रांची से राणा प्रताप की रिपोर्ट
Ranchi News: झारखंड हाईकोर्ट ने पेंशन लाभ से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में राज्य सरकार को कड़ी फटकार लगाई है. चीफ जस्टिस एमएस सोनक और जस्टिस राजेश शंकर की खंडपीठ ने स्पष्ट कहा कि लोक अदालत का आदेश अंतिम और बाध्यकारी होता है, जिसे किसी भी स्थिति में टाला नहीं जा सकता. कोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि वह चार सप्ताह के भीतर राष्ट्रीय लोक अदालत के आदेश को लागू करे.
देरी पर जताई नाराजगी, ब्याज के साथ भुगतान का आदेश
खंडपीठ ने अपने फैसले में कहा कि 13 जुलाई 2024 को दिए गए लोक अदालत के आदेश को लागू करने में जानबूझकर देरी की गई है. इस लापरवाही को गंभीर मानते हुए कोर्ट ने निर्देश दिया कि याचिकाकर्ताओं को देय राशि का भुगतान छह प्रतिशत वार्षिक ब्याज के साथ किया जाए. यह ब्याज निर्णय की तिथि से लेकर भुगतान की तिथि तक लागू रहेगा.
तकनीकी आधार पर आदेश टालना अनुचित
अदालत ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि तकनीकी आधार पर लोक अदालत के आदेश को टालना पूरी तरह अनुचित है. राज्य सरकार और संबंधित विभागों को यह समझना होगा कि न्यायिक आदेशों का सम्मान करना उनका दायित्व है. कोर्ट ने कहा कि इस तरह की लापरवाही न्याय व्यवस्था की भावना के खिलाफ है.
गरीब और वृद्ध कर्मचारियों को झेलनी पड़ी परेशानी
खंडपीठ ने यह भी कहा कि इस मामले में याचिकाकर्ता गरीब और वृद्ध कर्मचारी हैं, जिन्हें फैसले का लाभ न मिलने के कारण गंभीर कठिनाइयों का सामना करना पड़ा. अदालत ने कहा कि एक वर्ष और नौ महीने से अधिक समय तक इन कर्मचारियों को उनके अधिकारों से वंचित रखा गया, जो बेहद चिंताजनक है.
राज्य सरकार की जिम्मेदारी पर जोर
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि राज्य प्राधिकरण होने के नाते सरकार का दायित्व है कि वह निष्पक्ष और उचित तरीके से कार्य करे. विशेष रूप से जब मामला आम नागरिकों से जुड़ा हो, तो सरकार को अधिक संवेदनशील और जिम्मेदार रवैया अपनाना चाहिए. अदालत ने कहा कि तकनीकी आपत्तियों के सहारे आदेश का पालन टालना निंदनीय है.
लघु सिंचाई विभाग से जुड़ा है मामला
यह पूरा मामला लघु सिंचाई विभाग के कर्मियों से जुड़ा है, जिन्होंने अपनी सेवा की गणना प्रारंभिक नियुक्ति तिथि से करने की मांग की थी. इन कर्मचारियों का कहना था कि यदि उनकी सेवा की गणना डेली वेज से की जाए, तो उन्हें पेंशन और अन्य लाभ मिल सकेंगे.
राष्ट्रीय लोक अदालत का आदेश और अनुपालन में देरी
13 जुलाई 2024 को राष्ट्रीय लोक अदालत में समझौते के आधार पर आदेश दिया गया था कि कर्मचारियों को उनकी नियुक्ति तिथि से लाभ प्रदान किया जाए. इसके बावजूद संबंधित विभागों ने इस आदेश का पालन नहीं किया, जिससे कर्मचारियों को न्याय पाने के लिए फिर से अदालत का दरवाजा खटखटाना पड़ा.
14 कर्मचारियों ने दायर की थी अपील
इस मामले में कुल 14 कर्मचारियों (जुबली देवी, महेंद्र कुमार सिंह, उर्मिला देवी, लुईस कुजूर, एसपी सिंह, जुगल राम, राजेंद्र प्रसाद सिंह, कुलदीप राम, भुवनेश्वर विश्वकर्मा, नागेंद्र सिंह, महेंद्र नाथ सिंह, मोती चंद्र ठाकुर, हरिशंकर अवस्थी और अनिल कुमार सिंह) ने अपील याचिका दायर की थी. इन सभी ने अपने अधिकारों की मांग को लेकर न्यायालय का सहारा लिया था.
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न्यायालय का स्पष्ट संदेश
हाईकोर्ट के इस फैसले ने यह स्पष्ट संदेश दिया है कि लोक अदालत के आदेशों को नजरअंदाज करना या टालना स्वीकार्य नहीं है. अदालत ने राज्य सरकार को चेताया है कि वह भविष्य में इस प्रकार की लापरवाही से बचे और न्यायिक आदेशों का समय पर पालन सुनिश्चित करे.
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