भगवान श्रीकृष्ण की बाल लीला का किया गया वर्णन

सिमलडूबी पंचायत अंतर्गत मंझलाडीह गांव में श्रीमद्भागवत कथा जारी है.

बिंदापाथर. सिमलडूबी पंचायत अंतर्गत मंझलाडीह गांव में श्रीमद्भागवत कथा जारी है. इसके पांचवें दिन वृंदावन धाम के कथावाचक हरिदास अंकित कृष्ण महाराज ने भगवान श्री कृष्ण की बाल लीला एवं गोवर्धन पर्वत लीला प्रसंग का वर्णन किया. कहा कि भगवान श्री कृष्ण ने गृह लीला तब की, जब वे मात्र छह दिन के थे. चतुर्दशी के दिन पूतना आयी, जब भगवान तीन माह के हुए तो करवट उत्सव मनाया गया और तभी शकटासुर आया. भगवान ने संकट भंजन करके उस राक्षस का उद्धार किया. इसी तरह बाल लीलाएं, माखन चोरी लीला, ऊखल बंधन लीला, यमलार्जुन का उद्धार आदि दिव्य लीलाएं की है. श्रीकृष्ण का प्रत्येक लीला दिव्य है. हर लीला का महत्व आध्यात्मिक है. श्री शुकदेवजी कहते हैं- परीक्षित नंदबाबा जब मथुरा से चले, तब रास्ते में विचार करने लगे कि वासुदेव जी का कथन झूठा नहीं हो सकता. इससे उनके मन में उत्पात होने की आशंका हो गयी, तब उन्होंने मन-ही-मन ‘भगवान की शरण ली है, वे ही रक्षा करेंगे’ ऐसा निश्चय किया. पूतना नाम की एक बड़ी क्रूर राक्षसी थी. गोकुल में नंदबाबा ने पुत्र का जन्मोत्सव बड़े धूम-धाम से मनाया. ब्राह्मण और याचकों को यथोचित गौधन तथा स्वर्ण, रत्न, धनादि का दान किया. कर्मकांडी ब्राह्मणों को बुलाकर बालक का जातिकर्म संस्कार करवाया. पितर और देवताओं के अनेकों प्रकार से पूजा-अर्चना की. पूरे गोकुल में धूमधाम से उत्सव मनाया गया. कुछ दिनों बाद कंस ढूंढ-ढूंढ कर नवजात शिशुओं का वध करवाने लगा. उसने पूतना नाम की एक क्रूर राक्षसी को ब्रज में भेजा. पूतना ने राक्षसी वेशभूषा में सज कर अति मनोहर नारी का रूप धारण किया और आकाश मार्ग से गोकुल पहुंच गयी. गोकुल में पहुंच कर वह सीधे नंदबाबा के महल में गई और शिशु के रूप में सोते हुए श्रीकृष्ण को गोद में उठाकर अपना दूध पिलाने लगी. श्रीकृष्ण सब जान गए और वे क्रोध करके अपने दोनों हाथों से उसका कुच थाम कर उसके प्राण सहित दुग्धपान करने लगे. भयंकर गर्जना से पृथ्वी, आकाश तथा अंतरिक्ष गूंज उठे. बहुत से लोग बज्रपात समझ कर पृथ्वी पर गिर पड़े. पूतना अपने राक्षसी स्वरूप को प्रकट कर धड़ाम से भूमि पर बज्र के समान गिरी, उसका सिर फट गया और उसके प्राण निकल गये, जब यशोदा, रोहिणी और गोपियों ने उसके गिरने की भयंकर आवाज सुना, तब वे दौड़ी-दौड़ी उसके पास गयी. उन्होंने देखा कि बालक कृष्ण पूतना की छाती पर लेटा हुआ स्तनपान कर रहे हैं. एक राक्षसी मरी हुई पड़ी है. उन्होंने बालक को तत्काल उठा लिया और पुचकार कर छाती से लगा लिया. पूतना की मृत्यु और श्री कृष्ण के कुशलतापूर्वक बच जाने की बात सुनकर बड़े ही आश्चर्यचकित हुए. परीक्षित उदारशिरोमणि नंदबाबा ने मृत्यु के मुख से बचे हुए अपने लाला को गोद में उठा लिया. बार-बार उसका ललाट सूंघकर मन-ही-मन बहुत आनंदित हुए. कथा के साथ साथ भजन संगीत प्रस्तुत भी प्रस्तुत किया गया. नौनिहालों ने धार्मिक वेशभूषा में आकर्षक झांकी निकाली. इससे उपस्थित श्रोता भक्त भावविभोर होकर कथा स्थल पर झूमते रहे.

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