पलामू किला: नेताओं की ‘तारीख पर तारीख’ और प्रशासनिक उपेक्षा के बीच जमींदोज हो रहा 350 साल पुराना गौरव

झारखंड का ऐतिहासिक पलामू किला प्रशासनिक उपेक्षा और नेताओं के झूठे वादों के कारण नष्ट होने की कगार पर है. जानें क्यों 90% किला हो चुका है जमींदोज.

बेतला से संतोष कुमार की ग्राउंड रिपोर्ट

"देर न हो जाए कहीं देर न हो जाए". यह फिल्मी पंक्ति आज झारखंड की सबसे बड़ी ऐतिहासिक धरोहर पलामू किला की बेबसी और लाचारी की सबसे बड़ी हकीकत बन चुकी है. करीब साढ़े तीन सौ बरस पहले चेरो राजवंश के स्वर्णिम अतीत को अपने भीतर समेटे निर्मित यह किला दिनों-दिन जर्जर होकर इतिहास के पन्नों में विलीन होने की कगार पर है. एक वर्ग किलोमीटर के विशाल दायरे में फैले इस ऐतिहासिक पलामू किला के जीर्णोद्धार का कार्य अभी तक शुरू नहीं हो सका है. हालांकि इसके संरक्षण को लेकर चुनावी मंचों से बड़ी-बड़ी घोषणाएं तो हर साल होती हैं, लेकिन धरातल पर अभी तक इसे अमली जामा नहीं पहनाया गया है. नतीजतन, प्रशासनिक उपेक्षा के कारण इस प्राचीन धरोहर की स्थिति दिनों-दिन बद से बदतर होती जा रही है.

90% भाग जमींदोज: जंगलों के आगोश में अंतिम सांसें गिनती धरोहर

घने जंगल और झाड़ियों के आगोश में घिरे होने के कारण यह किला पूरी तरह से नष्ट होने की स्थिति में आ गया है. पुरातात्विक विभाग द्वारा जब पिछले कुछ वर्ष पहले विशेष सर्वे कराया गया था, तो बेहद चौंकाने वाले तथ्य सामने आए थे. सर्वे रिपोर्ट में यह साफ कहा गया था कि यह बड़े अफसोस की बात है कि उचित रख-रखाव के अभाव में किले का 90% भाग जमींदोज हो चुका है. वर्तमान समय में इस ऐतिहासिक संरचना का सिर्फ 10% भाग ही शेष बचा है. पुरातत्वविदों का स्पष्ट मानना है कि यदि इस बचे हुए हिस्से को भी जल्द से जल्द संरक्षित और मरम्मत कर नहीं बचाया गया, तो निश्चित रूप से यह पूरी तरह से ध्वस्त हो जाएगा. ऐतिहासिक महत्व रखने वाली दीवारों को पेड़ों की मोटी जड़ें अंदर से खोखला कर रही हैं.


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पीटीआर का पेंच: पलामू टाइगर रिजर्व क्षेत्र में होने से लटका रहा मामला

पलामू किला के जीर्णोद्धार में सबसे बड़ा रोड़ा इसका भौगोलिक क्षेत्र रहा है. पलामू टाइगर रिजर्व के कोर एरिया में स्थित होने के कारण यह मामला सालों तक वन विभाग और केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय के सख्त नियमों के बीच फंसा रहा. राष्ट्रीय उद्यान और बाघों के संरक्षण क्षेत्र में किसी भी प्रकार के निर्माण या भारी मशीनरी के उपयोग पर कानूनी पाबंदी है. इसी कारण भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण और राज्य सरकार को एनओसी (अनापत्ति प्रमाण पत्र) मिलने में लंबा वक्त लग गया. वन्यजीवों की सुरक्षा और नियमों की इस पेचीदगी ने जीर्णोद्धार की फाइलों की रफ्तार पर पूरी तरह ब्रेक लगा दिया, जिससे यह ऐतिहासिक धरोहर प्रशासनिक विभागों के बीच फुटबॉल बनी रही.

''जुमलों से ऊब चुके हैं लोग'': निर्माण के नाम पर सिर्फ ''तारीख पर तारीख''

यह जीर्णोद्धार कार्य वास्तव में बहुत पहले अति शीघ्र शुरू किया जाना चाहिए था, लेकिन विडंबना यह है कि पिछले कई सालों से सिर्फ राजनीतिक नेताओं द्वारा पलामू किला के पुनर्निर्माण के लिए नई-नई तिथियों की घोषणा की जाती रही है. स्थानीय निवासियों का कहना है कि \"जल्द जीर्णोद्धार का कार्य शुरू होगा \", यह जुमला सुनते-सुनते अब लोग पूरी तरह से ऊब चुके हैं. नेताओं की इसी ''तारीख पर तारीख'' मिलते रहने की नीति और खोखले आश्वासनों के कारण पलामू किला आज अपने अस्तित्व को बचाए रखने के लिए अकेले संघर्ष कर रहा है. नेताओं के इस ढुलमुल रवैए और प्रशासनिक सुस्ती ने क्षेत्र के इतिहास प्रेमियों को भी अब पूरी तरह निराश कर दिया है.

समय रहते नहीं जागे, तो मिट जायेगा चेरो वंश का नामोनिशान

यदि अब भी सरकार और संबंधित विभाग इस धरोहर को लेकर गंभीर नहीं हुए, तो आने वाली पीढ़ियां राजा मेदिनी राय और प्रताप राय के इस अद्भुत स्थापत्य को कभी साक्षात नहीं देख पाएंगी. ''कहीं देर न हो जाए'' का यह अलार्म केवल एक चेतावनी नहीं, बल्कि पलामू के गौरव की आखिरी चीख है. समय रहते कागजी दावों को धरातल पर उतारना होगा, वरना इतिहास हमें कभी माफ नहीं करेगा.

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लेखक के बारे में

By विकाश नाथ

26 साल से पत्रकारिता के क्षेत्र में कार्यरत हूं. रिपोर्टिंग के साथ डेस्क का काम करने भी अनुभव प्राप्त है. खेल डेस्क में भी काम करने का अनुभव है. रुरल के संस्करणों को देखता हूं.

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