जहां कभी पैदल जंगल पार करते थे शिबू सोरेन, आज वहां बनीं सड़कें

दिशोम गुरु शिबू सोरेन की पहली पुण्यतिथि पर उनके गांव नेमरा की बदलती तस्वीर सामने आई. पूर्व विधायक अर्जुन राम ने साझा किए संघर्ष के दिनों की यादें और गांव में आए विकास पर प्रकाश डाला.

नेमरा से लौटकर आनंद मोहन की रिपोर्ट 

Shibu Soren Native Village: नेमरा के लुकैयाटांड में दिशोम गुरु शिबू सोरेन की पहली पुण्यतिथि का समारोह स्थल. कार्यक्रम स्थल पर भारी भीड़. भव्य पंडाल के अगली कतार में बैठा एक शख्स. नम आंखें. दिशोम गुरु के साथ गुजारे दिनों की याद. मन भारी. 91 साल के वह बुजुर्ग पूर्व विधायक अर्जुन राम थे. 1980 से 1995 तक वह विधायक रहे. महाजनी आंदोलन से लेकर झारखंड आंदोलन में शिबू सोरेन के साथ कई रातें जंगलों में गुजारों. संघर्ष की कई कहानियां. पहाड़ों की तराई में बसे नेमरा में हुए बदलाव की कहानी. प्रभात खबर को जानकारी मिली कि सभा स्थल में गुरुजी के साथी अर्जुन राम हैं, तो फिर बातचीत का सिलसिला शुरू हुआ. तब और आज के नेमरा गांव पर बात हुई. आज चकाचक सड़कें, मोबाइल का पूरा नेटवर्क, स्वास्थ्य उपकेंद्र, तालाब, पेयजल व बिजली की दुरुस्त व्यवस्था, और बढ़िया आंगनबाड़ी केंद्र. शिबू की जन्मस्थली नेमरा बदल गया है और बदलाव के गवाह अर्जुन राम रहे हैं. उनका गांव भी बगल में है. 

वे बताते हैं कि एक जमाना था:

चार-पांच किमी जंगल से गुजरते हुए पैदल नेमरा आना पड़ता था. वे बताते हैं कि गुरुजी उनसे छोटे थे. 15-16 वर्ष के होंगे, तब से दोस्ती है. महाजनी आंदोलन चल रहा था. गुरुजी के बहुत दुश्मन हो गये थे. नेमरा के साथ आसपास के गांवों में आंदोलन रफ्तार पकड़ रही थी. गुरुजी को आना पड़ता, तो उनके साथ चार-पांच लोग साथ होते. अलग-अलग रास्ता पकड़कर गांव आते-जाते. अर्जुन राम बताते हैं कि ज्यादातर समय साथ रहते. तब नेमरा में सुविधा के नाम पर कुछ नहीं था. न सड़क, न बिजली. वे बताते हैं कि कई रात हमने जंगलों में गुजारी हैं. सुबह होने का इंतजार करते. जंगल के जानवरों से भी डर नहीं लगता था. शिबू कहते थे जंगलों से प्यार करोगे, यहां आते-जाते रहोगे, तो पशु-पक्षी भी दोस्त बन जायेंगे. सच में तब हमारे सामने केवल आंदोलन के सपने थे, बाघ-सियार भी परिचित जैसे लगते थे. अर्जुन राम बताते हैं कि शिबू सोरेन को आंदोलन के क्रम में देखते ही गोली मारने का आदेश दिया गया था. आंदोलन छिपछिप कर चला रहे थे. घूमता एक बार जीप से टुंडी जा रहे थे. जीप जंगल में ही फंस गयी. शाम हो रही थी. सूरज डूबने वाला था. हम सब जंगल में थे, लेकिन डर नहीं था. शिबू भी बेखौफ थे. कुछ दूर पर एक गांव था. कुछ लोगों को कुदाल लेकर बुलाया गया. वे जल्दबाजी कर रहे थे, लेकिन गुरुजी ने संताली में कहा- हापे-हापे, मतलब धीरे-धीरे. जंगल में ही फंसे रह गये, तो काई परेशानी नहीं है. लेकिन जल्दबाजी मत करो. अर्जुन राम कहते हैं- गुरुजी की सैकड़ों कहानियां है. कितना सुनाऊं. वह केवल आंदोलनकारी नहीं, एक समाज सुधारक थे. किसी गांव से गुजर रहे हैं, कोई शराबी मिल गया, तो उसके घर चले जाते, परिवार वालों से बात करते. उसके सुधारने के लिए आंदोलनकारियों को लगा देते. 

दीवारों पर सोहराई पेटिंग, लगायी गयीं स्ट्रीट लाइटें

दिशोम गुरु शिबू सोरेन की पहली पुण्यतिथि को लेकर प्रशासन ने तैयारी की थी. गांव में स्थित सरकारी भवनों का रंग-रोगन किया गया था. शिबू सोरेन के पैतृक घर के सामने आंगनबाड़ी केंद्र को पेंट किया गया था. सरकारी भवनों की दीवार पर सोहराई पेटिंग से सजाया गया था. अरोग्य केंद्र चकाचक था. गांव में जिला प्रशासन ने साफ-सफाई की थी. स्ट्रीट लाइट की व्यवस्था की गयी थी. नेमरा पूरी तरह बदल गया था. गांव की सड़कों को बेहतर बनाया गया था.

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लेखक के बारे में

By प्रिया गुप्ता

प्रिया गुप्ता प्रभात खबर डिजिटल में कंटेंट राइटर के रूप में कार्यरत हैं. फिलहाल वह झारखंड से जुड़ी खबरों पर काम करती हैं, जिनमें सरकारी योजनाएं, प्रमुख घटनाएं, सामाजिक मुद्दे और अन्य महत्वपूर्ण विषय शामिल हैं. इससे पहले वह लाइफस्टाइल डेस्क पर फैशन, हेल्थ, रिलेशनशिप, पैरेंटिंग और रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़े विषयों पर लेख लिख चुकी हैं. प्रिया ने डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी विश्वविद्यालय से स्नातक और अमिटी यूनिवर्सिटी से मास्टर डिग्री हासिल की है.

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