झारखंड में जल, जंगल, जमीन को संरक्षित कर सकती है लैंडस्केप एप्रोच पॉलिसी, ओडिशा और आंध्र प्रदेश में कामयाब

Ranchi News: झारखंड में जल, जंगल और जमीन के संरक्षण के लिए लैंडस्केप एप्रोच पॉलिसी प्रभावी विकल्प बन सकती है. SocArXiv में प्रकाशित नीति पत्र में ओडिशा और आंध्र प्रदेश के सफल मॉडलों का उल्लेख किया गया है. विशेषज्ञों के अनुसार सामुदायिक भागीदारी से प्राकृतिक संसाधनों का टिकाऊ प्रबंधन संभव है. इससे जुड़ी खबर नीचे पढ़ें.

Ranchi News: झारखंड जैसे प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध राज्य के लिए जल, जंगल और जमीन के संरक्षण की चुनौती लगातार बढ़ती जा रही है. ऐसे में शोधकर्ताओं और क्षेत्र के विशेषज्ञों द्वारा जारी एक नये नीति पत्र में “क्षेत्र-आधारित दृष्टिकोण” (लैंडस्केप एप्रोच) को प्राकृतिक संसाधनों के प्रबंधन और शासन का केंद्र बिंदु बनाने की वकालत की गयी है. विशेषज्ञों का मानना है कि ओडिशा और आंध्र प्रदेश के समुदायों के अनुभव झारखंड के लिए भी उपयोगी साबित हो सकते हैं.

SocArXiv में प्रकाशित हुआ नीति पत्र

सामाजिक विज्ञान के मुक्त अभिलेख (SocArXiv) में प्रकाशित इस नीति पत्र में ओडिशा और आंध्र प्रदेश के कई समुदायों के अनुभवों का उल्लेख किया गया है. मई 2026 में जारी इस दस्तावेज का शीर्षक “सतत विकास में क्षेत्र-आधारित दृष्टिकोणों की केंद्रीयता” है. यह 2024 में नई दिल्ली में आयोजित ‘कॉमन्स कन्वीनिंग’ और 2025 में अहमदाबाद में आयोजित ‘इंडिया लैंड एंड डेवलपमेंट कॉन्फ्रेंस’ में हुई चर्चाओं और जमीनी अनुभवों पर आधारित है.

झारखंड के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह मॉडल

झारखंड में बड़ी आबादी आजीविका के लिए खेती, वनों और जल संसाधनों पर निर्भर है. राज्य के कई हिस्सों में भूजल स्तर में गिरावट, मिट्टी का क्षरण, जंगलों पर बढ़ता दबाव और जलवायु परिवर्तन के प्रभाव जैसी चुनौतियां सामने हैं. ऐसे में नीति पत्र में सुझाया गया क्षेत्र-आधारित दृष्टिकोण राज्य के लिए एक व्यावहारिक मॉडल के रूप में देखा जा रहा है. विशेषज्ञों का मानना है कि यदि जल, जंगल, कृषि भूमि और समुदायों को अलग-अलग योजनाओं के बजाय एकीकृत प्रणाली के रूप में देखा जाये, तो इससे संसाधनों का बेहतर संरक्षण और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिल सकती है.

प्राकृतिक संसाधनों पर लगातार बढ़ रहा है दबाव

नीति पत्र में कहा गया है कि भारत में दुनिया की लगभग 16 प्रतिशत आबादी रहती है, जबकि यहां विश्व की केवल 2.4 प्रतिशत भूमि उपलब्ध है. वर्ष 2018-19 तक देश की लगभग 9.8 करोड़ हेक्टेयर भूमि क्षरण का शिकार हो चुकी थी. साथ ही देश के जैव विविधता वाले क्षेत्रों का बड़ा हिस्सा भी प्रभावित हुआ है. झारखंड में भी खनन, अनियोजित विकास और जलवायु परिवर्तन के कारण प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव बढ़ा है. ऐसे में टिकाऊ विकास के लिए सामुदायिक भागीदारी को मजबूत करना आवश्यक माना जा रहा है.

ओडिशा के क्योंझर मॉडल से मिल सकती है सीख

नीति पत्र में ओडिशा के क्योंझर जिले के अनुभवों का उल्लेख किया गया है, जहां महिला संगठन फॉर सोशियो-कल्चरल अवेयरनेस (WOSCA) ने स्थानीय निकायों, नागरिक समाज संगठनों और समुदायों को एक साझा योजना के तहत जोड़ा. डिजिटल मैपिंग और पारंपरिक ज्ञान के समन्वय से भूजल स्तर में सुधार हुआ, मिट्टी की नमी बढ़ी और कृषि उत्पादन में वृद्धि दर्ज की गयी.

क्या कहते हैं विशेषज्ञ

WOSCA से मानसिंह दुर्गा प्रसाद नायक कहते हैं, ‘क्योंझर में महिला स्वयं सहायता समूह की सदस्यें संरक्षक (स्टीवर्ड) की तरह बन रही हैं. वे परिवर्तन लाने वाली एजेंट की तरह काम कर रही हैं.’ इन समूहों के साथ अपने काम पर विचार करते हुए वे कहते हैं, ‘जब समुदाय को डेटा और इरादे के साथ सशक्त बनाया जाएगा और जब उन्हें सभी नागरिक समाज संगठनों और समुदाय-आधारित संगठनों के साथ जोड़ा जाएगा, तो कुछ बदलाव होगा, पूरा पारिस्थितिकी तंत्र (इकोसिस्टम) बदल जाएगा.’

क्षेत्र-आधारित दृष्टिकोण में बदलाव की जरूरत

वाटर, एनवायरनमेंट, लैंड एंड लिवलीहुड्स (वेल) लैब्स से डॉ वीना श्रीनिवासन ने कहा कि क्षेत्र-आधारित दृष्टिकोण में परिवर्तन लाने के लिए वर्तमान मॉडल से सोच में एक मौलिक बदलाव की आवश्यकता है, जहां विशिष्ट जमीनी संगठन विशिष्ट भूदृश्यों के मालिकों के रूप में कार्य करते हैं. उन्होंने कहा कि क्षेत्र-आधारित सोच में ‘शक्ति या निर्णय लेने का केंद्र (लोकस ऑफ पावर) समुदाय-आधारित संगठन के पास होना चाहिए, चाहे वह स्वयं सहायता समूह हो या हो सकता है. अगर हम कमांड क्षेत्रों में काम करते हैं, तो पानी उपयोगकर्ता सहकारी समितियां या किसान उत्पादक संगठन जो भी हो, उस भूदृश्य में रहने वाले लोगों के समूह का इरादा उस भूदृश्य का स्वामित्व लेना हो. चाहे कुछ भी हो जाए, उस भूदृश्य को नहीं छोड़ना पड़े.’

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झारखंड में महिला समूह निभा सकते हैं अहम भूमिका

विशेषज्ञों का मानना है कि झारखंड में सक्रिय स्वयं सहायता समूह, ग्राम सभाएं और सामुदायिक संस्थाएं भी इस तरह के मॉडल को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं. राज्य के आदिवासी और ग्रामीण इलाकों में पारंपरिक ज्ञान और सामुदायिक भागीदारी की मजबूत विरासत पहले से मौजूद है. नीति पत्र के अनुसार, यदि समुदायों को डेटा, तकनीक और संस्थागत सहयोग के साथ सशक्त बनाया जाये, तो केवल जल, जंगल और जमीन का संरक्षण ही नहीं होगा, बल्कि पूरे पारिस्थितिकी तंत्र और ग्रामीण जीवन में सकारात्मक बदलाव लाया जा सकता है. विशेषज्ञों का मानना है कि झारखंड के लिए यह मॉडल सतत विकास और प्राकृतिक संसाधनों के बेहतर प्रबंधन की दिशा में महत्वपूर्ण साबित हो सकता है.

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लेखक के बारे में

Published by: KumarVishwat Sen

कुमार विश्वत सेन प्रभात खबर डिजिटल में डेप्यूटी चीफ कंटेंट राइटर हैं. इनके पास हिंदी पत्रकारिता का 25 साल से अधिक का अनुभव है. इन्होंने 21वीं सदी की शुरुआत से ही हिंदी पत्रकारिता में कदम रखा. दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदी पत्रकारिता का कोर्स करने के बाद दिल्ली के दैनिक हिंदुस्तान से रिपोर्टिंग की शुरुआत की. इसके बाद वे दिल्ली में लगातार 12 सालों तक रिपोर्टिंग की. इस दौरान उन्होंने दिल्ली से प्रकाशित दैनिक हिंदुस्तान दैनिक जागरण, देशबंधु जैसे प्रतिष्ठित अखबारों के साथ कई साप्ताहिक अखबारों के लिए भी रिपोर्टिंग की. 2013 में वे प्रभात खबर आए. तब से वे प्रिंट मीडिया के साथ फिलहाल पिछले 10 सालों से प्रभात खबर डिजिटल में अपनी सेवाएं दे रहे हैं. इन्होंने अपने करियर के शुरुआती दिनों में ही राजस्थान में होने वाली हिंदी पत्रकारिता के 300 साल के इतिहास पर एक पुस्तक 'नित नए आयाम की खोज: राजस्थानी पत्रकारिता' की रचना की. इनकी कई कहानियां देश के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं.

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