बेतला,लातेहार : झारखंड में बाइसन (गौर) की अंतिम बची आबादी अब पलामू टाइगर रिजर्व (पीटीआर) के अंतर्गत आने वाले बेतला नेशनल पार्क और आसपास के क्षेत्रों तक सिमट गयी है. राज्य के अन्य क्षेत्रों से यह वन्यजीव लगभग विलुप्त हो चुका है. नवीनतम सर्वे के अनुसार बेतला क्षेत्र में अब सिर्फ 68 बाइसन बचे हैं. इनमें 33 मादा, 25 नर और 10 शावक शामिल हैं. इतनी कम आबादी के कारण इनके अस्तित्व को लेकर चिंता बढ़ गयी है.
1500 से घटकर 68 पर पहुंची संख्या
1970 के दशक में झारखंड के इस क्षेत्र में 1500 से अधिक बाइसन पाए जाते थे. वन्यजीवों के अत्यधिक दोहन और जंगलों के सिकुड़ने के कारण 1990 के दशक तक इनकी संख्या घटकर करीब 400 रह गयी. वर्तमान में राज्य के हजारीबाग, कोडरमा, दलमा, सारंडा, पालकोट और गुमला के जंगलों से बाइसन का अस्तित्व खत्म हो चुका है.
शिकार और चरागाह की कमी से बढ़ी परेशानी
पूर्व में बारेसाढ़ इलाके में नक्सली गतिविधियों के कारण वन विभाग की नियमित मॉनिटरिंग प्रभावित हुई. इसका फायदा शिकारियों ने उठाया. वहीं बेतला के बफर जोन में आसपास के गांवों के करीब 1.5 लाख पालतू मवेशियों के चरने से बाइसन के प्राकृतिक चरागाह पर दबाव बढ़ गया है. इससे उन्हें पर्याप्त भोजन नहीं मिल पा रहा है.
करीब 226 वर्ग किलोमीटर के सीमित क्षेत्र में बाइसन की आबादी सिमट जाने से अंतःप्रजनन (इनब्रीडिंग) की समस्या भी बढ़ी है. इससे उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता और प्रजनन क्षमता प्रभावित होने की आशंका है.
मध्य प्रदेश से लाये जायेंगे 50 बाइसन
बाइसन की आनुवंशिक विविधता बढ़ाने के लिए मध्य प्रदेश से 50 बाइसन लाने की योजना है. संक्रमण के खतरे को कम करने के लिए आसपास के 190 गांवों के करीब 1.5 लाख पालतू पशुओं के टीकाकरण की भी तैयारी है.
पार्क प्रबंधन की ओर से बाइसन के लिए पसंदीदा घास के मैदान विकसित किये जा रहे हैं. अवैध शिकार रोकने के लिए एंटी-पोचिंग सेंटरों को भी सक्रिय किया गया है. इन प्रयासों से बेतला में बची बाइसन की आबादी को सं
