Sudivya Kumar Sonu Untold Story: झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) के दिवंगत नेता और झारखंड सरकार के मंत्री सुदिव्य कुमार सोनू को अक्सर एक जुझारू आंदोलनकारी और रणनीतिकार के रूप में याद किया जाता है. लेकिन उनकी राजनीतिक यात्रा का सबसे दिलचस्प अध्याय वह है, जब दिशोम गुरु पद्म भूषण शिबू सोरेन ने उनके पिता से कहा था, "आपका बेटा आपसे मांग कर ले जा रहा हूं, कुछ बनाकर लौटाऊंगा." यही भरोसा आगे चलकर सुदिव्य सोनू को सड़क से सदन तक पहुंचाने वाली सबसे बड़ी राजनीतिक पाठशाला बन गया. प्रभात खबर के ब्यूरो चीफ आनंद मोहन सुदिव्य सोनू से जुड़ी अनकही रोचक कहानी बता रहे हैं. आप इसे वीडियो में भी देख-सुन सकते हैं.
जब पिता चाहते थे नौकरी, गुरुजी चाहते थे आंदोलनकारी
आनंद मोहन बताते हैं, '1989 का दौर अलग झारखंड राज्य आंदोलन का उग्र समय था. सुदिव्य सोनू पढ़ाई में अच्छे थे और उनके पिता शंभूनाथ विश्वकर्मा चाहते थे कि बेटा किसी अच्छी नौकरी में जाए. परिवार आर्थिक रूप से सुदृढ़ था, इसलिए राजनीति को सुरक्षित विकल्प नहीं माना जाता था. उस समय आंदोलन में केस, गिरफ्तारी और संघर्ष आम बात थी. ऐसे माहौल में शिबू सोरेन खुद उनके घर पहुंचे और पिता से कहा कि बेटे को आंदोलन के लिए समर्पित कर दीजिए. गुरुजी ने यह भी समझाया कि पढ़े-लिखे युवाओं के बिना झारखंड आंदोलन आगे नहीं बढ़ सकता. यही मुलाकात सुदिव्य के जीवन का निर्णायक मोड़ साबित हुई.'
गुरुजी की गाड़ी में बैठने का इंतजार करते थे सुदिव्य
उन्होंने कहा, 'आंदोलन के शुरुआती दिनों में सुदिव्य सोनू की सबसे बड़ी इच्छा होती थी कि गुरुजी उन्हें अपनी गाड़ी में बैठा लें. गिरिडीह और बोकारो के दौरों में वह अक्सर शिबू सोरेन की गाड़ी के आसपास ही रहते थे. जैसे ही गुरुजी कहते, "बैठ जाओ", वह सफर उनके लिए सीखने का अवसर बन जाता. बोकारो से रांची की यात्रा में गुरुजी रास्ते में ढाबे पर रुकते और फिर आंदोलन के पुराने किस्से सुनाते. सुदिव्य उन कहानियों से केवल घटनाएं नहीं सुनते थे, बल्कि नेतृत्व, संगठन और जनता से संवाद का तरीका सीखते थे. बाद में उन्होंने खुद स्वीकार किया था कि उन्हीं यात्राओं ने उनकी राजनीतिक सोच गढ़ी.'
आंदोलन की कहानियों ने बनाया रणनीतिकार
आनंद मोहन बताते हैं, 'सुदिव्य सोनू के पास शिबू सोरेन से सुने गए ऐसे कई संस्मरण थे, जो सार्वजनिक रूप से शायद ही कभी सामने आए. उन्होंने बताया था कि गुरुजी आंदोलन को किसी जाति या बाहरी-भीतरी की संकीर्ण सीमा में नहीं देखते थे. एक हरियाणा के सरदार ट्रक चालक की कहानी इसका उदाहरण थी, जो महाजनों के शोषण से परेशान होकर गुरुजी के साथ जुड़ गया और बाद में आंदोलन में अपनी जान गंवा बैठा. सुदिव्य ने उस परिवार को खोजने की भी कोशिश की, लेकिन सफलता नहीं मिली. यह प्रसंग उनके भीतर इतिहास को सहेजने की संवेदनशीलता भी दिखाता है.'
दो पीढ़ियों के बीच मजबूत कड़ी बने सुदिव्य
उन्होंने बताया, 'झामुमो में कई नेताओं ने समय-समय पर दल बदले, लेकिन सुदिव्य सोनू शुरू से अंत तक पार्टी के साथ रहे. वह पहले शिबू सोरेन की पीढ़ी के भरोसेमंद कार्यकर्ता बने और बाद में हेमंत सोरेन की टीम के सबसे मजबूत नेताओं में शामिल हुए. पार्टी के भीतर उन्हें संकट प्रबंधन, संगठन निर्माण और विधानसभा में प्रभावी हस्तक्षेप के लिए जाना जाता था. वरिष्ठ पत्रकारों के अनुसार, वह उन चुनिंदा नेताओं में थे, जो सड़क पर आंदोलन और सदन में बहस, दोनों में समान दक्षता रखते थे.'
विधानसभा में बने झामुमो का धारदार चेहरा
आनंद मोहन ने कहा, 'दो बार विधायक रहने के बावजूद सुदिव्य सोनू का प्रभाव केवल अपने निर्वाचन क्षेत्र तक सीमित नहीं रहा. विधानसभा में भाषा विवाद, भर्ती परीक्षाओं और सरकार से जुड़े अहम मुद्दों पर वह पार्टी का मजबूत पक्ष रखते थे. राजनीतिक मर्यादा के भीतर रहते हुए जवाब देने की उनकी शैली अलग पहचान बन चुकी थी. उन्हें फ्लोर मैनेजमेंट सीखने वाला और पार्टी का भरोसेमंद चेहरा माना जाता था. यही कारण था कि झारखंड सरकार में उन्हें चार महत्वपूर्ण विभागों की जिम्मेदारी भी मिली.'
कल्पना सोरेन के चुनाव में निभाई अहम भूमिका
उन्होंने कहा, 'हेमंत सोरेन के जेल जाने के बाद झामुमो के सामने सबसे बड़ी चुनौती संगठन को संभालने की थी. इसी दौर में सुदिव्य सोनू ने कल्पना सोरेन के राजनीतिक अभियान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. गिरिडीह क्षेत्र की सामाजिक संरचना, जातीय समीकरण और गठबंधन की राजनीति को समझते हुए उन्होंने चुनावी रणनीति तैयार करने में योगदान दिया. सहयोगियों का कहना है कि जीत का श्रेय जितना नेतृत्व को मिला, उतना ही सुदिव्य की संगठन क्षमता को भी मिला. यदि परिणाम उलटा होता, तो राजनीतिक जिम्मेदारी भी उन्हीं पर आती.'
विकास का वही मॉडल, जो गुरुजी से सीखा
उन्होंने कहा, 'बतौर मंत्री सुदिव्य सोनू अक्सर कहते थे कि झारखंड भावनाओं से बना राज्य है और यहां विकास का मॉडल जल, जंगल और जमीन की पहचान को बचाकर ही आगे बढ़ सकता है. वह मानते थे कि गांवों में शिक्षा, जागरूकता और छोटे बदलाव बड़े परिवर्तन की नींव बनते हैं. यह सोच सीधे उस राजनीतिक पाठशाला से निकली थी, जहां उन्होंने शिबू सोरेन के साथ वर्षों तक काम किया.'
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गुरुजी की विरासत का सबसे भरोसेमंद शिष्य
आनंद मोहन ने कहा, 'सुदिव्य सोनू की अचानक मौत को झामुमो के लिए केवल एक मंत्री का निधन नहीं, बल्कि दूसरी पंक्ति के सबसे भरोसेमंद नेतृत्व का नुकसान माना गया. वरिष्ठ नेताओं का मानना था कि वह उन विरले नेताओं में थे, जिन्हें गुरुजी ने आंदोलन में तराशा और हेमंत सोरेन ने संगठन की नई पीढ़ी में सबसे मजबूत स्तंभ के रूप में विकसित किया. उनके निधन के बाद पार्टी के सामने वैसा ही संवेदनशील, रणनीतिक और जमीन से जुड़ा नेता तैयार करने की चुनौती खड़ी हो गई है.'
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