-कमलेश जैन- (वरिष्ठ वकील,सुप्रीम कोर्ट)
Menstrual Leave : भारतीय कार्यबल में महिलाओं की भागीदारी और उनके स्वास्थ्य अधिकारों को लेकर ‘मासिक धर्म अवकाश’ का मुद्दा एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है. यह विषय जितना मानवीय और जैविक है, उतना ही कानूनी और पेशेवर जटिलताओं से भरा हुआ भी. सर्वोच्च न्यायालय द्वारा इस मुद्दे पर दाखिल याचिका पर सुनवाई से इनकार करने और न्यायाधीशों की टिप्पणियों ने एक महत्वपूर्ण सवाल खड़ा किया है कि मासिक धर्म के दौरान अनिवार्य अवकाश की मांग महिलाओं के सशक्तिकरण का साधन है या यह अनजाने में उनके पेशेवर विकास के लिए एक अदृश्य दीवार खड़ी कर देगा.
मासिक धर्म में अवकाश देना स्त्रियों की नौकरी में अवरोध पैदा करता है, ऐसा मानना है सर्वोच्च न्यायालय का. प्रतिमाह उन मुश्किल दिनों के दौरान महिलाओं को अवकाश दिये जाने का सवाल यदा-कदा न्यायालय तथा नौकरी देने वालों को चुनौती देता रहता है. सर्वोच्च न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत एवं न्यायाधीश जॉयमाल्या बागची ने हाल ही में इस मामले पर चिंता जताते हुए कहा कि यह प्रश्न अंतत: नियोक्ताओं के ऊपर ही छोड़ देना चाहिए. हम इस पर कितना समय बर्बाद करें. अधिवक्ता शैलेंद्र मणि त्रिपाठी ने तीसरी बार इस विषय पर याचिका दायर कर सुप्रीम कोर्ट से इस समस्या का निवारण चाहा था.
उन्होंने पहले भी न्यायालय आने का कष्ट किया था. पहले मुकदमे का निस्तारण फरवरी, 2003 में हुआ था. वर्ष 2004 में याचिकाकर्ता ने यह कहते हुए फिर से सर्वोच्च न्यायालय का रुख किया था कि सर्वोच्च न्यायालय ने पहली बार सरकार को उचित निर्णय लेने को कहा था, पर सरकार ने ऐसा कुछ नहीं किया. तब सर्वोच्च न्यायालय ने आदेश दिया था कि सरकार इस समस्या पर कोई पॉलिसी डिसीजन ले. इसी 13 मार्च को इस मामले को लेकर चीफ जस्टिस ने याचिकाकर्ता से कहा कि आप एक सही (बोनाफाइड) याचिकाकर्ता नहीं हैं. सिर्फ युवा लड़कियों पर इंप्रेशन जमाना चाहते हैं कि वे लड़कों के बराबर नहीं हैं और आप इस समय में उनके साथ काम करना पसंद नहीं करते हैं.
यदि मासिक धर्म अवकाश को कानूनी रूप से लागू कर दिया जाता है, यानी महीने में पांच दिन संस्थानों को अपनी महिला कर्मचारियों को निर्णायक रूप से अवकाश देना ही होगा, तो कौन-सा नियोक्ता उन्हें काम पर रखना चाहेगा. वह क्यों उन छुट्टियों की तनख्वाह देना चाहेगा या काम का हर्ज कराना चाहेगा, जबकि वह उस समय का पूरा पैसा देगा. क्यों नहीं वह लड़कियों को छोड़ लड़कों से काम लेना पसंद करेगा. तो जो अधिकार सुरक्षा के लिए मांगा जा रहा है, वही भविष्य में महिलाओं के रोजगार की राह में अदृश्य दीवार खड़ी कर सकता है.
याचिकाकर्ता के सीनियर वकील एमआर शमशाद ने कहा कि बिहार देश का पहला राज्य बना, जिसने 1992 में महिलाओं के लिए दो दिनों के आकस्मिक अवकाश की घोषणा की थी. यह नीति आज भी लागू है. वहीं कर्नाटक और ओडिशा जैसे राज्य भी इन विशेष दिनों में लड़कियों को छुट्टी देते हैं, जबकि केरल यह छुट्टी केवल स्कूली छात्राओं को देता है. इसके अतिरिक्त, कई निजी संस्थान भी स्वेच्छा से ऐसी नीतियां अपना रहे हैं. इस पर प्रधान न्यायाधीश ने एक गहरी चिंता व्यक्त की और स्पष्ट किया कि यदि कोई संस्था स्वयं ऐसा करती है, तो यह सराहनीय है, लेकिन यदि इसे कानूनी अनिवार्यता बनाने की बात उठेगी, तो आप नहीं जानते कि लड़कियों के करियर में कितनी बड़ी हानि पहुंच सकती है.
ऐसा कानून बनने पर नियोक्ताओं में भेदभाव की भावना बढ़ेगी, जिससे महिलाओं के पेशेवर विकास में बाधा आयेगी. इस तरह का अवकाश तो न्यायिक नौकरी में भी संभव नहीं है. ट्रायल या लंबे केस, जिनकी बहस लंबी होती है, वे महिलाओं को दिये ही नहीं जा सकेंगे. हर महीने दो दिन भी आवश्यक छुट्टी देना नौकरी की शर्तों की बुरी तरह अवहेलना करता है. अदालत दो बार सरकार से इस बारे में अनुरोध कर चुकी है, पर सरकार इस विषय पर निर्णय लेने में संकोच कर रही है. अदालत ने स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता खुद ही कई बार यह बात सरकार की सूचना में ला चुके हैं. सरकार चाहे, तो 24 फरवरी, 2023 एवं आठ जुलाई, 2024 के सुझावों पर ध्यान दे सकती है.
व्यक्तिगत अनुभव के आधार पर मेरा भी यही मानना है कि मासिक धर्म अवकाश की आवश्यकता केवल असाधारण स्वास्थ्य स्थितियों में होती है, जिसे संवेदनशील नियोक्ता पहले से ही समझते हैं और ऐसी परिस्थिति में अवकाश देने से गुरेज नहीं करते. एक कामकाजी महिला के रूप में मैं यह जानती हूं कि इस जैविक सत्य के साथ पेशेवर प्रतिबद्धता बनाये रखना पूरी तरह संभव है. सर्वोच्च न्यायालय का यह तर्क सटीक है कि इसे कानूनी अनिवार्यता बनाने से अनजाने में महिलाओं के लिए रोजगार के अवसर सीमित हो सकते हैं और उनके करियर में बाधाएं उत्पन्न हो सकती हैं. ‘मासिक धर्म अवकाश’ के प्रश्न का समाधान कानून की कठोरता में नहीं, बल्कि कार्यस्थल की संवेदनशीलता में निहित है. आवश्यकता केवल एक ऐसा वातावरण तैयार करने की है, जहां असाधारण परिस्थितियों में सहजता मिले, न कि अधिकारों के नाम पर महिलाओं की प्रगति की राह में भेदभाव का कोई नया आधार तैयार हो.
(ये लेखिका के निजी विचार हैं.)
