दक्ष यज्ञ व सती के देहत्याग का वर्णन सुनकर श्रोता हुए भावविभोर

नाला. बंदरडीहा पंचायत अंतर्गत पिंडरगड़िया गांव में सात दिवसीय संगीतमयी भागवत कथा जारी है.

By JIYARAM MURMU | November 8, 2025 8:38 PM

– नाला के पिंडरगड़िया गांव में सात दिवसीय संगीतमयी भागवत कथा जारी प्रतिनिधि, नाला. बंदरडीहा पंचायत अंतर्गत पिंडरगड़िया गांव में सात दिवसीय संगीतमयी भागवत कथा जारी है. इसके दूसरे दिन कथावाचक गौरहरि दास बाबाजी ने मंगलाचरण के साथ कथा का प्रारंभ किया. इस अवसर पर उन्होंने श्रीमद्भागवत कथा के विभिन्न प्रसंगों की व्याख्या की. उन्होने स्यांयभुव मनु और कर्दम मुनि के बीच कथन का वर्णन किया. कहा कि मनु और देवहूति के विवाह के बाद कर्दम मुनि के अपने ज्ञान और तपस्या को लेकर मनु से बात की. संवाद के दौरान मनु ने कर्दम मुनि से उनके आने का कारण पूछा और इस बात पर भी चर्चा की कि वे कैसे यह सुनिश्चित करेंगे कि संसार में अधर्म न फैले. कर्दम मुनि ने मनु से कहा कि संसार में हमेशा धर्म और अधर्म के बीच संघर्ष होता रहेगा. कहा कि यह संवाद संसार की स्थिति और धर्म के पालन के महत्व पर केंद्रित है. कथा प्रसंग को आगे बढ़ाते हुए दक्ष यज्ञ एवं सती का देहत्याग का सुमधुर वर्णन सुनकर श्रोता भक्त भावविभोर हो गये. कहा कि एक बार दक्ष प्रजापति ने यज्ञ का आयोजन किया. इस यज्ञ में सब देव देवियों को निमंत्रण दिया, लेकिन भगवान शिव को निमंत्रण नहीं दिया. माता सती उस यज्ञ में शामिल होने के लिए शिवजी से प्रार्थना की, लेकिन शिवजी ने जाने से मना किया. फिर भी सती नहीं माना और वहां जाने पर दक्ष प्रजापति ने बिना आमंत्रण पर आने से सती माता को अपमानित करने लगे. भगवान शिव को आमंत्रण न मिलने और पिता द्वारा शिव का अपमान किए जाने के कारण शिव निंदा सह नहीं पाये. इस कारण देवी सती स्वयं को अग्नि में समर्पित कर देती हैं. घटना के बाद भगवान शिव को क्रोध आया. इस कारण यज्ञ स्थल पहुंच कर सती के देह को अपने कंधों पर लेकर विनाशकारी तांडव नृत्य करने लगे. भगवान शिव के गण वीरभद्र ने यज्ञ को नष्ट कर दिया. भगवान शिव के नृत्य से पूरे ब्रह्मांड में प्रलय की स्थिति आ गयी. इस महा प्रलय को रोकने के लिए भगवान विष्णु अपने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर को टुकड़े-टुकड़े करते हैं. सती माता के अंग जहां-जहां पड़ा उससे एक-एक शक्तिपीठों का निर्माण हुआ, जिसे महातीर्थ के रूप में जाना जाता है. अंत में भगवान शिव ने क्रोधित होकर दक्ष प्रजापति का सिर काट दिया. बाद में सृष्टिकर्ता ब्रह्मा जी के कहने पर भगवान शिव ने बकरे का सिर लगाकर प्रजापति को जीवन दान दिया. मौके पर कथावाचक ने ध्रुव उपाख्यान, पृथु उपाख्यान, पूरंजय प्रसंग आदि का भी वर्णन किया.

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