Mahatma Gandhi Death Anniversary, हजारीबाग (संजय सागर): सत्य और अहिंसा के पुजारी राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की पुण्यतिथि 30 जनवरी को पूरे देश में शहीद दिवस के रूप में मनायी जाती है. महात्मा गांधी न केवल भारत, बल्कि पूरी दुनिया के लिए आज भी प्रेरणा हैं. बहुत कम लोग जानते हैं कि गांधी जी का झारखंड से गहरा और भावनात्मक जुड़ाव रहा है. आजादी की लड़ाई में झारखंड का योगदान अहम रहा है. इस संघर्ष को दिशा और ताकत देने के लिए महात्मा गांधी 1917 से 1940 के बीच करीब 12 बार झारखंड आए. इन दौरों के दौरान उन्होंने झारखंड की धरती पर स्वतंत्रता आंदोलन को मजबूत आधार दिया, जो आगे चलकर अंग्रेजों के लिए बड़ी चुनौती बन गया.
देवघर और छोटानागपुर के लोगों की खुलकर की थी तारीफ
महात्मा गांधी झारखंड की सामाजिक परंपराओं और जीवनशैली से काफी प्रभावित थे. दो मौकों पर उन्होंने खुलकर यहां के लोगों की सराहना की. पहला मौका 1925 में देवघर यात्रा के दौरान आया. बाबाधाम दर्शन और स्थानीय लोगों से मिलने के बाद उन्होंने अपनी पत्रिका यंग इंडिया में लिखा कि देवघर मंदिर में छुआछूत नहीं मानी जाती और मंदिर सभी के लिए खुला है, जो एक बेहतरीन परंपरा है. दूसरा मौका 1934 में छोटानागपुर दौरे के समय आया. 28 अप्रैल 1934 को गोमिया में हुई सभा में बड़ी संख्या में संथाल आदिवासी पहुंचे थे. गांधी जी ने कहा था कि आप सूत कातते हैं और अपने कपड़े खुद बुनते हैं, यह आत्मनिर्भरता की बहुत अच्छी मिसाल है.
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चंपारण आंदोलन से झारखंड की एंट्री
महात्मा गांधी का झारखंड से पहला जुड़ाव चंपारण आंदोलन के दौरान हुआ था. 4 जून 1917 को वे पहली बार रांची आए थे. इसके बाद 1917 में ही वे चार बार रांची पहुंचे. इस दौरान ब्रिटिश सरकार की ओर से उन्हें नजरबंद किए जाने की आशंका भी जतायी गयी थी. 11 जुलाई, 22 सितंबर और 4 अक्टूबर 1917 को भी वे रांची आए थे.
विदेशी कपड़ों की जलाई होली
1920 में रांची आगमन के दौरान उन्होंने विदेशी कपड़ों की होली जलाई. इसी दौरान टाना भगत आंदोलन से जुड़े आदिवासी समुदाय गांधी जी के करीबी बने. 1921 और 1927 में धनबाद, 1934 में झरिया, 1925 में चाईबासा, खूंटी, हजारीबाग और जमशेदपुर जैसे इलाकों में उन्होंने दौरा किया और छात्रों, मजदूरों व आदिवासियों से संवाद किया.
टाटा मजदूर विवाद सुलझाया, देवघर में हुआ हमला
1922 में टाटा प्रबंधन और मजदूरों के बीच हड़ताल के दौरान गांधी जी ने मध्यस्थता कर मामला सुलझाया था. वहीं, 1934 में देवघर यात्रा के दौरान जसीडीह में उनकी कार पर हमला भी हुआ, हालांकि वे सुरक्षित बच गए.
रामगढ़ अधिवेशन था आखिरी दौरा
महात्मा गांधी 1940 में आखिरी बार झारखंड आए. उन्होंने रांची के निवारणपुर में निवारण बाबू से मुलाकात की और फिर रामगढ़ में कांग्रेस के 53वें अधिवेशन में शामिल हुए. 20 मार्च 1940 को इसी अधिवेशन में दूसरे विश्व युद्ध में भारत की भागीदारी के विरोध में प्रस्ताव पारित हुआ, जो ऐतिहासिक माना जाता है.
झारखंड की मिट्टी में बसते थे बापू
महात्मा गांधी ने झारखंड में केवल यात्राएं ही नहीं कीं, बल्कि यहां निवारण आश्रम और हरिजन इंडस्ट्रियल स्कूल जैसी संस्थाओं की नींव भी रखी. उनका मानना था कि झारखंड की सादगी, आत्मनिर्भरता और सामाजिक समरसता ही असली भारत की पहचान है.
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