जमशेदपुर: करनडीह स्थित दिशोम जाहेरथान में रविवार को ‘धाड़ दिशोम माझी परगना महाल’ के तत्वावधान में कोल्हान स्तरीय आदिवासी संताल समाज का धार्मिक महासम्मेलन आयोजित किया गया. सम्मेलन में धाड़ दिशोम, कुचूंग दिशोम, बारहा दिशोम, पातकोम दिशोम और सिञ दिशोम की पारंपरिक स्वशासन व्यवस्था के शीर्ष प्रतिनिधियों समेत 5 हजार से अधिक लोग शामिल हुए.
समाज को एकजुट और मजबूत करने पर जोर
मुख्य अतिथि धाड़ दिशोम के देश परगना बैजू मुर्मू ने कहा कि सम्मेलन का उद्देश्य समाज को एकसूत्र में पिरोना और सामाजिक एकजुटता को मजबूत करना है. उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज को सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक, धार्मिक और राजनीतिक स्तर पर जागरूक होने की जरूरत है, ताकि मौजूदा चुनौतियों का सामूहिक रूप से मुकाबला किया जा सके.
उन्होंने कहा कि कल-कारखानों और खनिज खदानों के कारण आदिवासियों को उनकी पैतृक भूमि और गांवों से पलायन के लिए मजबूर होना पड़ रहा है. इससे सामाजिक और सांस्कृतिक एकता भी प्रभावित हो रही है. उन्होंने अपने हक, अधिकार और अस्तित्व की रक्षा के लिए पारंपरिक स्वशासन व्यवस्था को मजबूत करने का आह्वान किया.
‘सबल’ नहीं, पारंपरिक व्यवस्था और संस्कृति को बचाने पर जोर
सम्मेलन में वक्ताओं ने कहा कि नई पीढ़ी को पूर्वजों की परंपराओं, रीति-रिवाजों और सांस्कृतिक विरासत से जोड़ना जरूरी है. दुर्गाप्रसाद मुर्मू ने कहा कि संताल समाज की अपनी विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान है. समाज के लोगों को अपनी न्याय प्रणाली, पूजा पद्धति और पारंपरिक व्यवस्था की जानकारी होनी चाहिए.
उन्होंने युवाओं से जन्म से लेकर मृत्यु तक के सामाजिक रीति-रिवाज और संस्कारों से जुड़ने की अपील की. साथ ही संताल समाज के उद्गम स्थल, पौराणिक कथाओं, पर्व-त्योहारों और परंपराओं के महत्व की जानकारी दी.
धर्मांतरण से सतर्क रहने की अपील
जुगसलाई तोरोप परगना दशमत हांसदा ने धर्मांतरण और समाज में फूट डालने वाली शक्तियों से सतर्क रहने की अपील की. उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज सभी धर्मों का सम्मान करता है, लेकिन समाज को धार्मिक रूप से बांटने और धर्मांतरित करने के प्रयासों से सावधान रहने की जरूरत है.
उन्होंने मरांगबुरू, लुगु बुरु, आजोदिया बुरु और राजरप्पा जैसे धार्मिक स्थलों को सुरक्षित और संरक्षित रखने पर भी जोर दिया.
सरना धर्म को मान्यता देने की मांग
धाड़ दिशोम देश पारानिक दुर्गाचरण मुर्मू ने कहा कि संताल समाज लंबे समय से सरना धर्म को धार्मिक मान्यता देने की मांग करता रहा है. उन्होंने कहा कि समाज को अपनी धार्मिक पद्धतियों और सांस्कृतिक पहचान को समझने और सुरक्षित रखने की जरूरत है.
सम्मेलन में लिए गए ये फैसले
- किसी के प्रलोभन में आकर धर्मांतरण नहीं करेंगे.
- सामाजिक गतिविधियों में अपनी उपस्थिति दर्ज करायेंगे.
- पूर्वजों के बताये रास्ते और रीति-रिवाजों का पालन करेंगे.
- अंतरजातीय विवाह नहीं करेंगे.
- नशे से परहेज करेंगे और शिक्षा को बढ़ावा देंगे.
- घरों में पारंपरिक औजार तीर-धनुष रखना अनिवार्य करेंगे.
- ओलचिकी लिपि को संताल समाज के घर-घर तक पहुंचायेंगे.
- आम जनगणना में आदिवासी धर्म की जगह सरना धर्म लिखेंगे.
