आंखों की रोशनी नहीं, फिर भी मैदान पर मचा रहीं धमाल, जमशेदपुर की दो बहनों की कहानी जानकर करेंगे सलाम

जमशेदपुर की नेहा और बेबी पोद्दार, जो जन्म से ग्लूकोमा से पीड़ित हैं, ने खेल के मैदान में अपनी अलग पहचान बनाई है. फुटबॉल और क्रिकेट में झारखंड का प्रतिनिधित्व कर चुकीं इन बहनों की हौसलों की कहानी प्रेरणादायक है. सीमित संसाधनों के बावजूद, उन्होंने हार नहीं मानी और अब भारतीय टीम का हिस्सा बनने का सपना देख रही हैं.

जमशेदपुर: आंखों की रोशनी ने साथ नहीं दिया, लेकिन हौसलों ने कभी हार नहीं मानी. भुइयांडीह की रहने वाली सगी बहनें नेहा पोद्दार (17) और बेबी पोद्दार (14) आज अपनी चुनौतियों को पीछे छोड़ खेल के मैदान में कामयाबी की कहानी लिख रही हैं. जन्म से ग्लूकोमा से पीड़ित दोनों बहनें फुटबॉल और क्रिकेट में झारखंड का प्रतिनिधित्व कर चुकी हैं और राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं में भी अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन कर चुकी हैं.

रविवार को साकची में दिव्यांग मार्ग ट्रस्ट की ओर से आयोजित ग्लूकोमा दिवस कार्यक्रम में दोनों बहनों को सम्मानित किया गया. कार्यक्रम में उनके संघर्ष और खेल के प्रति समर्पण की सराहना की गयी.

फुटबॉल में अलग पहचान, क्रिकेट में ऑलराउंडर

नेहा ब्लाइंड फुटबॉल में बी-2 कैटेगरी में खेलती हैं, जबकि बेबी बी-1 कैटेगरी की खिलाड़ी हैं. दोनों बहनें ब्लाइंड क्रिकेट में ऑलराउंडर की भूमिका निभाती हैं. फुटबॉल और क्रिकेट दोनों में वे राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं में झारखंड का प्रतिनिधित्व कर चुकी हैं.

नेहा 12वीं कक्षा की छात्रा हैं, जबकि बेबी नेशनल एसोसिएशन फॉर द ब्लाइंड से मैट्रिक की पढ़ाई कर रही हैं. दोनों का सपना अब भारतीय टीम का हिस्सा बनना और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश का प्रतिनिधित्व करना है.

तीन-तीन बार हुई सर्जरी, फिर भी नहीं टूटा हौसला

मां रिकी पोद्दार के लिए बेटियों का यह सफर आसान नहीं रहा. नेहा के जन्म के बाद ही उन्हें उसकी आंखों में कुछ असामान्य नजर आया. डॉक्टर से जांच कराने पर ग्लूकोमा की जानकारी मिली. तीन साल बाद जब बेबी का जन्म हुआ, तो उसमें भी यही बीमारी पायी गयी. बेटियों के इलाज के लिए रिकी और उनके पति गुणाधर पोद्दार ने देश के कई बड़े नेत्र अस्पतालों से संपर्क किया. दोनों बहनों की तीन-तीन बार सर्जरी भी हुई, लेकिन आंखों की स्थिति में सुधार नहीं हुआ.

पिता गुणाधर पोद्दार सब्जी बेचकर परिवार का भरण-पोषण करते हैं. सीमित आमदनी के बावजूद उन्होंने बेटियों के सपनों को कभी छोटा नहीं होने दिया. हालांकि, आर्थिक तंगी आज भी परिवार के सामने बड़ी चुनौती है. दोनों बेटियों की नियमित दवाइयों और खासकर विशेष आई ड्रॉप का खर्च उठाना मुश्किल है. पढ़ाई और खेल से जुड़ी गतिविधियों के लिए आने-जाने में भी परिवार को परेशानियों का सामना करना पड़ता है.

2022 में शुरू हुआ खेल का सफर

नेहा और बेबी ने नेशनल एसोसिएशन फॉर द ब्लाइंड में पढ़ाई के दौरान वर्ष 2022 में लॉकडाउन के बाद खेल की दुनिया में कदम रखा. कोच राजकुमार सिंह ने दोनों की प्रतिभा को पहचाना और उन्हें फुटबॉल मैदान लेकर गये. शुरुआत में झिझक और कई मुश्किलें थीं, लेकिन दोनों ने धीरे-धीरे अभ्यास शुरू किया.

फुटबॉल के साथ उन्हें ब्लाइंड क्रिकेट खेलने का भी मौका मिला. कोच के मार्गदर्शन और नियमित अभ्यास से दोनों का आत्मविश्वास बढ़ता गया. देखते ही देखते खेल उनके लिए सिर्फ एक गतिविधि नहीं, बल्कि अपनी पहचान बनाने का जरिया बन गया.

दोनों बहनों ने 2022, 2023, 2024 और 2025 में ईस्ट जोन नेशनल ब्लाइंड फुटबॉल प्रतियोगिता सहित राष्ट्रीय क्रिकेट प्रतियोगिताओं में झारखंड का प्रतिनिधित्व किया है.

अब लक्ष्य सिर्फ मैदान नहीं, देश के लिए खेलना

मुश्किलों से लड़ते हुए नेहा और बेबी ने यह साबित किया है कि किसी कमी को सपनों की राह में दीवार नहीं बनने देना चाहिए. आज दोनों बहनों की नजर सिर्फ अगली प्रतियोगिता पर नहीं, बल्कि उस दिन पर है जब वे भारतीय टीम की जर्सी पहनकर देश का प्रतिनिधित्व करेंगी.

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By Nesar ahamad

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