पंकज त्रिपाठी, रांची
Naxalite Surrender in Jharkhand: भाकपा (माओवादी) के 16 नक्सलियों (11 पुरुष और 5 महिलाओं) ने मंगलवार को पुलिस मुख्यालय में पुलिस के नवजीवन-2 अभियान के तहत आत्मसमर्पण कर दिया. इसमें संतोष उर्फ बासुदेव दा उर्फ गांधी उर्फ दिलीप उर्फ संजय महतो उर्फ बासुकू उर्फ श्याम भी शामिल है, जिसका एक समय गिरिडीह-चाईबासा में आतंक था. इस पर सरकार ने 15 लाख रुपये का इनाम रखा था. ये अब लाचार और बिल्कुल दुबला-पतला है. इसकी याददाश्त भी ठीक नहीं रहती. कहता है-1985-88 में दस्ता में शामिल हुआ. अब शुगर बहुत हाई रहता है. बीमार हूं. जंगल के जीवन से परेशान हो गया था. कुछ दिन पहले काफी तबीयत बिगड़ गयी, तो दवा तक नहीं मिली. घरवाले पुलिस के संपर्क में थे, उन्होंने कहा- आत्मसमर्पण कर दो. इसके बाद बहुत सोचा और सरेंडर कर दिया.
सालमी मुंडा ने बताई आपबीती
बुंडू में आतंक का पर्याय रही सालमी मुंडा अपना नाम पारूल बताती है. कहती है- बहक गये थे, गलत किये, दस्ता में चले गये थे. वहां बहुत दिक्कत है. तरह-तरह के कष्ट हैं. वह गलत काम था. कई दिनों तक खाना और पानी भी नहीं मिलता. गांव वाले भी अब इज्जत नहीं देते. पुलिस ने संपर्क किया, तो सरेंडर कर दिये. ऐसी ही कहानी लगभग सभी नक्सलियों की है. नक्सलियों के समर्पण के मौके पर डीजीपी तदाशा मिश्रा, आइजी ऑपरेशन नरेंद्र सिंह, सीआरपीएफ आइजी साकेत सिंह और अनूप बिरथरे समेत अन्य अधिकारी मौजूद थे.
डीजीपी तदाशा मिश्र ने कहा कि यह बड़ी उपलब्धि है. राज्य में नक्सलवाद अब समाप्ति के कगार पर है. आत्मसमर्पण करनेवालों को नीति के तहत सभी सुविधाएं दी जायेंगी.
लैंड माइंस में एक नक्सली की उड़ी टांग, तो सरेंडर को हुए विवश
सारंडा में नक्सलियों के जमावड़े के बाद पुलिस ने उन्हें चारों तरफ से दोहरा सुरक्षा घेरा बनाकर घेर लिया. 24 पुलिस कैंप लगाये. ये छोटे-छोटे थे. खर्च भी कम था. कैंप में 24 घंटे जवान रहते थे. लिहाजा ग्रामीणों और नक्सलियों के बीच संपर्क टूट गया. उन्हें खाना और दवाइयों का टोटा हो गया. ड्रोन से निगरानी के कारण अब वे दस्ते में चलने के बजाय कम संख्या में चलने लगे. रोज उन्हें ठिकाना बदलना पड़ा. इसी बीच अलग-अलग मुठभेड़ में 17 नक्सली मारे गये. इनमें वे सभी शामिल थे, जिन्हें आइइडी लगे स्थान की जानकारी थी. इनकी मौत के बाद नक्सलियों के लिए भी मूवमेंट मुश्किल हो गया. मूवमेंट के दौरान एक महिला नक्सली ने आईईडी पर पैर रखे और उसकी टांग उड़ गयी. इसके बाद नक्सलियों ने सारंडा छोड़ दिया. दूसरी जगहों पर भागने लगे. इन तमाम कारणों से नक्सलियों का जीना अब दूभर हो गया था. इसका लाभ सुरक्षा बलों को मिला और अंतत: बड़ी संख्या में नक्सलियों ने सरेंडर किया.
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