झारखंड : बंद कोयला खदानों को मिलेगा नया जीवन, गिरिडीह और रामगढ़ में बनेगा विकास का नया मॉडल

झारखंड अपनी बंद हो रही कोयला खदानों को नए आर्थिक और सामाजिक हब में बदलने की तैयारी कर रहा है. गिरिडीह और रामगढ़ की खदानों को पायलट प्रोजेक्ट के तहत विकसित किया जाएगा, जिससे नवीकरणीय ऊर्जा, पर्यटन और रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे.

Jharkhand Coal Mines : झारखंड की बंद होने वाली कोयला खदानें अब केवल खनन के अतीत की निशानी नहीं रहेंगी, बल्कि भविष्य की आर्थिक, सामाजिक और पर्यावरणीय गतिविधियों का नया केंद्र बन सकती हैं. इसी सोच के साथ राज्य सरकार ने गिरिडीह ओपन कास्ट प्रोजेक्ट (ओसीपी) और रामगढ़ की करमा ओसीपी को बंद खदानों के पुनर्वास और पुनर्पयोग की पायलट परियोजना के लिए चुना है. भारत सरकार के कोयला मंत्रालय और जर्मनी की विकास सहयोग संस्था जीआइजेड (GIZ) के सहयोग से संचालित Technical Cooperation on To-be-Closed Coal Mines (TCCM) परियोजना के तहत इन दोनों खदानों के लिए विस्तृत योजना तैयार की जायेगी.

बुधवार को रांची में आयोजित उच्चस्तरीय बैठक में दोनों खदानों को पायलट परियोजना के लिए अंतिम रूप देने पर सहमति बनी. बैठक में खान एवं भूतत्व विभाग के सचिव अरवा राजकमल, कोयला मंत्रालय, कोल कंट्रोलर ऑर्गेनाइजेशन, सेंट्रल कोलफील्ड्स लिमिटेड (सीसीएल), सीएमपीडीआइ और जीआइजेड के प्रतिनिधि शामिल हुए.

खदान बंदी को मिलेगा नया अर्थ

आमतौर पर खदान बंद होने के बाद वहां की भूमि और संसाधन अनुपयोगी हो जाते हैं. इससे स्थानीय अर्थव्यवस्था प्रभावित होती है और रोजगार के अवसर भी घट जाते हैं. टीसीसीएम परियोजना का उद्देश्य इस सोच को बदलना है. इसके तहत खदान बंदी को केवल खनन गतिविधि की समाप्ति नहीं माना जायेगा, बल्कि उसे क्षेत्र के पुनर्निर्माण और नये विकास अवसरों से जोड़ा जायेगा.

गिरिडीह और करमा ओसीपी के लिए Final Mine Closure and Repurposing Plan तैयार किया जायेगा. इसमें भूमि उपयोग, जल संसाधन, पर्यावरणीय पुनर्स्थापन, आधारभूत संरचना और स्थानीय अर्थव्यवस्था के पुनर्विकास की संभावनाओं का विस्तृत अध्ययन किया जायेगा. अंतरराष्ट्रीय अनुभवों और आधुनिक तकनीकों के आधार पर तैयार होने वाली यह योजना भविष्य में देश की अन्य बंद होने वाली कोयला खदानों के लिए भी मॉडल बन सकती है.

नवीकरणीय ऊर्जा से पर्यटन तक की संभावनाएं

परियोजना के तहत बंद खदानों की भूमि का उपयोग नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं, पर्यटन, कृषि, बागवानी, मत्स्य पालन, सामुदायिक सुविधाओं और कौशल विकास केंद्रों के लिए करने की संभावनाओं का अध्ययन किया जायेगा. इससे खनन आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में रोजगार के नये अवसर सृजित हो सकते हैं.

विशेषज्ञों का मानना है कि कोयला भंडार समाप्त होने के बाद भी इन क्षेत्रों को आर्थिक रूप से सक्रिय रखा जा सकता है. यदि खदानों की भूमि का योजनाबद्ध तरीके से उपयोग किया जाये, तो स्थानीय लोगों को वैकल्पिक रोजगार उपलब्ध कराया जा सकता है और क्षेत्रीय विकास की गति बनी रह सकती है.

स्थानीय लोगों की भागीदारी पर रहेगा जोर

परियोजना में प्रभावित समुदायों की सामाजिक और आर्थिक स्थिति का आकलन भी किया जायेगा. स्थानीय लोगों की आजीविका, कौशल और भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए पुनर्पयोग की योजना तैयार होगी. इसके लिए स्थानीय समुदाय, जिला प्रशासन और विभिन्न विभागों को भी प्रक्रिया में शामिल किया जायेगा.

परियोजना के तहत कौशल विकास, पुनःप्रशिक्षण और वैकल्पिक रोजगार सृजन पर विशेष ध्यान दिया जायेगा, ताकि खदान बंद होने के बाद लोगों की आय और रोजगार पर प्रतिकूल असर न पड़े.

करमा ओसीपी के आठ गांव फोकस में

करमा ओसीपी के पांच किलोमीटर के प्रभाव क्षेत्र में आने वाले आठ गांवों को परियोजना के लिए चिह्नित किया गया है. इनमें सुगिया, मरार, बोंगाबार, करमा, कैथा, कंडेर, लोढ़मा और पैंकी शामिल हैं. इन गांवों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति, कमजोर वर्गों की स्थिति और रोजगार की संभावनाओं का अध्ययन किया जा रहा है.

खदान बंदी और पुनर्पयोग की प्रक्रिया में स्थानीय स्तर पर समन्वय सुनिश्चित करने के लिए Mine Closure Advisory Committee का गठन भी किया जा चुका है. यह समिति स्थानीय जरूरतों और सुझावों को योजना में शामिल करने का काम करेगी.

मार्च 2030 तक चलेगी परियोजना

परियोजना के तहत पुनर्वास और पुनर्पयोग की विस्तृत डीपीआर तैयार की जायेगी. इसमें पर्यावरणीय पुनर्स्थापन, जल प्रबंधन, mine void management और स्थानीय आधारभूत संरचनाओं के उपयोग जैसे पहलुओं को शामिल किया जायेगा. साथ ही पुनर्वासित क्षेत्रों में निवेश और नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं की संभावनाएं भी तलाश की जायेंगी.

टीसीसीएम परियोजना मार्च 2030 तक संचालित की जानी है. इस दौरान प्राप्त अनुभवों और निष्कर्षों को देश की अन्य बंद होने वाली कोयला खदानों में भी लागू करने की योजना है. राज्य सरकार का मानना है कि वैज्ञानिक mine closure और land repurposing के जरिये आज की परित्यक्त खदानों को कल की उत्पादक परिसंपत्तियों में बदला जा सकता है. यदि यह प्रयोग सफल रहा, तो झारखंड के कोयला क्षेत्रों में खनन के बाद विकास का एक नया मॉडल स्थापित हो सकता है.

ये भी पढ़ें: महिला पर्यवेक्षिका परीक्षा मामला: HC की खंडपीठ ने एकल पीठ के आदेश पर लगाई रोक, 33 अभ्यर्थियों को नोटिस

ये भी पढ़ें: ये भी पढ़ें- Jharkhand में Swine Flu का बढ़ा खतरा, स्वास्थ्य विभाग अलर्ट; सभी जिलों में जल्द शुरू होगी जांच

प्रभात खबर डिजिटल टॉप स्टोरी

लेखक के बारे में

By Sunil choudhary

25 वर्षों से पत्रकारिता कर रहा हूँ.हार्ड न्यूज़ से राजनीतिक खबर करता रहा हूँ.वर्तमान में मुख्यमंत्री, पावर,इंडस्ट्रीज, माइंस संबंधित मामलों पर रिपोर्ट करता हूँ. बीबीसी,पैनोस और झारखंड सरकार से फेलोशिप ले चुका हूँ।कई बार अवार्ड ले चुका हूँ.
Read More
ePaper

अपने दैनिक समाचार अनुभव को और बेहतरीन बनाएं

सिर्फ ₹399 ₹149

एक साल के लिए

आज ही सब्सक्राइब करें

संबंधित खबरें >

यह भी पढ़ें >