बिंदापाथर. बिंदापाथर सार्वजनिक दुर्गा मंदिर में दुर्गापूजा वर्षो पुरानी है. मंदिर में लिखा है 1331 बंगाब्द से अर्थात 1924 से पूजा हो रही है. हालांकि जानकारों के मुताबिक बिंदापाथर सार्वजनिक दुर्गा पूजा इससे भी पुरानी है. उस समय बिचाली के घर में माता की आराधना होती थी. मंदिर के ऊपर सुफल साधु लिखा है. बताया जाता है कि बिंदापाथर में उनकी देखरेख में ही पूजा प्रारंभ हुई थी. बिंदापाथर सार्वजनिक दुर्गापूजा में सभी जाति धर्म की सहभागिता होती है. इस पूजा में उस समय बिंदापाथर के एकमात्र मुस्लिम परिवार ने भी सहयोग दिया था. आज भी उस परिवार की दुर्गापूजा के लिए चंदा निर्धारित है. षष्ठी के दिन माता की स्थापना के लिए बेलवरण उत्सव प्रारंभ हो जाता है. पूजा में बकरे की बलि भी दी जाती है. सप्तमी से नवमी तक माता के मंदिर में बलि दी जाती है. महाष्टमी के दिन पूजा के पश्चात डंडवत प्रथा का प्रचलन है. बताया जाता है कि माता के समक्ष लोग मनौती मांगते हैं जिसे पूरा होने पर महाष्टमी में डंडवत देते हैं. दूर दराज से सैकड़ों श्रद्धालु डंडवत में शामिल होते हैं. महानवमी के दिन माता के दरबार में दर्जनों बकरे की बलि दी जाती है. परंपरा के अनुसार प्रथम बकरा आदिवासियों की होती है. मंदिर के संविधान के अनुसार, नवमी पर प्रथम बकरा उस समय महुलबना के एक आदिवासी ने दी थी. आज भी उसी के वंशज ही देते हैं. प्रतिदिन दुर्गापूजा के समय मंदिर में संध्या आरती होती है. दशमी के दिन में श्रद्धालु पुष्पांजलि देते हैं. इसके बाद शोभा यात्रा निकालकर उत्सव मनाया जाता है. बंगाली परंपरा के अनुसार सिंदूर खेला विशेष आकर्षण होता है. विसर्जन बाउरी जाति के लोगों द्वारा ही की जाती है.
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