प्लास्टिक ने बर्बाद किया पारंपरिक बांस से बने सामानों का बाजार

प्लास्टिक ने बर्बाद किया पारंपरिक बांस से बने सामानों का बाजार

किस्को़ लोहरदगा जिले का किस्को प्रखंड कभी बांस के आकर्षक सामानों के निर्माण के लिए विख्यात था, लेकिन आज यहां के कारीगर हाशिये पर हैं. आधुनिक बाजार में प्लास्टिक के सस्ते सामानों की बढ़ती पैठ ने प्राचीन काल से चले आ रहे इस पारंपरिक व्यवसाय की कमर तोड़ दी है. प्रखंड के हिसरी और खरकी पंचायत के कोचा व हिसरी गांव निवासी तुरी समुदाय के सैकड़ों परिवारों के सामने अब आजीविका का गंभीर संकट खड़ा हो गया है. सरकारी योजनाएं भी साबित हो रहीं नाकाफी : तुरी समुदाय की महिलाओं को स्वरोजगार से जोड़ने के लिए सरकार द्वारा प्रशिक्षण और आधुनिक उपकरण तो उपलब्ध कराये गये, लेकिन बाजार का अभाव सबसे बड़ी बाधा बनी हुई है. कोचा गांव में एससीए मद से उपलब्ध कराये गये उपकरणों के माध्यम से करीब 60 महिलाएं बांस से मोबाइल स्टैंड, सोफा, चूड़ियां जैसी आधुनिक उत्पाद बना रही थीं. फरवरी 2023 में शुरू हुई इस योजना के तहत महिलाओं को ट्रेंड भी किया गया, पर उचित मूल्य और मांग की कमी के कारण यह कार्य कई महीनों से बंद पड़ा है. महिलाओं का कहना है कि जितनी लागत और मेहनत लगती है, उतनी राशि बाजार से वापस नहीं मिल पाती. जंगलों से बांस गायब, बढ़ी लागत : कारीगरों के अनुसार, अब स्थानीय जंगलों में बांस उपलब्ध नहीं है. उन्हें दूसरे क्षेत्रों से 50 से 100 रुपये प्रति पीस की दर से बांस खरीदकर लाना पड़ता है. दिन भर की कठिन मेहनत के बाद एक कारीगर मुश्किल से दो सूप तैयार कर पाता है, जिससे बमुश्किल 150 रुपये का फायदा होता है. प्लास्टिक के सूप, टोकरी और पंखों ने बाजार पर कब्जा कर लिया है, जिससे बांस के सामानों की मांग केवल छठ जैसे विशेष पर्वों तक सीमित रह गयी है. क्या कहते हैं ग्रामीण : ग्रामीण बसंत, रमेश और किरण तुरी ने बताया कि यदि सरकार ने बाजार और संसाधन उपलब्ध नहीं कराये, तो वे इस पुश्तैनी पेशे को छोड़कर मुंबई या सूरत जैसे शहरों में पलायन करने को मजबूर होंगे. कृष्णा तुरी और बसंती देवी ने कहा कि लागत निकालना भी मुश्किल हो रहा है. ग्रामीणों ने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से अपील की है कि उनके पारंपरिक कार्य को जीवित रखने के लिए ठोस बाजार व्यवस्था सुनिश्चित की जाये. पूंजी निकालना भी हुआ मुश्किल : मदन और फिरन तुरी ने व्यथा सुनाते हुए कहा कि अब केवल समय काटने के लिए सामान बनाते हैं. खरीदार नहीं मिलने से पूंजी फंस जाती है. जिला प्रशासन ने बाजार उपलब्ध कराने का भरोसा दिया था, जो अब तक धरातल पर नहीं उतरा है. पारंपरिक शिल्पकारों का यह हुनर अब सरकारी उदासीनता और प्लास्टिक के बढ़ते चलन के बीच दम तोड़ रहा है.

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By SHAILESH AMBASHTHA

SHAILESH AMBASHTHA is a contributor at Prabhat Khabar.

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