गांव से इटली तक पहुंची संताली भाषा की आवाज, डॉ. श्रीपति टुडू को मिला अंतरराष्ट्रीय यंग प्राइज सम्मान

जमशेदपुर के डॉ. श्रीपति टुडू को इटली में उनके उल्लेखनीय कार्य के लिए अंतरराष्ट्रीय सम्मान मिला है. उन्होंने भारत के संविधान का संताली भाषा में ओलचिकी लिपि में अनुवाद किया है, जिससे मातृभाषा को नई पहचान मिली है.

जमशेदपुर : संताली भाषा और ओलचिकी लिपि के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान देने वाले डॉ. श्रीपति टुडू को इटली में अंतरराष्ट्रीय सम्मान मिला है. उन्होंने भारत के संविधान का संताली भाषा में ओल चिकी लिपि में अनुवाद कर मातृभाषा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया है. उनके इसी कार्य और संताली भाषा के प्रति समर्पण को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली. इटली में चमरा डॉक एसोसिएशन द्वारा आयोजित प्रीमियो ओस्ताना 2026 में उन्हें प्रीमियो जियोवानी (यंग प्राइज) से सम्मानित किया गया.

सम्मान से बढ़ा संताली भाषा का गौरव

डॉ. श्रीपति टुडू का यह सम्मान आदिवासी समाज, संताली भाषा और ओलचिकी लिपि के लिए गौरव का विषय है. इस सम्मान से संताली भाषा का गौरव बढ़ा है. डॉ. श्रीपति टुडू को मिला सम्मान संताली भाषा को गांव और स्थानीय समाज की सीमाओं से आगे अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचने की यात्रा का हिस्सा है. ओलचिकी लिपि में संताली भाषा के विकास, लेखन और ज्ञान के विस्तार के लिए किये जा रहे प्रयासों को इससे नई प्रेरणा मिल सकती है.डा.

कौन हैं श्रीपति टुडू

श्रीपति टुडू सिदो-कान्हू बिरसा यूनिवर्सिटी पुरुलिया, पश्चिम बंगाल में संताली विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर हैं. वह पश्चिम बंगाल के ही बांकुडा जिले के सुदूरवर्ती ग्रामीण क्षेत्र के निवासी हैं. वर्ष 2022 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने मन की बात कार्यक्रम में डॉ. श्रीपति टुडू के उल्लेखीय कार्य के बारे में चर्चा कर चुके हैं.

संविधान को मातृभाषा में समझने का मिला अवसर

भारत का संविधान देश के नागरिकों के अधिकारों, कर्तव्यों और लोकतांत्रिक व्यवस्था का आधार है. ऐसे महत्वपूर्ण दस्तावेज का संताली भाषा में ओल चिकी लिपि में अनुवाद किये जाने से संताली भाषी समाज के लिए संविधान को अपनी मातृभाषा में पढ़ने और समझने का अवसर मजबूत हुआ है. डॉ. श्रीपति टुडू का यह प्रयास भाषा के संरक्षण के साथ-साथ ज्ञान को मातृभाषा तक पहुंचाने की दिशा में भी महत्वपूर्ण माना जा सकता है. संविधान जैसे जटिल और महत्वपूर्ण विषय को संताली भाषा में उपलब्ध कराना आने वाली पीढ़ियों के लिए भी उपयोगी साबित होगा. इससे संताली युवाओं और विद्यार्थियों में अपनी भाषा के माध्यम से संवैधानिक विषयों को समझने की रुचि बढ़ाने में मदद मिलेगी.

अपनी मातृभाषा की जड़ों को मजबूत करना हर किसी की जिम्मेदारी: डॉ. श्रीपति टुडू

डॉ. श्रीपति टुडू बताते हैं संताली भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि आदिवासी समाज के इतिहास, संस्कृति, परंपरा और सामुदायिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा है. भाषा के संरक्षण और विकास का सीधा संबंध आने वाली पीढ़ियों के सांस्कृतिक भविष्य से जुड़ा हुआ है. अपनी मातृभाषा को मजबूत करना अपनी जड़ों, इतिहास और पहचान को मजबूत करना है. संविधान का संताली भाषा में ओलचिकी लिपि में अनुवाद करने का मूल मकसद यह था कि संताली भाषा-भाषी लोगों को संविधान में निहित विभिन्न प्रावधानों को समाज के लोग आसानी से समझ सके. उन्होंने किसी पुरस्कार को पाने के मकसद से संविधान का अनुवाद नहीं किया है. उन्होंने कहा - संताल समाज के लोगों को अपनी मातृभाषा में आवश्यक रूप से पठन-पाठन करना चाहिए. इससे आदिवासी संताल समाज मजबूत होने के साथ-साथ समृद्ध व विकसित होगा.

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लेखक के बारे में

By दशमत सोरेन

दशमत सोरेन ने रांची विश्वविद्यालय से अंग्रेजी साहित्य में स्नातकोत्तर किया है. वे 29 वर्षों से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं. उनकी विशेषज्ञता मुख्य रूप से झारखंड की आदिवासी-मूलवासी राजनीति, स्थानीय समुदायों की भाषा-संस्कृति और यहां के सामाजिक ताना-बाना है. वे वर्ष 2010 से प्रभात खबर के साथ एक ट्राइबल रिपोर्टर के रूप में काम कर रहे हैं.

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