रांची से विपिन सिंह की रिपोर्ट
Ranchi News: झारखंड में आपातकालीन चिकित्सा सेवाओं की रीढ़ मानी जाने वाली डॉयल 108 एंबुलेंस सेवा गंभीर संकट से गुजर रही है. राज्यभर में संचालित बड़ी संख्या में एंबुलेंस जर्जर हो चुकी हैं और कई वाहन सड़कों पर चलने योग्य भी नहीं रह गये हैं. जिन वाहनों के भरोसे गंभीर मरीजों को अस्पताल पहुंचाने की जिम्मेदारी है, वही अब मरीजों की सुरक्षा के लिए चिंता का कारण बन रहे हैं.
1.5 लाख किमी से अधिक चल चुकी हैं अधिकतर एंबुलेंस
स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों के अनुसार, बेड़े में शामिल अधिकांश एंबुलेंस आठ वर्ष से अधिक पुरानी हो चुकी हैं और 1.5 लाख किलोमीटर से ज्यादा दूरी तय कर चुकी हैं. कई वाहन तो 2.5 लाख किलोमीटर से अधिक चल चुके हैं. लगातार उपयोग और समय पर प्रतिस्थापन नहीं होने से इनकी स्थिति बेहद खराब हो गयी है.
अनफिट वाहनों की पहचान का निर्देश
स्थिति की गंभीरता को देखते हुए स्वास्थ्य विभाग ने सक्रियता बढ़ा दी है. अपर मुख्य सचिव अजय कुमार सिंह ने खराब और सेवा देने में असमर्थ एंबुलेंसों को कंडम घोषित कर उनकी नीलामी की प्रक्रिया शुरू करने का निर्देश दिया है. इसके लिए निदेशक प्रमुख स्वास्थ्य सेवाएं को पत्र लिखकर जिलों में संचालित अनफिट वाहनों की पहचान करने को कहा गया है. प्रत्येक जिले में सिविल सर्जन की अध्यक्षता में एक समिति गठित की जायेगी. यह समिति एंबुलेंसों की स्थिति की समीक्षा करेगी और उपयोग के योग्य नहीं रहने वाले वाहनों की रिपोर्ट तैयार कर निदेशक प्रमुख स्वास्थ्य सेवाएं को सौंपेगी.
जीवन रक्षक उपकरण भी हो चुके हैं खराब
समस्या केवल वाहनों तक सीमित नहीं है. एंबुलेंस में लगे कई जीवन रक्षक उपकरण भी जर्जर हो चुके हैं. डिफाइब्रिलेटर, ऑक्सीजन सिलेंडर, महत्वपूर्ण संकेत मॉनिटर और स्ट्रेचर जैसे उपकरणों की कार्यक्षमता भी प्रभावित हुई है. नियमित रखरखाव और कैलिब्रेशन के अभाव में कई उपकरण अपेक्षित रूप से काम नहीं कर पा रहे हैं. ऐसी स्थिति में गंभीर मरीजों को समय पर और प्रभावी चिकित्सा सहायता उपलब्ध कराना चुनौतीपूर्ण हो गया है. विशेषज्ञों का मानना है कि आपातकालीन सेवाओं में उपकरणों की गुणवत्ता उतनी ही महत्वपूर्ण होती है, जितनी एंबुलेंस की उपलब्धता.
2017 में शुरू हुई थी 108 सेवा
झारखंड में डॉयल 108 इमरजेंसी एंबुलेंस सेवा की शुरुआत 15 नवंबर 2017 को की गयी थी. उस समय स्वास्थ्य मंत्री रामचंद्र चंद्रवंशी के कार्यकाल में इस योजना को शुरू किया गया था. इसका उद्देश्य दुर्घटना और अन्य आपातकालीन परिस्थितियों में लोगों को त्वरित चिकित्सा सहायता उपलब्ध कराना था. शुरुआती वर्षों में इस सेवा ने हजारों मरीजों को समय पर अस्पताल पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी, लेकिन समय के साथ वाहनों के पुराने होने और संख्या में वृद्धि नहीं होने से व्यवस्था पर दबाव बढ़ता चला गया.
207 एंबुलेंस हो चुकी हैं कंडम
स्वास्थ्य विभाग को दी गयी जानकारी के अनुसार 108 सेवा के तहत संचालित कुल 440 एंबुलेंसों में से 207 एंबुलेंस ऐसी हैं, जिन्हें कंडम घोषित करने की आवश्यकता है. इन वाहनों की आयु आठ वर्ष से अधिक हो चुकी है और ये निर्धारित सीमा से कहीं अधिक दूरी तय कर चुकी हैं. साल 2004-05 में सदर अस्पतालों और निचले स्तर के स्वास्थ्य केंद्रों के लिए खरीदी गयी कई टाटा सूमो एंबुलेंस तथा अन्य चिकित्सा वाहन अब मरम्मत के लायक भी नहीं बचे हैं. इनके रखरखाव पर लगातार खर्च होने के बावजूद अपेक्षित परिणाम नहीं मिल पा रहे हैं.
237 नई एंबुलेंस की खरीद अंतिम चरण में
राज्य सरकार पुराने और अनफिट वाहनों को बदलने की तैयारी में जुटी हुई है. पहले 30 और अब अतिरिक्त 207 एंबुलेंसों की खरीद प्रक्रिया चल रही है. इस तरह कुल 237 नई एंबुलेंस बेड़े में शामिल की जानी हैं. स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों के अनुसार खरीद प्रक्रिया अंतिम चरण में है और इसी महीने के अंत तक चयनित कंपनी को मंजूरी दी जा सकती है. नई एंबुलेंस पहले की तुलना में अधिक आधुनिक और अत्याधुनिक चिकित्सा उपकरणों से लैस होंगी.
इसे भी पढ़ें: झारखंड के लाखों सरकारी कर्मचारियों को हेमंत सरकार तोहफा, 60% हो गया DA
मरीजों को मिलेगी बेहतर और सुरक्षित सेवा
खराब और कंडम एंबुलेंसों को सेवा से बाहर करने का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि मरीजों को केवल सुरक्षित और प्रभावी एंबुलेंस सेवाएं ही मिलें. आपातकालीन परिस्थितियों में कुछ मिनटों की देरी भी किसी मरीज के लिए बेहद महत्वपूर्ण साबित हो सकती है. ऐसे में एंबुलेंस व्यवस्था को मजबूत करना स्वास्थ्य विभाग की प्रमुख प्राथमिकताओं में शामिल हो गया है.
इसे भी पढ़ें: रांची में 10 जून से शुरू होगा झारखंड प्रीमियर लीग, स्टेडियम में एंट्री फ्री
