झारखंड में क्या खतरे की घंटी बजा रहा रूबेला वायरस? जानें क्या कहते हैं डॉ अनुज मयूर शेखर

रूबेला (जर्मन खसरा) का एक मामला सामने आने के बाद स्वास्थ्य विभाग अलर्ट है. जानें एक्सपर्ट डॉ. अनुज मयूरशेखर से रूबेला के खतरे, लक्षण और बचाव के उपाय.


Rubella virus: रूबेला वायरस यानी जर्मन खसरा का नाम सुनते ही प्रशासन के हाथ-पांव फूलने लगते हैं. छोटे बच्चों के अभिभावकों की पेशानी पर चिंता की लकीरें साफ दिखाई देने लगती हैं. लोगों में हड़कंप मच जाता है. झारखंड के सिमडेगा जिले के ठेठई टांगर प्रखंड के मुंडाटोली में रूबेला वायरस (जर्मन खसरा) का इस सीजन का पहला मामला सामने आने के बाद स्वास्थ्य विभाग अलर्ट हो गया है. 10 वर्षीय बच्ची के संक्रमित मिलने के बाद रिम्स और राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (NHM) ने राज्यस्तरीय वॉर रूम तक तैयार कर लिया है, ताकि संक्रमण फैलने की स्थिति में त्वरित इलाज और निगरानी की जा सके. रूबेला को लेकर लोगों में चिंता बढ़ गई है, खासकर गर्भवती महिलाओं और छोटे बच्चों की सुरक्षा को लेकर. इस बीच प्रभात खबर डिजिटल ने पब्लिक हेल्थ एक्सपर्ट डॉ. अनुज मयूर शेखर से बातचीत कर जाना कि रूबेला कितना खतरनाक है, इससे किन लोगों को ज्यादा खतरा है और संक्रमण से बचाव के लिए क्या सावधानियां अपनानी चाहिए. आइए जानते हैं कि रूबेला वायरस के संक्रमण से बचाव पर उन्होंने क्या कहा?

क्या है रूबेला

पब्लिक हेल्थ एक्सपर्ट डॉ अनुज मयूर शेखर ने कहा, 'रूबेला एक RNA वायरस है, जिसे “German measles”के नाम से भी जाना जाता है. इसे आम संक्रमण समझकर नजरअंदाज करना भारी पड़ सकता है. विशेषकर, गर्भवती महिलाओं के संक्रमित होने पर गर्भ में पल रहे बच्चे पर इसका गंभीर असर पड़ सकता है. भारत सरकार ने 2026 तक रूबेला और खसरे को पूरी तरह खत्म करने का लक्ष्य रखा है. इसी को ध्यान में रखते हुए प्रभावित इलाकों में आस-पास के लोगों पर कड़ी नजर रखी जा रही है और जिन बच्चों को टीका नहीं लग पाया था, उनके लिए खास मिजल्स-रूबेला (MR) टीकाकरण अभियान तुरंत शुरू कर दिया गया है.'

रूबेला संक्रमण के क्या हैं लक्षण

डॉ अनुज मयूर शेखर ने कहा कि रूबेला वायरस से संक्रमित व्यक्ति के खांसने, छींकने या सांस के साथ निकलने वाली बूंदों से यह वायरस दूसरे व्यक्ति तक पहुंच सकता है. इसकी चपेट में आने के बाद संक्रमित लोगों में हल्का बुखार, सिरदर्द, आंखों में लालिमा और शरीर पर गुलाबी रंग के दाने जैसे लक्षण दिखाई दे सकते हैं.

बचाव के लिए जागरूकता जरूरी

कंसल्टेंट मैक्सिलोफेशियल सर्जन और पब्लिक हेल्थ एक्सपर्ट डॉ अनुज मयूर शेखर ने रूबेला से बचाव के लिए जागरूकता को जरूरी बताया. उनके अनुसार, रूबेला को केवल सामान्य दाने या हल्के बुखार वाली बीमारी समझकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. खासकर, गर्भवती महिलाओं के मामले में इससे जुड़ी सावधानी बेहद जरूरी है.

गर्भावस्था में क्यों ज्यादा खतरा

उन्होंने कहा कि रूबेला वायरस का संक्रमण गर्भावस्था के दौरान गंभीर चिंता का विषय बन सकता है. संक्रमण होने पर गर्भस्थ शिशु में जन्मजात रूबेला सिंड्रोम का खतरा बना रहता है. इससे बच्चे में सुनने की क्षमता प्रभावित होने समेत कई जन्मजात समस्याएं हो सकती हैं. इसलिए गर्भवती महिलाओं को संक्रमण से बचाव और डॉक्टर की सलाह को गंभीरता से लेना चाहिए.

बच्चों के टीकाकरण पर जोर

स्वास्थ्य विभाग की ओर से प्रभावित क्षेत्र में एक्टिव केस की खोज और निगरानी की जा रही है. मीजल्स-रूबेला टीकाकरण की माइक्रो-लेवल मॉनिटरिंग भी की जा रही है. रिपोर्ट के अनुसार, 9 माह से पांच वर्ष तक के बच्चों को चिन्हित कर मीजल्स-रूबेला टीकाकरण पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है.

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लक्षण दिखें तो डॉक्टर से जांच कराएं

डॉ अनुज मयूर शेखर ने कहा कि बुखार के साथ शरीर पर दाने, आंखों में लालिमा या दूसरे संबंधित लक्षण दिखाई देने पर खुद से दवा लेने के बजाय डॉक्टरों से सलाह लेना चाहिए. संक्रमित व्यक्ति के संपर्क में आने वाले लोगों पर भी नजर रखना जरूरी है. समय पर पहचान और टीकाकरण के जरिए संक्रमण के प्रसार को रोकने में मदद मिल सकती है.

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रिपोर्ट: तन्वी झा

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लेखक के बारे में

By कुमार विश्वत सेन

कुमार विश्वत सेन प्रभात खबर डिजिटल में डेप्यूटी चीफ कंटेंट राइटर हैं. इनके पास हिंदी पत्रकारिता का 25 साल से अधिक का अनुभव है. इन्होंने 21वीं सदी की शुरुआत से ही हिंदी पत्रकारिता में कदम रखा. दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदी पत्रकारिता का कोर्स करने के बाद दिल्ली के दैनिक हिंदुस्तान से रिपोर्टिंग की शुरुआत की. इसके बाद वे दिल्ली में लगातार 12 सालों तक रिपोर्टिंग की. इस दौरान उन्होंने दिल्ली से प्रकाशित दैनिक हिंदुस्तान दैनिक जागरण, देशबंधु जैसे प्रतिष्ठित अखबारों के साथ कई साप्ताहिक अखबारों के लिए भी रिपोर्टिंग की. 2013 में वे प्रभात खबर आए. तब से वे प्रिंट मीडिया के साथ फिलहाल पिछले 10 सालों से प्रभात खबर डिजिटल में अपनी सेवाएं दे रहे हैं. इन्होंने अपने करियर के शुरुआती दिनों में ही राजस्थान में होने वाली हिंदी पत्रकारिता के 300 साल के इतिहास पर एक पुस्तक 'नित नए आयाम की खोज: राजस्थानी पत्रकारिता' की रचना की. इनकी कई कहानियां देश के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं.

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