खुदा ने उसके लबों पर मिठास रख दी है, वो बोलता है, तो जैसे सितार बोलता है
रांची : रिम्स ऑडिटोरियम में रविवार की शाम कुछ खास थी. गुरुओं के सम्मान के बाद मौका था कविताओं और शेर, शायरी का. प्रभात खबर के आयोजन में देश-दुनिया के हिंदी और उर्दू शायरी में प्रसिद्ध नाम राहत इंदौरी, वसीम बरेलवी और डॉ कुमार विश्वास श्रोताओं से रूबरू थे. सबसे पहले मंच पर आये डॉ […]
रांची : रिम्स ऑडिटोरियम में रविवार की शाम कुछ खास थी. गुरुओं के सम्मान के बाद मौका था कविताओं और शेर, शायरी का. प्रभात खबर के आयोजन में देश-दुनिया के हिंदी और उर्दू शायरी में प्रसिद्ध नाम राहत इंदौरी, वसीम बरेलवी और डॉ कुमार विश्वास श्रोताओं से रूबरू थे. सबसे पहले मंच पर आये डॉ कुमार विश्वास. तालियों के बीच उन्होंने श्रोताओं का प्यार मांगा. कहा ऐसा न हो कि यह खबर छपी कल के अखबार में, नर्तकी रात भर नाची अंधे के दरबार में..मंच की बागडोर थामे अपने चुटीले अंदाज में उन्होंने सत्ता-सियासत पर बात की. उम्मीदों का चिराग जलाया. कहा : यह सियाह रात नहीं नाम लेती ढलने का, यही तो वक्त है सूरज तेरे निकलने का…
राहत इंदौरी ने मंच पर आते ही वहां मौजूद युवाओं के लिए शेर पढ़ा : राज जो कुछ हो, इशारों में बता देना…हाथ जब उससे मिलाना, ताे दबा भी देना…इस खत में कोई बात नहीं है…फिर भी एहतियातन इसे पढ़ लो, तो जला भी देना…नशा वैसे तो बुरी शह है…मगर राहत से शेर सुनना हो…तो थोड़ी पिला भी देना…तालियों के न थमते शोर के बीच राहत इंदौरी ने अपने गजलों, अपने शेरों से श्रोताओं को जैसे वश में कर लिया था. उन्होंने लोगों के प्यार और अपनी मजबूरी को शब्दों में पिरोया. मेरी सांसों में समाया भी बहुत लगता है, वही शख्स पराया भी बहुत लगता है…उससे मिलने की तमन्ना भी बहुत है, लेकिन आने-जाने में किराया भी बहुत है..मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों की ओर इशारा करती उनकी नज्म थी. फैसला जो कुछ भी हो, मंजूर होना चाहिए…जंग हो या इश्क, भरपूर होना चाहिए…कट चुकी है उम्र सारी जिनकी पत्थर तोड़ते, अब तो इन हाथों में कोहिनूर होना चाहिए…मेरी जमीर, मेरा एतबार बोलता है, मेरी जुबां से परवर दीगार बोलता है…कुछ और काम तो जैसे उसे आता ही नहीं, मगर वो झूठ बहुत शानदार बोलता है…तेरी जुबान कतरना बहुत जरूरी है, तेरी मर्ज है कि तू बार-बार बोलता है…राहत इंदौरी ने अपने अंदाज में मंच पर वसीम बरेलवी को बुलाया. कहा : खुदा ने उसके लबों पर मिठास रख दी है, वो बोलता है, तो जैसे सितार बोलता है…सिर्फ खंजर ही नहीं, आंखों में पानी चाहिए, ऐ खुदा दुश्मन भी मुझको खानदानी चाहिए…मैंने अपनी खुश्क आंखों से लहू छलका दिया, एक समंदर कह रहा था मुझको पानी चाहिए…
ढलती शाम के बीच मंच पर आये वसीम बरेलवी के शेर सीधे दिल में उतर रहे थे. वह मेरे चेहरे तक अपनी नफरतें लाया था, मैंने उसके हाथ चूमे और बेबस कर दिया…वो मेरी पीठ पर खंजर जरूर उतारेगा, मगर निगाह मिलेगी, तो कैसे मारेगा…वो समझता है कि रिश्तों की दुहाई देंगे, हम तो वो हैं जो तेरे चेहरे में दिखायी देंगे…हमको महसूस किया जाता है खुशबू की तरह…हम कोई शोर नहीं हैं, जो सुनाई देंगे…व्यवस्था पर चोट करते उनके बोल थे. इस जमाने का बड़ा कैसे बनूं, इतना छोटापन मेरे बस का नहीं…मैं बोलता गया, वो सुनता रहा खामोश, ऐसे ही मेरी हार हुई है कभी-कभी…छोटी-छोटी बातें करके बड़ा कहां हो जाओगे, पतली गलियों से निकलो, तो खुली डगर पर आओगे…उन्होंने गजल पढ़ी : मैं उसको आंसुओं से लिख रहा हूं कि मेरे बाद राह पढ़ ना पाये…लगता तो बेखबर सा हूं, लेकिन खबर में हूं…अरे तेरी नजर में हूं, तो सबकी नजर में हूं…
हिंदी-उर्दू शेरों की महफिलदेर रात तक जवां रही. शायरों की दिल छूती आवाज में शेरों, गजलों और नज्मों का दौर जारी रहा. राहत इंदौरी के शेर ने हालात बयां किया. आज हम दोनों को फुर्सत है, चलो इश्क करें…इश्क की दोनों को जरूरत है…चलो इश्क करें…इसमें नुकसान का खतरा ही नहीं रहता है…यह मुनाफे की तिजारत है, चलो इश्क करें…यह महकती, यह थिरकती, यह चमकती दुनिया इश्कवालों की बदौलत है, चलो इश्क करें…आप हिंदू हैं, मैं मुसलमान, ये इसाई, वो सिख, यार छोड़ो, यह सियासत है…चलो इश्क करें…
अंत में डॉ कुमार विश्वास ने फिर से मंच संभाला. तालियों की लगातार गूंजती आवाज के बीच उन्होंने शेर पढ़ा : मैं अपने गीत, अपने गजलों से उसे पैगाम करता हूं..उसी की दी हुई दौलत उसी के नाम करता हूं, हवा का काम है चलना, दीये का काम है जलना, वो अपना काम करती है, मैं अपना काम करता हूं…दर्शकों की भारी मांग पर डॉ कुमार विश्वास ने अपनी सबसे मशहूर रचना पढ़ी. कोई दीवाना कहता है, कोई पागल समझता है, मगर धरती की बेचैनी को बस बादल समझता है…मैं तुझसे दूर कैसा हूं, तू मुझसे दूर कैसी है…ये तेरा दिल समझता है या मेरा दिल समझता है…मोहब्बत एक अहसासों की पावन सी कहानी है, कभी कबीरा दीवाना था कभी मीरा दीवानी है…यहां सब लोग कहते हैं, मेरी आंखों में आंसू हैं, जो तू समझे तो मोती है, जो ना समझे तो पानी है… समंदर पीर का अंदर है, लेकिन रो नहीं सकता…यह आंसू प्यार का मोती है, इसको खो नहीं सकता, मेरी चाहत को दुल्हन तू बना लेना, मगर सुन ले, जो मेरा हो नहीं पाया, वो तेरा हो नहीं सकता…भ्रमर कोई कुमुदुनी पर मचल बैठा तो हंगामा, हमारे दिल में कोई ख्वाब पल बैठा तो हंगामा…अभी तक डूब कर सुनते थे सब किस्सा मोहब्बत का, मैं किस्से को हकीकत में बदल बैठा तो हंगामा…
