कागज पर जिंदा ‘बरुघूट्टू पश्चिमी पंचायत’, जमीन पर बन चुकी है खदान

झारखंड के रामगढ़ में बरुघूट्टू पश्चिमी पंचायत का अस्तित्व खत्म हो चुका है, लेकिन कागजों में यह आज भी सक्रिय है। जानिए क्यों यह पंचायत बनी है एक बड़ी पहेली।

रामगढ़: झारखंड के रामगढ़ जिले के मांडू प्रखंड अंतर्गत वेस्ट बोकारो क्षेत्र में विकास और विस्थापन के बीच का विरोधाभास बार फिर सामने आया है. बारुघूट्टू पश्चिमी पंचायत इसका सबसे बड़ा उदाहरण बनकर उभरी है. करीब पांच वर्ष पहले खदान विस्तार के कारण पूरी पंचायत की आबादी उजड़ गई, गांव और बाजार खत्म हो गए और पंचायत की अधिकांश जमीन ओपनकास्ट खदान का हिस्सा बन गई. बावजूद इसके सरकारी अभिलेखों में पंचायत आज भी अस्तित्व में है और पंचायती राज व्यवस्था के तहत यहां चुनाव भी कराए जा रहे हैं.

खदान विस्तार ने मिटा दिया पंचायत का भौतिक अस्तित्व

टाटा स्टील वेस्ट बोकारो डिवीजन के खदान विस्तार के कारण बारुघूट्टू पश्चिमी पंचायत की वर्षों पुरानी आबादी को विस्थापित होना पड़ा. धीरे-धीरे पंचायत के घर, कार्यालय, स्कूल, सड़क और बाजार का अस्तित्व समाप्त होता गया. कंपनी की आवासीय कॉलोनी को भी खाली कराया गया.

कंपनी क्वार्टर में रहने वाले टाटा स्टील के कर्मचारियों को प्रबंधन ने दूसरी जगह स्थानांतरित किया, जबकि अन्य प्रभावित परिवारों को मुआवजा और भेलगड़ा में जमीन उपलब्ध कराकर पुनर्वासित किया गया. विस्थापित परिवारों का एक बड़ा हिस्सा अब वहां उपलब्ध सुविधाओं के साथ अपना जीवन बिता रहा है.

आज पंचायत की जिस जमीन पर कभी गांव और आबादी थी, वहां ओपनकास्ट खदान संचालित है और कोयला निकाला जा रहा है. पंचायत की जमीन पर अब गांव की जगह खदान और भारी मशीनें दिखाई देती हैं.

विस्थापन के साथ बिखर गया सामाजिक ताना-बाना

बारुघूट्टू पश्चिमी के उजड़ने के बाद पंचायत के लोग भेलगड़ा समेत आसपास के अलग-अलग इलाकों और पंचायतों में बस गए. कई परिवारों ने नजदीकी गांवों में अपना नया ठिकाना बनाया, जबकि बाजार और कारोबार खत्म होने के कारण कई दुकानदारों को रोजगार की तलाश में दूसरे क्षेत्रों का रुख करना पड़ा.

विस्थापन ने केवल लोगों के घर ही नहीं छीने, बल्कि वर्षों से बनी सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान को भी बिखेर दिया. जिन गलियों में कभी लोगों की आवाजाही और बाजार की चहल-पहल हुआ करती थी, वहां अब खदान का विस्तार हो चुका है.

स्थानीय लोगों के अनुसार, “हमारा पंचायत तो खत्म हो गया, लेकिन सरकारी कागजों में आज भी हम उसी पंचायत के निवासी हैं.

पंचायत उजड़ गई, फिर भी हुआ चुनाव

सबसे बड़ा सवाल पंचायती राज व्यवस्था को लेकर है. पंचायत के भौतिक रूप से उजड़ जाने के बाद भी यहां पिछले पंचायत चुनाव में मुखिया, पंचायत समिति सदस्य, वार्ड सदस्य सहित अन्य पदों के लिए चुनाव कराया गया.

चुनाव और पंचायत प्रतिनिधियों का ढांचा तो मौजूद है, लेकिन जमीनी स्थिति अलग है. पंचायत के पास अब न तो पहले जैसा भौगोलिक क्षेत्र बचा है, न स्थायी आबादी और न ही विकास कार्यों के लिए पंचायत स्तर पर पर्याप्त जमीन.

ऐसे में सवाल उठता है कि निर्वाचित जनप्रतिनिधि आखिर किस क्षेत्र और किस आबादी का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं?

विकास राशि खर्च होगी कहां?

बारुघूट्टू पश्चिमी पंचायत का मामला प्रशासनिक व्यवस्था के सामने भी कई गंभीर सवाल खड़े करता है. जब पंचायत का भौतिक अस्तित्व लगभग समाप्त हो चुका है, तो पंचायत के लिए आवंटित विकास राशि का उपयोग किस क्षेत्र में किया जाएगा?

सरकारी योजनाओं का क्रियान्वयन कहां होगा? पंचायत के निर्वाचित प्रतिनिधि किन लोगों और किस क्षेत्र की जरूरतों के आधार पर विकास योजनाएं तैयार करेंगे? पंचायत भवन, सड़क, नाली, पेयजल और अन्य आधारभूत सुविधाओं से जुड़ी योजनाओं का भौतिक क्रियान्वयन किस स्थान पर होगा?

इन सवालों का स्पष्ट जवाब मौजूदा व्यवस्था में दिखाई नहीं देता.

विस्थापन के बाद प्रशासनिक पुनर्गठन क्यों नहीं?

बारुघूट्टू पश्चिमी का मामला केवल एक पंचायत के उजड़ने तक सीमित नहीं है। यह विस्थापन के बाद प्रशासनिक पुनर्गठन की जरूरत पर भी सवाल खड़ा करता है.

जानकारों के अनुसार, जब किसी पंचायत की पूरी आबादी विस्थापित हो जाती है और उसका मूल भौगोलिक क्षेत्र खदान या किसी अन्य परियोजना में शामिल हो जाता है, तो प्रशासनिक स्तर पर पंचायत की सीमाओं और संरचना की समीक्षा की जानी चाहिए.

ऐसी स्थिति में पंचायत का समीपवर्ती पंचायत में विलय, सीमाओं का पुनर्निर्धारण या विस्थापित आबादी के आधार पर नई पंचायत संरचना जैसे विकल्पों पर विचार किया जा सकता है.

चुनाव से पहले जमीनी सत्यापन की जरूरत

बारुघूट्टू पश्चिमी की स्थिति यह सवाल भी खड़ा करती है कि पंचायत चुनाव से पहले संबंधित क्षेत्रों का जमीनी सत्यापन किस स्तर तक किया जाता है. यदि किसी पंचायत में स्थायी आबादी ही नहीं बची है और उसका मूल क्षेत्र खदान में तब्दील हो चुका है, तो वहां चुनाव कराने से पहले प्रशासनिक सीमाओं और आबादी की वास्तविक स्थिति की समीक्षा जरूरी हो जाती है.

कागजों में पंचायत, जमीन पर खदान

बारुघूट्टू पश्चिमी पंचायत आज विकास और विस्थापन की पूरी कहानी अपने भीतर समेटे हुए है. कभी जहां घर, स्कूल, बाजार और सड़कें थीं, वहां आज कोयला खदान और मशीनें हैं. लोग दूसरी जगह बस चुके हैं, सामाजिक ताना-बाना बिखर चुका है और पंचायत का भौतिक अस्तित्व लगभग समाप्त हो गया है.

इसके बावजूद सरकारी रिकॉर्ड में पंचायत अब भी कायम है और लोकतांत्रिक ढांचा भी मौजूद है.

यही विरोधाभास सबसे बड़ा सवाल है—जब पंचायत की जमीन और स्थायी आबादी ही नहीं बची, तो क्या केवल सरकारी कागजों में उसका अस्तित्व पर्याप्त है?

बारुघूट्टू पश्चिमी की कहानी बताती है कि विकास परियोजनाओं से होने वाले विस्थापन के साथ केवल लोगों का पुनर्वास ही पर्याप्त नहीं है. विस्थापित आबादी के साथ प्रशासनिक और लोकतांत्रिक ढांचे का पुनर्गठन भी उतना ही जरूरी है.


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By Prabhat khabar news desk

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