Shibu Soren Birth Anniversary: जन्मदिन पर लोगों से जुड़ते थे दिशोम गुरु शिबू सोरेन, बांटते थे कंबल

Shibu Soren Birth Anniversary: दिशोम गुरु शिबू सोरेन अलग झारखंड आंदोलन के लिए जीवनभर संघर्ष करते नजर आए. नेमरा और धोरधोरा में आज भी बाबा शिबू सोरेन के जन्मदिन की यादें जीवित हैं.

शिबू सोरेन (File Photo)

Shibu Soren Birth Anniversary:  (नेमरा से लौट कर सलाउद्दीन ) रामगढ़ जिले के गोला प्रखंड स्थित नेमरा, धोरधोरा और आसपास के गांव के लोग पहली बार ‘बाबा’ की कमी को महसूस करेंगे. दिशोम गुरु शिबू सोरेन को यहां के लोग सम्मान से ‘बाबा’ कह कर ही संबोधित करते रहे हैं. नेमरा में दिशोम गुरु के जन्म की कई यादें में आज भी जिंदा हैं. बीते वर्ष 11 जनवरी को बाबा शिबू सोरेन का जन्मदिन मनाने के लिए नेमरा से परिवार के कई सदस्य रांची गये थे. उस कार्यक्रम में शिबू सोरेन के छोटे भाई स्व शंकर सोरेन की पत्नी दीपमनी सोरेन और बेटी रेखा सोरेन भी शामिल थीं. दीपमनी सोरेन व रेखा सोरेन ने बताया कि इस बार बाबा का जन्मदिन सादगी के साथ मनायेंगे. उन्होंने कहा कि पिछले वर्ष जन्मदिन के अवसर पर पूरा परिवार एक साथ जुटा था. रेखा सोरेन ने बताया कि बाबा से हुई बातचीत, उनके साथ बिताये गये पल और पुरानी तस्वीरों को देखकर भावुक हो जाती हूं. परिवार के सदस्य और नेमरा के लोग इस वर्ष जन्मदिन के मौके पर बाबा को श्रद्धा के साथ याद करेंगे.

जन्मदिन पर लोगों से जुड़ते थे बाबा, बांटते थे कंबल

नेमरा गांव प्रकृति की गोद में बसा हुआ है. चंदवा टुंगरी पहाड़ की तराई में स्व शिबू सोरेन का पैतृक आवास स्थित है. एक ओर ढेकाकोचा पहाड़ व दूसरी ओर बाड़ेकोचा पहाड़ की हरियाली गांव की प्राकृतिक सुंदरता को और बढ़ाती है. संथाल बहुल इस गांव में रहनेवाले संथाली परिवारों का कहना है कि स्व शिबू सोरेन की यादें आज भी गांव व लोगों के बीच जीवित हैं. स्व शिबू सोरेन के चचेरे भाई किशोरी सोरेन (70 वर्ष) ने बताया कि जन्मदिन के आसपास जब भी शिबू सोरेन नेमरा गांव आते थे, तो लोगों को बुला कर कंबल बांटते थे. वे कभी यह नहीं कहते थे कि आज मेरा जन्मदिन है. बल्कि पहले लोगों का हालचाल पूछते थे और फिर जरूरतमंदों की मदद करते थे. गांव में किसी बच्चे के जन्म की जानकारी मिलने पर संबंधित परिवार को बुला कर सहायता जरूर करते थे. बच्चों को पढ़ाई पर ध्यान देने और नशापान से दूर रहने की सलाह देते थे. किशोरी सोरेन ने बताया कि गोतिया परिवारों के घर अगल-बगल हैं. शिबू सोरेन चाचा से मिलने अक्सर घर आते थे. एक बार अपने जन्मदिन के मौके पर वे नेमरा आये थे. उस वर्ष भी गांव के लोगों के बीच कंबल बांटे गये थे. महाजनी प्रथा व नशापान से दूर रहने का संदेश देते थे. नेमरा गांव के जागरन सोरेन, दिलको सोरेन, बिरजू सोरेन समेत कई संताली लोग आज भी बाबा के सरल स्वभाव और सामाजिक सरोकार को याद कर भावुक हो जाते हैं.

जन्मदिन पर बना था खिचड़ी, बंटते थे लड्डू

दिशोम गुरु स्व शिबू सोरेन के बचपन के साथी करम मांझी (83 वर्ष) कोरांबे पंचायत के धोरधोरा गांव के निवासी हैं. वे सेवानिवृत्त शिक्षक हैं. धोरधोरा गांव नेमरा से लगभग 10 किलोमीटर दूर है. करम मांझी के घर के चारों ओर आज भी घने जंगल हैं. इन दिनों वे काफी बीमार चल रहे हैं. घर के सबसे बाहर वाले कमरे में खाट पर लेटे करम मांझी को जब उनके बेटे तारकेश्वर मुर्मू ने बताया कि लोग शिबू सोरेन के बारे में बातचीत करने आये हैं, तो वे उठ कर बैठ गये. करम मांझी ने बताया कि बचपन में शिबू सोरेन के साथ पढ़ायी, खेलकूद, घूमना व महाजनी प्रथा के खिलाफ आंदोलन में वे हमेशा साथ रहे. उन्होंने बताया कि उस दौर में शिबू सोरेन का जन्मदिन हमेशा औराडीह देशवल टांड़ में मनाया जाता था. इस तिथि पर अधिकतर दोस्त वहीं जुटते थे, क्योंकि यह स्थान सभी के लिए नजदीक पड़ता था. वहां भोला बेसरा, स्व अर्जुन मास्टर व भागीरथ महतो समेत कई लोग रहते थे.

करम मांझी ने बताया कि जन्मदिन के मौके पर वहीं के दो कारीगर खिचड़ी बनाते थे. कभी-कभी लड्डू भी बांटे जाते थे. खाना-पीना के बाद चाय-पानी होता था. कई बार सभी दोस्त मिलकर स्वयं खाना बनाते थे. कोई दोस्त कॉपी-कलम लेकर आ जाता था. सभी बैठकर विचार-विमर्श करते थे व उसी कॉपी में लिखा-पढ़ी होता था. उन्होंने बताया कि एक बार ऐसा भी हुआ महाजनी प्रथा का आंदोलन चल रहा था. पुलिस से बचने के लिए शिबू सोरेन शाम होते ही धोरधोरा स्थित मेरे घर आ जाया करते थे. जन्मदिन की तिथि पर बस्ती में ही सभी संथाली लोग मिलकर साग-सब्जी का भोजन बनाये थे. वे किसी से घृणा नहीं करते थे. खाने-पीने में जो मिलता, खा लेते थे. जन्मदिन के अवसर पर बस्ती के लोग एक साथ भोजन किये थे. साथ ही आंदोलन पर बातचीत हुई थी. इसके बाद वे जैनामोड़ में रहने लगे थे. इसके बाद भी कई बार धोरधोरा में शिबू का जन्मदिन हमलोग मिलकर मनाया था.

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लेखक के बारे में

Author: Amitabh Kumar

अमिताभ कुमार झारखंड की राजधानी रांची के रहने वाले हैं और पिछले कई वर्षों से पत्रकारिता की दुनिया में सक्रिय हैं. डिजिटल न्यूज में अच्छी पकड़ है और तेजी के साथ सटीक व भरोसेमंद खबरें लिखने के लिए जाने जाते हैं. वर्तमान में अमिताभ प्रभात खबर डिजिटल में नेशनल और वर्ल्ड न्यूज पर फोकस करते हैं और तथ्यों पर आधारित खबरों को प्राथमिकता देते हैं. हरे-भरे झारखंड की मिट्टी से जुड़े अमिताभ ने अपनी शुरुआती पढ़ाई जिला स्कूल रांची से पूरी की और फिर Ranchi University से ग्रेजुएशन के साथ पत्रकारिता की पढ़ाई की. पढ़ाई के दौरान ही साल 2011 में रांची में आयोजित नेशनल गेम को कवर करने का मौका मिला, जिसने पत्रकारिता के प्रति जुनून को और मजबूत किया.1 अप्रैल 2011 से प्रभात खबर से जुड़े और शुरुआत से ही डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय रहे. खबरों को आसान, रोचक और आम लोगों की भाषा में पेश करना इनकी खासियत है. डिजिटल के साथ-साथ प्रिंट के लिए भी कई अहम रिपोर्ट कीं. खासकर ‘पंचायतनामा’ के लिए गांवों में जाकर की गई ग्रामीण रिपोर्टिंग करियर का यादगार अनुभव है. प्रभात खबर से जुड़ने के बाद कई बड़े चुनाव कवर करने का अनुभव मिला. 2014, 2019 और 2024 के लोकसभा चुनाव के साथ-साथ झारखंड विधानसभा चुनावों (2014, 2019 और 2024) की भी ग्राउंड रिपोर्टिंग की है. चुनावी माहौल, जनता के मुद्दे और राजनीतिक हलचल को करीब से समझना रिपोर्टिंग की खास पहचान रही है.

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