रांची: झारखंड में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी Special Intensive Revision (SIR) को लेकर एक नया मामला सामने आया है. राज्य में आदिवासी समुदाय के करीब चार हजार लोगों ने अब तक SIR प्रक्रिया में शामिल होने से इनकार किया है. इन लोगों ने न तो Enumeration Form भरा है और न ही दावे-आपत्ति की प्रक्रिया में आगे आए हैं. निर्वाचन आयोग इन लोगों का नाम और विवरण अलग से दर्ज कर रहा है, ताकि भविष्य में रिकॉर्ड उपलब्ध रहे और उन्हें मतदाता सूची में शामिल होने के लिए प्रेरित किया जा सके.
आखिर क्यों SIR से दूरी बना रहे हैं आदिवासी?
इस पूरे मामले के पीछे सिर्फ फॉर्म नहीं भरना नहीं, बल्कि अविश्वास और अपने अधिकारों को लेकर चिंता भी बड़ी वजह के रूप में सामने आ रही है. आदिवासी समुदाय के कुछ लोगों का कहना है कि उनकी जमीन, पहचान और राजनीतिक प्रतिनिधित्व से जुड़े मुद्दों को पर्याप्त महत्व नहीं मिल रहा है. इसी असंतोष के कारण कुछ समुदायों ने SIR में भाग लेने से दूरी बनाई है.
रांची और खूंटी में रहने वाले मुंडा समुदाय के ‘एसी समाज’ के करीब 2,200 से अधिक लोगों ने जुलाई के मध्य में ही Enumeration Form भरने से इनकार कर दिया था. बूथ लेवल अधिकारियों (BLO) और जिला प्रशासन के अधिकारियों ने कई बार उनसे संपर्क करने की कोशिश की, लेकिन वे अपने फैसले पर कायम रहे.
इन लोगों का तर्क है कि उनका समुदाय बहुत पुराना है और वे अपनी पहचान को लेकर अलग दृष्टिकोण रखते हैं. इसी तरह रांची में रहने वाले उरांव समुदाय के कुछ लोगों द्वारा भी SIR प्रक्रिया में शामिल होने से इनकार किए जाने की जानकारी सामने आई है.
किन जिलों में सामने आए मामले?
निर्वाचन आयोग के अधिकारियों के मुताबिक SIR से दूरी बनाने वाले लोगों के मामले रांची, खूंटी, पाकुड़ और लातेहार में सामने आए हैं. इसके अलावा 17 अगस्त को धनबाद में भी छह ऐसे मामले सामने आए. यानी यह मामला किसी एक गांव या एक जिले तक सीमित नहीं रह गया है.
हालांकि, करीब 4 हजार का आंकड़ा पूरे राज्य में आदिवासी समाज के SIR बहिष्कार का आंकड़ा नहीं है. यह उन लोगों की संख्या है, जिनके बारे में निर्वाचन प्रक्रिया के दौरान जानकारी सामने आई है कि उन्होंने SIR में भाग लेने से इनकार किया है.
निर्वाचन आयोग क्या कर रहा है?
झारखंड के मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी के. रवि कुमार के मुताबिक आयोग इन लोगों की जानकारी रिकॉर्ड में रख रहा है. इसके पीछे दो प्रमुख कारण बताए गए हैं—पहला, भविष्य के लिए रिकॉर्ड सुरक्षित रखना और दूसरा, इन लोगों को मतदाता सूची में अपना नाम दर्ज कराने के लिए प्रेरित करना.
आयोग की ओर से ऐसे लोगों को समझाने के लिए डोर-टू-डोर अभियान भी चलाया जा रहा है. BLO और प्रशासनिक अधिकारी लोगों से संपर्क कर उन्हें SIR प्रक्रिया में शामिल होने के लिए समझा रहे हैं.
नाम दर्ज नहीं कराया तो क्या होगा?
यह इस पूरे मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है. मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी के मुताबिक यदि कोई व्यक्ति SIR की प्रक्रिया के दौरान Enumeration Form नहीं भरता है और दावा-आपत्ति की अवधि में Form-6 के जरिए नाम दर्ज कराने के लिए आवेदन नहीं करता है, तो उसका नाम मतदाता सूची में शामिल नहीं होगा.
इसलिए आयोग की कोशिश सिर्फ लोगों का डेटा जुटाने तक सीमित नहीं है. वह ऐसे लोगों को यह समझाने की कोशिश कर रहा है कि मतदाता सूची में नाम दर्ज रहने के लिए निर्धारित प्रक्रिया में भाग लेना जरूरी है.
पहले भी सामने आया था ऐसा मामला
SIR की शुरुआत के कुछ समय बाद ही खूंटी जिले के एक गांव में आदिवासी समुदाय के लोगों द्वारा प्रक्रिया में शामिल होने से इनकार करने का मामला सामने आया था. इसके बाद रांची और खूंटी में रहने वाले एसी समाज के 2,200 से अधिक लोगों ने भी Enumeration Form नहीं भरा. मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी ने स्वयं खूंटी जाकर कुछ लोगों से बातचीत की थी, लेकिन इसके बावजूद समुदाय के लोग अपने फैसले पर कायम रहे.
अब ऐसे मामलों की संख्या करीब 4 हजार तक पहुंचने की बात सामने आई है. इससे निर्वाचन आयोग के सामने चुनौती बढ़ गई है कि वह एक तरफ मतदाता सूची को निर्धारित प्रक्रिया के तहत अपडेट करे और दूसरी तरफ SIR को लेकर लोगों के बीच मौजूद आशंकाओं को भी दूर करे.
झारखंड में SIR की प्रक्रिया क्यों महत्वपूर्ण है?
निर्वाचन आयोग की ओर से झारखंड में SIR-2026 के तहत मतदाताओं के सत्यापन की प्रक्रिया शुरू की गई थी. 30 जून से शुरू हुए अभियान में BLO को घर-घर जाकर मतदाताओं को आंशिक रूप से भरे हुए Enumeration Form उपलब्ध कराने और मतदाता संबंधी जानकारी का सत्यापन करने की जिम्मेदारी दी गई थी.
SIR के पहले चरण के बाद झारखंड की ड्राफ्ट मतदाता सूची में 43 लाख से अधिक नाम हटाए जाने की खबर पहले ही सामने आ चुकी है. हालांकि इसका बड़ा कारण मृत, स्थानांतरित या अन्य श्रेणियों में आने वाले मतदाताओं से जुड़ा था.
अब करीब 4 हजार आदिवासियों द्वारा प्रक्रिया से दूरी बनाए जाने का मामला इस पूरी कवायद में एक अलग सामाजिक और राजनीतिक पहलू जोड़ता है.
अब आगे क्या?
निर्वाचन आयोग के सामने सबसे बड़ी चुनौती इन लोगों को प्रक्रिया में शामिल करने की है. आयोग का कहना है कि लोगों की जानकारी रिकॉर्ड में रखी जा रही है और उन्हें मतदाता सूची में शामिल होने के लिए लगातार समझाया जा रहा है. दूसरी ओर, जिन समुदायों ने SIR का विरोध किया है, उनकी आपत्तियां सिर्फ तकनीकी प्रक्रिया से जुड़ी नहीं हैं, बल्कि पहचान, जमीन और राजनीतिक प्रतिनिधित्व जैसे व्यापक सवालों से भी जुड़ी हैं.
ऐसे में आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि आयोग की डोर-टू-डोर मुहिम का इन समुदायों पर कितना असर पड़ता है और क्या ये लोग आगे चलकर Enumeration Form या Form-6 के जरिए मतदाता सूची में अपना नाम दर्ज कराने के लिए तैयार होते हैं.
