डकरा. वित्तीय वर्ष 2025-26 में एनके एरिया अपने कोयला उत्पादन लक्ष्य से 10 लाख 23 हजार 866 टन पीछे रह गया है. यह आंकड़ा 30 मार्च तक का है. 31 मार्च का आंकड़ा एक अप्रैल को सुबह छह बजे जब अंतिम पाली समाप्त होगी, तब स्पष्ट होगा, लेकिन यह तय है कि एरिया अपने कोयला उत्पादन का लक्ष्य से लगभग दस लाख टन पीछे रह गया है. एक राहत की बात यह जरूर है कि पिछले वर्ष की अपेक्षा इस वर्ष आंकड़े में मामूली बढ़त हासिल हुई है. इस वित्तीय वर्ष में एरिया को 34 लाख टन कोयला उत्पादन करने का लक्ष्य दिया गया था, जिसमें चूरी को छह लाख टन, डकरा को पांच लाख टन, केडीएच को दस लाख टन, पुरनाडीह को सात लाख टन और रोहिणी को छह लाख टन कोयला उत्पादन करने का लक्ष्य तय किया गया था, लेकिन इसके एवज में 30 मार्च तक चूरी परियोजना को छोड़ कर सभी पांचों परियोजना अपने तय लक्ष्य से पीछे रह गई. चूरी छह लाख के एवज में 6 लाख 8578 टन कोयला उत्पादन करने में सफलता हासिल की है, लेकिन डकरा 4 लाख 46 हजार 832 टन, केडीएच 8 लाख 77 हजार 472 टन, पुरनाडीह 1 लाख 47 हजार 580 टन और रोहिणी 2 लाख 82 हजार 60 टन ही कोयला निकाल सकी है. लक्ष्य मुताबिक 30 मार्च तक एरिया को 33 लाख 86 हजार 366 टन कोयला उत्पादन किया जाना था, लेकिन इस दिन तक मात्र 23 लाख 62 हजार 500 टन ही उत्पादन किया जा सका है. पिछले वर्ष इस दिन तक 23 लाख 51 हजार 374 टन कोयला निकला था. ओबी निकालने के मामले में भी लगभग इसी तरह का आंकड़ा है. 61 लाख टन ओबी निकालने के लक्ष्य मुकाबले 39 लाख 35 हजार 341 टन ओबी निकाला जा सका है, जो तय लक्ष्य से 21 लाख 45 हजार 278 टन पीछे है.
नये वित्तीय वर्ष में भी चुनौती बरकरार
वित्तीय वर्ष 2026-27 में भी एनके एरिया के समक्ष चुनौती बरकरार है. डकरा परियोजना बंद कर दी जायेगी या उसे नया जीवनदान मिलेगा, यह स्थिति इस वर्ष स्पष्ट नहीं हो सकी, क्योंकि पूर्व में डकरा को बंद करने की घोषणा कर दी गयी थी, लेकिन नये पीओ संजीव कुमार ने उसको एक दशक तक चलाने की बात कही है, केडीएच को जामुनदोहर बस्ती में मिली जमीन पर तीन साल किसी तरह चला लिया गया. 219 हेक्टेयर वन भूमि के लिए स्टेज-2 क्लियरेंस के लिए फाइल दिल्ली गयी है, यह होने पर यहां अगले 15 साल तक कोयला निकाला जा सकेगा, लेकिन यह कब तक होगा स्पष्ट नहीं है. पुरनाडीह एक आउटसोर्स कंपनी को दो साल पहले दे दिया गया था, लेकिन जरूरी प्रक्रिया पूरी नहीं हुई और कंपनी काम शुरू नहीं कर सकी. यहां एक और बात है कि पुरनाडीह को चलाने में आंकड़ा घाटे का बता रहा है, ऐसे में इस परियोजना का भविष्य अधर में लटका हुआ है. रोहिणी को रोहिणी-करकट्टा में तब्दील होने का लंबे समय से इंतजार है, लेकिन इसकी समय-सीमा भी स्पष्ट नहीं है, वहीं एकमात्र भूमिगत खदान चूरी जिसे आउटसोर्स कंपनी जाॅय माइनिंग चला रही है, लेकिन इसकी भी एक अलग तरह की समस्या पर काम करने की जरूरत है.
