मंडरो दुर्गा मंदिर में आज भी राजतंत्र परंपरा से होती है मां दुर्गा की पूजा

नारायणपुर. प्रखंड के मंडरो स्थित राजबाड़ी दुर्गा मंदिर क्षेत्र का प्राचीनतम प्रसिद्ध दुर्गा मंदिरों में से एक है.

– दुर्गोत्सव. झूमर व आदिवासी नृत्य पर राजा जमकर बांटते थे उपहार, आज भी यह परंपरा बरकरार प्रतिनिधि, नारायणपुर. प्रखंड के मंडरो स्थित राजबाड़ी दुर्गा मंदिर क्षेत्र का प्राचीनतम प्रसिद्ध दुर्गा मंदिरों में से एक है. नवरात्र पर कई गांव के श्रद्धालु मंदिर में देवी दुर्गा की पूजा-अर्चना करने पहुंचते हैं. मंडरो दुर्गा मंदिर का इतिहास अत्यंत प्राचीन है. क्षेत्र के प्राचीन दुर्गा मंदिरों में से एक मंडरो राजबाड़ी का दुर्गा लोगों को खूब भाता है. इस मंदिर में मां के नौ स्वरूपों की पूजा होती है. मंदिर के इतिहास के संबंध में राजपरिवार के गिरिधर प्रसाद सिंह बताते हैं कि आज से करीब 300 वर्ष पूर्व नारायणपुर प्रखंड के घांटी (नारायणपुर) राजतंत्र में देवी दुर्गा की पूजा अर्चना होती रही. उस समय घांटी राजपरिवार में चार राजकुमार थे. चूंकि शासन और क्षेत्रफल के दृष्टिकोण से राजा का क्षेत्र बहुत बड़ा था. इस कारण चारों राजकुमारों ने मौजा अनुसार अपना-अपना क्षेत्र बांट लिया. इस क्रम में क्रमशः सबसे बड़े राजकुमार को घांटी, मध्य को मंडरो (राजा शोभा सिंह), सांझले को पिंडारी (विद्यासागर) व कनिष्ठ को आमजोरा राज्य मिला एवं शासन चलाने लगे. बंटवारे के कई वर्षों तक मंडरो के राजा बने राजकुमार राजा शोभा सिंह ने भी घांटी में ही देवी दुर्गा की पूजा-अर्चना की. परंतु जब उनके क्षेत्र के प्रजाओं ने उन्हें मंडरो में ही देवी दुर्गा की पूजा कराने का अनुरोध किया तब राजा शोभा सिंह बंगला संवत सन 1642 के 13 बैसाख को देवी दुर्गा की बेदी घांटी से मंडरो लाकर स्थापित किए, तब से लेकर वर्तमान समय तक देवी दुर्गा की पूजा राज परिवार के सदस्य ही करते आ रहे हैं. – 36 मौजा के प्रजा की आस्था का केंद्र हुआ करता देवी दुर्गा का यह मंदिर वहीं राजपरिवार के सदस्य ने बताया कि जब राजा शोभा सिंह देवी दुर्गा की पूजा अर्चना करने को तैयार हुुए तब उनके रियासत में पड़ने वाले 36 मौजा के प्रजा ने प्रतिवर्ष देवी को बकरा बलि देने के लिए प्रत्येक मौजा से एक-एक बकरा देने की शुरुआत की. राजा के साथ मिलकर 36 मौजा के सभी प्रजा देवी दुर्गा की पूजा अर्चना धूमधाम से करने लगे. राजा के निर्देश पर दीवान पूजा के व्यवस्था राजकोषी से करने लगे. तब देवी दुर्गा का मंदिर मिट्टी व फुस की बनी. उसके बाद हाल ही के वर्षों में मंदिर का पुनर्निर्माण कर भव्य रूप दिया गया है. वर्तमान में भी उक्त मंदिर में बकरा बलि दी जाती है. नवमी को आज भी क्षेत्र की प्रजा परम्परा अनुसार बकरा बलि देते हैं. – अभी तक इन राजाओं ने कराई मंडरो दुर्गा मंदिर में पूजा मंडरो के इस दुर्गा मंदिर में सर्वप्रथम राजा शोभा सिंह ने पूजा अर्चना की थी. इसके बाद क्रमशः राजा दौलत सिंह, राजा निर्मल सिंह, राजा नीलकंठ सिंह, राजा धनपत लाल सिंह, राजा हरे कृष्णलाल सिंह, राजा रघुनंदन लाल सिंह, राजा लाल मोहन सिंह, राजा गोविंद लाल सिंह, राजा शिव प्रसाद सिंह, राजा वंशीधर लाल सिंह, राजा मोतीलाल सिंह एवं इसके बाद राजवंश के अर्धेन्धु नारायण सिंह, चंद्र मोहन सिंह, पंचम सिंह, शशिधर प्रसाद सिंह ने पूजा की थी. वर्तमान में देवी दुर्गा की पूजा-अर्चना की समस्त व्यवस्था व खर्च राजपरिवार के गिरिधर प्रसाद, अशोक सिंह, गोलक बिहारी सिंह, राजकिशोर सिंह, निरंजन सिंह, अंतु सिंह, हरि सिंह, अजय सिंह आदि करते हैं. प्रखंड मुख्यालय से मंडरो स्थित मंदिर की दूरी छह किलोमीटर है. जबकि निकटतम रेलवे स्टेशन विद्यासागर से इसकी दूरी आठ किलोमीटर है. देवी दुर्गा की प्रतिमा का निर्माण निरसा के मूर्तिकार वंशानुगत करते आ रहे हैं. – नवरात्र पर क्या होता है विशेष प्रतिदिन (नवरात्र) सुबह शाम देवी दुर्गा के प्रांगण में ढोल, शंख ध्वनि, नवमी को बकरे की बलि, वैदिक मंत्रोच्चार के साथ नौ दिवसीय दुर्गा चंडी पाठ, द्वादशी तिथि को क्षेत्र में सबसे बड़ा मेला लगता है. मेले में झूमर तथा आदिवासी नृत्य लोकप्रिय है. झूमर तथा आदिवासी नृत्य पर राजा इनाम देते थे. आज भी परंपरा बरकरार है. नवरात्र के अवसर पर लोक नृत्य कलाकार एवं आदिवासी झूमर देवी दुर्गा के प्रांगण में प्रस्तुत करते थे. इस पर राजा कलाकारों को इनाम स्वरूप धन देते थे. आज भी राजवंश के लोग इस परंपरा को बरकरार रखे हैं. इस मंदिर में राजपुरोहित संतलाल पंडा है, जबकि सहयोगी पबीर मिश्रा हैं.

डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

प्रभात खबर डिजिटल प्रीमियम स्टोरी

लेखक के बारे में

By JIYARAM MURMU

JIYARAM MURMU is a contributor at Prabhat Khabar.

संबंधित खबरें >

यह भी पढ़ें >