गुवा गोलीकांड: अस्पताल से निकाल आठ आदिवासियों को भून दिया था पुलिस ने

आज इस गोलीकांड के 43 साल पूरे हो गये. गुवा गोलीकांड के बाद झारखंड आंदोलन ने जो गति पकड़ी, उसने अलग राज्य का रास्ता आसान कर दिया. घटना के दिन प्रदर्शन के दौरान पुलिस ने बहादुर उरांव और भुवनेश्वर महतो (दोनों चक्रधरपुर निवासी) को पकड़ लिया था.

आठ सितंबर, 1980 को सिंहभूम के गुवा में बिहार मिलिट्री पुलिस (बीएमपी) के जवानों ने इलाज करा रहे घायल आठ आदिवासियों को अस्पताल से बाहर निकाल कर गोलियों से भून दिया था. दुनिया के इतिहास में अस्पताल में इलाज करा रहे घायलों को निकाल कर पुलिस द्वारा गोली मार देने की शायद यह पहली घटना थी. घटना के कुछ घंटे पहले गुवा बाजार में झारखंड आंदोलनकारियों और पुलिस के बीच संघर्ष हुआ था, जिसमें चार पुलिसकर्मी और तीन आदिवासी मारे गये थे.

चार पुलिसकर्मियों के मारे जाने से पुलिस गुस्से में थी और अनियंत्रित होकर ऐसी घटना को अंजाम दिया था. ये आंदोलनकारी अलग झारखंड राज्य, स्थानीय बेरोजगारों को माइंस मेंं नौकरी देने, जंगल आंदोलन के दौरान गिरफ्तार हुए आंदोलनकारियों की रिहाई और आयरन माइंस से निकले लाल पानी से नष्ट हुए खेत के लिए मुआवजा की मांग कर रहे थे. गुवा गोलीकांड की पूरे देश में चर्चा हुई थी, संसद-विधानसभा में हंगामा हुआ था.

आज इस गोलीकांड के 43 साल पूरे हो गये. गुवा गोलीकांड के बाद झारखंड आंदोलन ने जो गति पकड़ी, उसने अलग राज्य का रास्ता आसान कर दिया. घटना के दिन प्रदर्शन के दौरान पुलिस ने बहादुर उरांव और भुवनेश्वर महतो (दोनों चक्रधरपुर निवासी) को पकड़ लिया था. बहादुर बाबू को आंदाेलनकारियों ने पुलिस के चंगुल से छुड़ा लिया था, जबकि भुवनेश्वर महतो पुलिस इनकाउंटर का शिकार होते-होते बचे थे. तब रामेश्वर उरांव (अभी झारखंड के वित्त मंत्री हैं), सिंहभूम के पुलिस अधीक्षक थे, जिन्होंने भुवनेश्वर महतो को किसी तरह उत्तेजित पुलिसकर्मियों से बचा लिया था. भुवनेश्वर महतो अभी झारखंड आंदोलनकारी चिह्नितीकरण आयोग के सदस्य हैं, जबकि 84 साल के बहादुर बाबू सामाजिक मुद्दों को लेकर आज भी सक्रिय हैं.

गुवा में भले ही पुलिस ने आठ सितंबर, 1980 को गोली चलायी थी, लेकिन इसके दो साल पहले से ही पूरे सिंहभूम (तब विभाजन नहीं हुआ था) में पुलिस झारखंड आंदोलन को कुचलना चाहती थी और कई बार फायरिंग कर चुकी थी. अप्रैल 1978 में जायदा में तीन आंदोलनकारी मारे गये थे, नवंबर 1978 में ईचाहातू में एक और सेरेंगदा में तीन आंदोलनकारी मारे गये थे. सेरेंगदा में तो निशाना शैलेंद्र महतो ही थे, जो बच गये थे. दरअसल तत्कालीन बिहार सरकार सारंडा में साल की जगह सागवान का पेड़ लगाना चाहती थी, जिसका लोग विरोध कर रहे थे.

एनई होरो (झारखंड पार्टी) ने सरकारी निर्णय के बाद जंगल आंदोलन आरंभ किया था, जो दूर-दराज तक फैल चुका था. जंगल आंदोलन में देवेंद्र माझी, शैलेंद्र महतो, मछुआ गागराई, लाल सिंह मुंडा, सुला पूर्ति, बहादुर उरांव, भुवनेश्वर महतो, सुखदेव हेंब्रम आदि सक्रिय थे. आंदोलनकारियों ने जंगल काटो अभियान चलाया था. वन विभाग के अफसरों को भी निशाना बनाया था. इसके बाद बड़ी संख्या में गिरफ्तारी हुई थी. गुवा की घटना के पहले सारंडा में कई जगहों पर पुलिस फायरिंग की घटना घट चुकी थी. पुलिस किसी भी हालत में जंगल आंदोलन को दबाना चाहती थी. इसी के खिलाफ गुवा में प्रदर्शन की तैयारी की गयी थी.

आठ सितंबर को गुवा में प्रदर्शन होना था. प्रदर्शनकारियों को रोकने के लिए स्टेशन, सड़कों पर पुलिस थी. सभी मुख्य रास्तों पर पुलिस तैनात थी. इसके बावजूद जंगलों से होते हुए तीन हजार से ज्यादा आंदोलनकारी गुवा पहुंच गये थे. देवेंद्र माझी, शैलेंद्र महतो आदि नहीं पहुंच सके थे. गुवा एयरपोर्ट पर ज्ञापन देने के बाद जैसे ही आंदोलनकारी गुवा बाजार की ओर जाने लगे, पुलिस ने विरोध किया. आंदोलनकारी आगे बढ़ते गये और गुवा बाजार पहुंच गये. वहां एक सभा हो रही थी.

इसी दौरान तीखा भाषण भी हुआ. फिर पुलिसकर्मियों और आंदोलनकारियों के बीच धक्का-मुक्की होने लगी. पुलिस ने भुवनेश्वर महतो को गिरफ्तार कर जीप में बैठा लिया. लेकिन जैसे ही बहादुर उरांव को पुलिस ने पकड़ा, आंदोलनकारियों ने उन्हें पुलिस से छीन लिया. इसी दौरान संघर्ष होने लगा. आंदोलनकारियों की ओर से तीर चले और पुलिस ने फायरिंग कर दी. इसमें चार पुलिसकर्मी और तीन आंदोलनकारी मारे गये. बड़ी संख्या में आदिवासी घायल हुए थे, जो इलाज के लिए पास के अस्पताल में गये थे.

चार पुलिसकर्मियों के मारे जाने की खबर मिलते ही भारी संख्या में जामदा से बीएमपी के जवान गुवा पहुंच गये. वे सीधे अस्पताल पहुंचे और वहां इलाज करा रहे आदिवासियों को तीर-धनुष बाहर रखने को कहा. जैसे ही आंदोलनकारियों ने तीर-धनुष एक जगह रख दिया, वैसे ही सभी को बीएमपी के जवानों ने अपने कब्जे में ले लिया. अस्पताल कैंपस में ही लाइन से खड़ा किया और अस्पताल कैंपस में ही सभी को गोली मार दी. आठ आदिवासी उसी कैंपस में मारे गये. इसके बाद पूरे क्षेत्र में हंगामा हो गया.

इस बीच गिरफ्तार भुवनेश्वर महतो पुलिस के कब्जे में थे. बीएमपी के जवान उनके इनकाउंटर के पक्ष में थे, लेकिन आरक्षी अधीक्षक रामेश्वर उरांव ने यह कह कर उन्हें बचा दिया कि अगर यह मारा गया तो सभी पुलिसकर्मियों को फांसी हो जायेगी. दूसरी ओर बहादुर बाबू पुलिस के कब्जे से बचने के बाद पहाड़ी पार कर जोजोहातू में जा छिपे और देर रात जंगल के रास्ते राउरकेला पहुंच गये. लालू सोरेन नामक युवक ने उनकी सहायता की. राउरकेला से बहादुर बाबू जमशेदपुर होते हुए धनबाद भाग गये.

इस गोलीकांड के कारण ही बहादुर बाबू ने अपने जुड़वां बच्चे को खो दिया. पुलिस ने बहादुर बाबू की गिरफ्तारी के लिए वारंट लिया था. पुलिस ने चक्रधरपुर में बहादुर बाबू के घर छापा मारा. उनकी पत्नी को दो बच्चों समेत घर से बाहर निकाल दिया था. रात भर दो जुड़वां बच्चों के साथ बहादुर बाबू की पत्नी खुले आकाश में ठंड से कांपती रही. सुबह होते-होते ठंड के कारण दोनों बच्चों की मौत हो गयी थी. पुलिस जुल्म का ऐसा उदाहरण विरले मिलता है.

गुवा गोलीकांड के बाद पुलिसकर्मियों की राइफल भी लूट ली गयी थी. उस राइफल की बरामदगी के लिए आसपास के दर्जनों गांवों में पुलिस ने आतंक मचाया था और सैकड़ों लोगों को पकड़ कर बुरी तरह पीटा था. भयभीत ग्रामीणों ने राइफल को गांव के बाहर फेंक दिया था. उसके बाद भी पुलिस ने कई महीनों तक हाट-गाड़ी से खोज-खोज कर आंदोलन से जुड़े लोगों को पकड़ा था. आतंक इतना था कि लोग घर छोड़ कर जंगल में छिप गये थे. सरकार ने तीर-धनुष पर प्रतिबंध लगा दिया था. संसद में विरोध होने पर प्रतिबंध वापस लिया गया था.

हेमंत सीएम बने, तो शहीदों के परिजनों को दी नौकरी

गुवा गोलीकांड में शहीद हुए लोगों में ईश्वर सरदार (कैरोम), रामो लागुरी (चुरगी), चांदो लागुरी (चुरगी), रेंगो सुरीन ( कुंबिया), बागी देवगम (जोजो गुट्टु), जीतू सुरीन (जाेजाेगुट्टू), चैतन्य चांपिया (बाइहातु), चूड़ी हांसदा ( हतनाबुरु), जरा पूर्ति ( बुंडू), गोंडा होनहागा (काेलायबुरु), चांबे राधे (बड़ा पोंगम) शामिल थे. इन शहीदों के परिजनों को रोजगार दिलाने की मांग बहुत पहले से हो रही थी. जब पहली बार हेमंत सोरेन सीएम बने थे, तो उन्होंने इसके लिए पहल की थी.

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