकता है. कोर्ट ने यह भी संकेत दिया कि याचिकाकर्ता पर 10 लाख रुपये तक का जुर्माना लगाया जा सकता है. सर्वोच्च अदालत के इस सख्त रुख के बाद महादेव उरांव की ओर से याचिका वापस लेने का आग्रह किया गया. अदालत ने आग्रह स्वीकार कर एसएलपी खारिज कर दी. इस तरह मामले में हाईकोर्ट के बाद सुप्रीम कोर्ट से भी महादेव उरांव को राहत नहीं मिली.
हाईकोर्ट ने 12 परिवारों को दी थी बड़ी राहत
इससे पहले 31 जुलाई 2026 को झारखंड हाईकोर्ट के जस्टिस राजेश शंकर की अदालत ने मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया था. अदालत ने रांची के रातू रोड स्थित मधुकम क्षेत्र में करीब 50-60 वर्षों से घर बनाकर रह रहे 12 गैर-आदिवासी परिवारों को राहत देते हुए अतिक्रमण हटाने के पहले जारी आदेश को वापस ले लिया था. अदालत ने महादेव उरांव की ओर से दायर अवमानना याचिका पर सुनवाई करते हुए याचिकाकर्ता पर 12 लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया था. यह राशि मामले से प्रभावित 12 परिवारों को एक-एक लाख रुपये के रूप में देने का निर्देश दिया गया था. अदालत ने माना था कि याचिकाकर्ता ने न्यायालय के समक्ष महत्वपूर्ण तथ्यों का खुलासा नहीं किया और शपथ पत्र में भ्रामक जानकारी देकर अदालत को गुमराह करने का प्रयास किया.
1 करोड़ के लेनदेन की जानकारी छिपाने का आरोप
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट के सामने यह तथ्य सामने आया कि जमीन से जुड़े विवाद में संबंधित लोगों के साथ एक करोड़ रुपये से अधिक का वित्तीय लेनदेन हुआ था. आरोप था कि इस महत्वपूर्ण जानकारी को अदालत के समक्ष पूरी तरह प्रस्तुत नहीं किया गया. अदालत ने इसे गंभीरता से लिया. मामले में एक और महत्वपूर्ण तथ्य सामने आया कि जिन 12 परिवारों पर अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई का सीधा असर पड़ना था, उन्हें मूल रिट याचिका में प्रतिवादी ही नहीं बनाया गया था. हाईकोर्ट ने माना कि यदि इन तथ्यों की जानकारी पहले अदालत के सामने होती, तो मामले की सुनवाई और आदेश की परिस्थितियां अलग हो सकती थीं.
कोर्ट के आदेश के आधार पर मकान हटाने की कार्रवाई
महादेव उरांव ने हाईकोर्ट में अवमानना याचिका दायर कर एकल पीठ के उस आदेश का अनुपालन कराने की मांग की थी, जिसमें हेहल के अंचलाधिकारी को मधुकम की जमीन से अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई करने का निर्देश दिया गया था. इसी आदेश के आधार पर प्रशासन ने शिव-दुर्गा मंदिर रोड के समीप मुंडारी प्रकृति की जमीन पर बने 12 मकानों को हटाने की कार्रवाई शुरू की थी. कार्रवाई को लेकर प्रभावित परिवारों में विरोध और असंतोष की स्थिति बनी थी. उनका कहना था कि वे कई दशकों से इस इलाके में रह रहे हैं और अचानक उन्हें अवैध कब्जाधारी बताकर हटाने की कोशिश की जा रही है.
परिवारों का दावा, जमीन खरीदकर बनाये मकान
मामले से प्रभावित परिवारों का कहना था कि वे मधुकम क्षेत्र में 50-60 वर्षों से रह रहे हैं. उनके अनुसार, उन्होंने संबंधित जमीन मालिक को प्रति डिसमिल 5.25 लाख रुपये की दर से भुगतान कर जमीन खरीदी थी. इसके बाद वहां मकान बनाकर परिवार के साथ रहने लगे. परिवारों का आरोप था कि जमीन के लिए भुगतान करने और लंबे समय से वहां रहने के बावजूद उन्हें अवैध कब्जाधारी बताया गया. उन्होंने प्रशासन की कार्रवाई का विरोध करते हुए न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था. मामले की सुनवाई के दौरान सामने आये वित्तीय लेनदेन और पक्षकारों से जुड़े तथ्यों ने पूरे विवाद को नया मोड़ दे दिया.
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न्यायिक प्रक्रिया में पारदर्शिता पर हाईकोर्ट का जोर
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि न्यायिक प्रक्रिया का इस्तेमाल सभी महत्वपूर्ण तथ्यों को सामने रखकर और प्रभावित पक्षों को सुनने के बाद ही किया जाना चाहिए. अदालत ने तथ्यों को छिपाने और न्यायालय को भ्रामक जानकारी देने के प्रयास को न्यायिक प्रक्रिया के दुरुपयोग की गंभीर श्रेणी में माना. अब सुप्रीम कोर्ट द्वारा एसएलपी खारिज किये जाने के बाद महादेव उरांव की ओर से दायर इस चुनौती को भी झटका लगा है. मामले में हाईकोर्ट के आदेश के साथ-साथ सर्वोच्च अदालत की सख्त टिप्पणियां भी महत्वपूर्ण मानी जा रही हैं. जमीन विवाद में लंबे समय से रह रहे परिवारों के अधिकार, जमीन के लेनदेन और न्यायालय के समक्ष तथ्यों के पूर्ण खुलासे का सवाल इस पूरे प्रकरण के केंद्र में बना हुआ है.
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