जमशेदपुर : धतकीडीह की मक्का मस्जिद शहर की मस्जिदों में प्रमुख है. 1952 में मदरसा फैजुल उलूम की स्थापना के बाद कायद ए अहल ए सुन्नत अल्लामा अर्शदुल कादरी ने 21 फरवरी 1997 को धतकीडीह में मक्का मस्जिद की संग ए बुनियाद रखी. अल्लामा अर्शदुल कादरी की इच्छा थी मक्का मस्जिद के नाम से एक मस्जिद की तामिर हाे.
हरम शरीफ के पत्थर की जियारत करायी जाती है मक्का मस्जिद में
जमशेदपुर : धतकीडीह की मक्का मस्जिद शहर की मस्जिदों में प्रमुख है. 1952 में मदरसा फैजुल उलूम की स्थापना के बाद कायद ए अहल ए सुन्नत अल्लामा अर्शदुल कादरी ने 21 फरवरी 1997 को धतकीडीह में मक्का मस्जिद की संग ए बुनियाद रखी. अल्लामा अर्शदुल कादरी की इच्छा थी मक्का मस्जिद के नाम से एक […]

मक्का मस्जिद नाम रखे जाने के संबंध में अल्लामा के पुत्र सह मस्जिद के निदेशक डॉ गुलाम जरकानी ने बताया कि धातकीडीह में मरहुम हाजी अमीन हरम शरीफ मक्का में विद्युत विभाग में नौकरी कर रहे थे. मक्का शरीफ के हरम शरीफ के अहाते में खुदाई के दौरान एक छोटा पत्थर निकला. जब वह शहर लौटे तो मक्का शरीफ का एक पत्थर पूरी शद्धा के साथ लेकर धतकीडीह पहुंचे. वह पत्थर उन्होंने अल्लामा अरशदुल कादरी को दिया. पत्थर आज भी मदरसा फैजुल उलूम में रखा है, जिसकी जियारत को लोग यहां पहुंचते हैं. उसी पत्थर से प्रेरणा लेकर फैजुल उलूम स्थित मस्जिद का नाम मक्का मस्जिद पड़ा. अल्लामा अरशदुल कादरी के उर्स के मौके पर उस पत्थर का लोगों को दीदार कराया जाता है.
डॉ गुलाम जरकानी की देख रेख में फैजुल उलूम मक्का मस्जिद का संचालन किया जाता है. कुल 57 डिसमिल जमीन पर मक्का मस्जिद की तामिर की गयी. यहां नमाजियों के लिए बड़ा और कुशादा वजू खाना बनाया गया है. मस्जिद में पांच एसी आैर वाटर कूलर लगाये गये हैं.
सेहन में काफी जगह छोड़ी गयी है. रमजान, जुमा एवं अन्य मौकों पर सेहन की जमीन का इस्तेमाल होता है. मजहबी जलसे, नमाज ए जनाजा आदि मस्जिद के आंगन में पढ़ायी जाती है. यहां के पेश इमाम मौलाना मंजर मोहसिन हैं.
अल्लाह काे राजी करता है रोजा
कुरान और हदीसों में रमजान महीने के महत्व का जिक्र है. अल्लाह को राजी करने के लिए तौहिद, जकात, नमाज, हज और रोजा पांच अरकान हैं. अल्लाह इरशाद फरमाते हैं- तुम पर रमजान के रोजे फर्ज किये गये और रहमतों के दरवाजे खोल दिये गये हैं. इस माह में खैरात, जकात दूसरों की मदद के साथ-साथ सुबह से लेकर सूरज डूबने तक अल्लाह के नाम पर रोजा रखा जाता है. इस माह में जन्नत के दरवाजे खोल दिये जाते हैं तथा जहन्नुम के दरवाजे बंद कर दिये जाते हैंं. हदीस में अल्लाह ने फरमाया है कि बंदे रोजा सिर्फ मेरे लिए रखते हैं. सुबह से शाम तक भूखा -प्यासा रहते हैं, खुद पर काबू रखते हैं. गुनाहों से बचते हैं व सब्र और बर्दाश्त का प्रदर्शन करते हैं. इसका बदला और सवाब मैं खुद अपने हाथों से अपने बंदों को दूंगा. रमजान को अल्लाह ने तीन भागों में विभाजित किया है. पहला अशरा रहमत का, दूसरा मगफिरत और अंतिम अशरा दोजख से निजात का है. राेजा बुरे कर्मों से बचने और नेक काम करने का माध्यम है. रोजा केवल इबादत ही नहीं बल्कि इबादतों की रूह है. रोजा शारीरिक और व्यवहारिक तौर पर फायदेमंद है.
डॉ गुलाम जरकानी, निदेशक व मोहतमिम मदरसा फैजुल उलूम
मुस्लिम लाइब्रेरी में इफ्तार कल
जमशेदपुर. बिष्टुपुर स्थित
मुस्लिम लाइब्रेरी में रविवार (3 जून) काे इफ्तार का आयाेजन होगा. मुस्लिम लाइब्रेरी के अध्यक्ष हाजी हिदायतुल्लाह खान ने उक्त जानकारी दी.