झारखंड हाईकोर्ट की फटकार, धनबाद के 5 बालू घाटों का टेंडर पैसा 6% ब्याज के साथ लौटाए सरकार

Jharkhand High Court: झारखंड हाईकोर्ट ने गॉडफैम इन्वेस्टमेंट कंपनी के मामले में राज्य सरकार को धनबाद के पांच बालू घाटों की बोली राशि 6% ब्याज के साथ वापस करने का आदेश दिया है. पढ़ें, अदालत ने सुनवाई के दौरान क्या कहा?

रांची से राणा प्रताप की रिपोर्ट

Jharkhand High Court, रांची : झारखंड हाईकोर्ट ने बालू घाटों के खनन पट्टे और राज्य सरकार की बार-बार बदलती नीतियों से जुड़े एक मामले में ऐतिहासिक फैसला सुनाया है. चीफ जस्टिस एमएस सोनक और जस्टिस राजेश शंकर की खंडपीठ ने सरकार की कार्यशैली पर तल्ख टिप्पणी करते हुए निर्देश दिया है कि जिस अवधि में प्रार्थी कंपनी खनन कार्य नहीं कर सकी, उस अवधि की टेंडर राशि उसे हर हाल में वापस की जाए. अदालत ने साफ कहा कि सरकार कंपनी से मोटी रकम वसूलने के बाद उसे माइनिंग करने से रोक भी नहीं सकती. साथ ही उस पैसे को दबाकर अपने पास भी नहीं रख सकती.

हाईकोर्ट बोला- गलती सरकार की, भुगते क्यों कंपनी?

अदालत ने प्रार्थी कंपनी ‘गॉडफैम इन्वेस्टमेंट एंड फाइनेंस कंपनी लिमिटेड’ के पक्ष में फैसला सुनाते हुए सरकार को केवल मूलधन ही नहीं, बल्कि 6 प्रतिशत वार्षिक साधारण ब्याज के साथ राशि लौटाने का हुक्म दिया है. ब्याज की यह गणना 15 अक्टूबर 2012 (जब कंपनी ने औपचारिक रूप से घाट सरेंडर किया था) से लेकर वास्तविक भुगतान की तारीख तक की जाएगी. हाईकोर्ट की खंडपीठ ने सरकार को आईना दिखाते हुए कहा कि जब 2011 में लीज दी गई थी, तब एनवायरमेंट क्लीयरेंस की कोई शर्त नहीं थी. सरकार ने बीच में अचानक नई शर्त थोप दी, जिसका पूरा आर्थिक बोझ कंपनी पर नहीं डाला जा सकता. कोर्ट ने साफ कहा कि सरकार अपनी नीतिगत गलतियों का खामियाजा पट्टाधारी (Leaseholder) के सिर नहीं मढ़ सकती. कंपनी के पास दो ही रास्ते थे- या तो वह पर्यावरण क्लीयरेंस ले या घाट वापस कर दे. कंपनी ने घाट सरेंडर करने का सही विकल्प चुना, इसलिए वह रिफंड की हकदार है. हालांकि, कोर्ट ने रॉयल्टी, रजिस्ट्रेशन शुल्क और स्टांप ड्यूटी वापस लौटाने के संबंध में कोई नया दिशा-निर्देश जारी नहीं किया.

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क्या था पूरा विवाद?

मामला करीब 14-15 साल पुराना है. प्रार्थी कंपनी ‘गॉडफैम इन्वेस्टमेंट’ ने वर्ष 2011 में धनबाद जिले के पांच बालू घाटों के लिए तीन साल (2011 से 2014) के लिए खनन अधिकार जीता था. कंपनी ने बोली की पूरी रकम भी सरकारी खजाने में जमा कर दी थी. सब कुछ ठीक चल रहा था, लेकिन जून 2012 में राज्य सरकार ने अचानक नया नियम लागू करते हुए कंपनी का ‘ट्रांजिट चालान’ जारी करना बंद कर दिया. सरकार की दलील थी कि कंपनी के पास पर्यावरणीय स्वीकृति नहीं है. इसके विरोध में कंपनी ने कोर्ट का दरवाजा खटखटाया और दलील दी कि नीलामी नोटिस या लीज एग्रीमेंट में ऐसी किसी शर्त का जिक्र ही नहीं था. काम ठप होने के बाद आजिज आकर कंपनी ने 15 अक्टूबर 2012 को अपने पांचों बालू घाट सरकार को सरेंडर कर दिए थे, जिस पर अब जाकर कोर्ट का यह बड़ा फैसला आया है.

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Published by: Sameer Oraon

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