कौन हैं कामाख्या नारायण सिंह जिन्होंने छह सीटों से चुनाव लड़ा था और चार सीटों में हुए विजयी, प्रचार पहली बार उपयोग किया था हेलिकॉप्टर

1952 पहली बार बिहार विधानसभा का चुनाव हुआ था, तो कामाख्या नारायण सिंह ने छोटानागपुर में छह सीटों से चुनाव लड़ा था और इनमें से बगोदर, पेटरवार, गोमिया और बड़कागांव यानी चार सीटों से वे चुनाव में विजयी हुए थे.

Jharkhand Election 2024|रांची: छोटानागपुर के चुनाव में आरंभ के दिनों से ही रामगढ़ राज परिवार का प्रभाव रहा है. रामगढ़ के राजा कामाख्या नारायण सिंह का स्थान इनमें सबसे ऊपर आता है. 1952 में जब बिहार विधानसभा के लिए पहली बार चुनाव हुआ था, तो उसमें छोटानागपुर से दो क्षेत्रीय दलों को अच्छी सफलता मिली थी. एक जयपाल सिंह की अगुवाई में झारखंड पार्टी और दूसरी थी राजा कामाख्या नारायण सिंह की छोटानागपुर-संथालपरगना जनता पार्टी.

रामगढ़ राजा कामाख्या नारायण सिंह बहुत लोकप्रिय थे. उनकी लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 1952 जब पहली बार बिहार विधानसभा का चुनाव हुआ था, तो कामाख्या नारायण सिंह ने छोटानागपुर में छह सीटों से चुनाव लड़ा था और इनमें से बगोदर, पेटरवार, गोमिया और बड़कागांव यानी चार सीटों से वे चुनाव में विजयी हुए थे. गिरिडीह और चतरा से वे चुनाव में हार गये थे. देश में एक ही चुनाव में चार-चार सीटों से चुनाव जीतने का कोई दूसरा उदाहरण नहीं मिलता. चुनाव के बाद उन्होंने बड़कागांव सीट को अपने पास रख कर बाकी सीट को छोड़ दिया था. चुनाव के ठीक पहले ही कामाख्या बाबू ने छोटानागपुर-संथालपरगना जनता पार्टी के नाम से नयी पार्टी बनायी थी और 38 प्रत्याशी उतारे थे. इनमें से 11 जीते थे. इन 11 सीटों में अकेले चार सीट पर वे खुद जीते थे. बाकी सात में एक चैनपुर की सीट थी, जो आरक्षित सीट होते हुए भी राजा की पार्टी के खाते में गयी थी. वहां से देवचरण माझी जीते थे.

माहौल बनाने में भी मिलती थी मदद

कमाख्या नारायण सिंह, फाइल फोटो

रामगढ़ राजा कामख्या नारायण सिंह और कांग्रेस के दिग्गज नेता कृष्ण बल्लभ सहाय के बीच राजनीतिक मतभेद थे. दोनों के बीच 1952 के चुनाव में भी दो सीटों यानी गिरिडीह और बड़कागांव में आमना-सामना हुआ था. गिरिडीह में कृष्ण बल्लभ सहाय जीते थे, जबकि बड़कागांव में कामाख्या बाबू. दोनों के बीच मुकाबला एक-एक सीट से बराबरी पर खत्म हुआ था. उन दिनों मतदाताओं की संख्या बहुत कम होती थी, इसलिए कई सीट ऐसी थी जहां दस-बारह हजार से कम वोट पाकर भी चुनाव में जीत मिल जाती थी.

राजा कामाख्या नारायण सिंह ने 8134 वोट लाकर बगोदर सीट, 12087 वोट लाकर पेटरवार सीट, 9115 वोट लाकर गोमिया सीट और 12302 वोट लाकर बड़कागांव सीट पर जीत हासिल की थी. राजा बहुत ही रोचक तरीके से चुनाव लड़ते थे और चुनाव में हेलिकॉप्टर का उपयोग करनेवाले वे देश के पहले प्रत्याशी थे. जवाहरलाल नेहरू ने चुनाव प्रचार के दौरान उनके खिलाफ टिप्पणी भी की थी और उनकी पार्टी को हेलिकॉप्टर पार्टी कहा था. हेलिकॉप्टर का उपयोग करने के कारण जहां भी राजा की सभा होती थी, बड़ी संख्या में लोग हेलिकॉप्टर देखने के लिए उमड़ पड़ते थे. इससे माहौल बनाने में भी मदद मिलती थी.

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नयी पार्टी बनाकर लड़ा था पहला चुना

ऐसी बात नहीं है कि राजा आरंभ से ही कांग्रेस के विरोध में थे. आजादी की लड़ाई के दौरान राजा ने कांग्रेस को काफी मदद की थी. 1940 में जब रामगढ़ में कांग्रेस का अधिवेशन हुआ था तो बाबू रामनारायण सिंह और राजेंद्र प्रसाद के कहने पर अधिवेशन के आयोजन में उन्होंने बहुत मदद की थी. 1946 के बाद जवाहरलाल नेहरू से राजा के राजनीतिक मतभेद बढ़ गये थे और उन्होंने कांग्रेस छोड़ दी थी. उसके बाद उन्होंने नयी पार्टी बनाकर पहला चुनाव लड़ा था.

किसानों का माफ कर दिया था टैक्स

चार-चार सीट से चुनाव जीतना मामूली बात नहीं थी. राज परिवार को लोगों का बड़ा समर्थन मिलता था. यही कारण था कि छोटानागपुर के चुनाव में रामगढ़ राजपरिवार से कई लोग सांसद-विधायक बने. इनमें राजमाता शशांक मंजरी, बसंत नारायण सिंह, ललिता राज लक्ष्मी, विजया राजे आदि प्रमुख हैं. 1946 के आसपास जब किसान परेशानी में थे तो राजा ने तमाम किसानों का टैक्स माफ कर दिया था. इसका बहुत ही अच्छा असर पड़ा था. विनोबा भावे ने जब देश में भूदान आंदोलन चलाया था, तो पूरे देश में सबसे ज्यादा भूमि दान करनेवाले राजा कामाख्या नारायण सिंह ही थे. उन्होंने ढाई लाख एकड़ जमीन दान की थी जो अपने आप में रिकॉर्ड है.

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