रांची: देश जब अपनी आजादी का 79वां जश्न मना रहा है, तब झारखंड के गोड्डा, पाकुड़ और साहिबगंज के बीहड़ पहाड़ों पर बसे विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह (PVTG) सौरिया पहाड़िया की जिंदगी एक नई 'आजादी' की राह देख रही है. कागजों में भले ही इनके गावों तक सड़क, बिजली, राशन और मोबाइल नेटवर्क की घंटी पहुंच चुकी है, लेकिन इनकी बुनियादी लड़ाई सड़क-बिजली से आगे जाकर अपनी ऐतिहासिक पहचान, खान-पान और "जंगल बचाओ, जंगल से आजीविका दो" के अधिकार पर टिकी है.
पोषण और आजीविका की अनोखी लड़ाई
गोड्डा जिले के सुंदरपहाड़ी से शुरू हुआ पहाड़िया समुदाय का संघर्ष अब पाकुड़ के राजमहल पहाड़ों तक फैल चुका है. वर्षों से वन विभाग केवल इमारती या गैर-खाद्य पौधे लगा रहा था, जिससे जंगलों से मिलने वाले फल-फूल और वनोपज घटने लगे थे और बच्चों में कुपोषण बढ़ रहा था. अपनी पहचान और भोजन को बचाने के लिए संस्था 'अभिव्यक्ति फाउंडेशन' के सहयोग से ग्रामीणों ने आंदोलन छेड़ा. रांची जाकर वन विभाग के अपर मुख्य संरक्षक रवि रंजन को सुंदरपहाड़ी बुलाया गया और जंगल से जुटाए गए 400 से अधिक प्रकार के पारंपरिक खान-पान व बीजों को दिखाकर अपनी मांग रखी गई. इस ऐतिहासिक पहल के बाद वन विभाग सहमत हुआ और अब ग्रामीणों की पसंद के अनुसार नर्सरी तैयार कर कटहल, आम, महुआ, अमरूद और मौसमी साग-सब्जियों के पौधे लगाने का आदेश जारी कर दिया गया है.
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जंगल ही पहचान और सहारा
सुंदरपहाड़ी के मुनाडीह गांव की रेबेदा मालतो हाथ में छाता और मोबाइल लिए बारिश के मौसम में कुरवा (मक्का-दलहन) और जरा खेती की तैयारियां करते हुए बताती हैं कि समस्याओं के बावजूद पहाड़ ही उनकी पहचान और पुरखों की धरोहर है. सौरिया पहाड़िया समुदाय का इतिहास मेगस्थनीज की यात्रा वृत्तांत से लेकर मुगलकाल और ब्रिटिश दौर में पहाड़िया रेंजर तथा जमींदारी तक बेहद गौरवशाली रहा है. हालांकि, आज भी इस समुदाय के सामने सबसे बड़ा संकट स्थायी आजीविका, शिक्षा और पेयजल का है. सुंदरपहाड़ी और राजमहल के बसावट वाले इलाकों में केवल छठी कक्षा तक पढ़ाई की व्यवस्था होने से गांवों में शायद ही कोई मैट्रिक पास है. बड़गम पहाड़ के तीन टोलों में एक भी व्यक्ति सरकारी नौकरी में नहीं है, वहीं नकद पैसों के लिए वे आज भी घोड़ों पर आने वाले महाजनों पर निर्भर हैं. इसके अलावा 35 किलो राशन घर-घर न पहुंचकर पंचायतों में रख दिया जाता है और पेयजल के लिए दूर जाना पड़ता है.
वन विभाग और विशेषज्ञों की पहल
इस मुहिम पर वन विभाग और समाजसेवियों ने सकारात्मक रुख अपनाया है. संस्था 'अभिव्यक्ति फाउंडेशन' के सचिव कृष्णकांत का कहना है कि पहाड़िया समुदाय का जीवन जंगल से ही चलता है, इसलिए वन विभाग के साथ समन्वय बनाकर इन्हें जंगल में ही आजीविका देना संभव है. वहीं, झारखंड के अपर प्रधान मुख्य वन संरक्षक रवि रंजन और गोड्डा के डीएफओ बाग पवन शालीग्राम ने स्पष्ट किया है कि ग्रामीणों की मांग पर पसंदीदा पौधों की सूची तैयार कर सभी रेंज में पौधारोपण का आदेश दिया गया है. विभाग ग्रामीणों द्वारा इकट्ठा किए गए बीजों को प्रमोट करने और उनकी सहभागिता से ही पौधारोपण अभियान को आगे बढ़ाने के लिए पूरी तरह तैयार है.
